Origin and History of Rudraksh / रुद्राक्ष की उत्पत्ति


रुद्राक्ष
रुद्राक्ष की उत्पत्ति
पूर्वकाल में एक दिन लीलावंश भगवान शिव ने जब अपने दोनों नेत्र खोले, तो नेत्रों से कुछ जल की बूंदें गिरी और उनसे ही रुद्राक्ष नामक वृक्ष उत्पन्न हुआ। शिव पुराण में रुद्राक्ष की उत्पत्ति के विषय में निम्न वर्णन मिलता है-
हिमालय पर स्वतंत्र रूप से विचरने वाले महाबली असुरराज त्रिपुरासुर का वध करने के लिए भगवान् शिव को त्रिपुरासुर के साथ वर्षों तक भीषण युद्ध करना पड़ा था। उस युद्ध में बहुत अधिक व्यस्त रहने के कारण शिव की आंख से तीव्र शूल होने लगा था। क्रोध व लालिमा के कारण उनके नेत्रों से अश्रुस्त्राव हुआ। तब ब्रह्मा ने उस अश्रुस्त्राव को एक वृक्ष के रूप में उत्पन्न होने का आदेश दिया। उस वृक्ष पर जो फल आये, वो ही ‘रुद्राक्ष’ कहे गये।
रुद्राक्ष चारों जातियों के भेद से भूतल पर प्रगट हुए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र को क्रमशः श्वेत, रक्त, पीत तथा कृष्ण वर्ण के रुद्राक्ष धारण करने से शिव-पार्वती की प्रसन्नता की प्राप्ति होती है।
आंवले के बराबर रुद्राक्ष श्रेष्ठ होते हैं।
बेर के बराबर रुद्राक्ष मध्यम होता है।
चने के बराबर रुद्राक्ष निम्न कोटि का होता है।
आंवले के बराबर रुद्राक्ष समस्त अरिष्टों का नाश करने वाला होता है। बेर के बराबर रुद्राक्ष लोक में उत्तम फलदायक व सुख-सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है। गुंजाफलों के समान बहुत छोटा रुद्राक्ष सम्पूर्ण मनोरथ सिद्धि देने वाला होता है, अर्थात् रुद्राक्ष जितना छोटा होता है, उतना ही अधिक फल प्रदान करने वाला होता है।
एक छोटा रुद्राक्ष बड़े रुद्राक्ष से दस गुणा अधिक फल देने वाला होता है। ऐसा माना और कहा जाता है। यह पापनाशक बताए गये हैं। समान आकार-प्रकार वाले, चिकने, मजबूत, स्थूल, कंटकयुक्त (ऊभरे हुए छोटे छोटे दानों वाले) सुन्दर रुद्राक्ष अभिलषित पदार्थ तथा भोग व मोक्ष को देने वाले हैं।
अपने आप डोरा पिरोने का जिसमें छिद्र बना हो, वह उत्तम रुद्राक्ष है; मनुष्य द्वारा बनाए छिद्रयुक्त रुद्राक्ष मध्यम श्रेणी के होते हैं। रुद्राक्ष के धारण करने से महापातकों का सर्वनाश होता है।
रुद्राक्ष की विशेषता
तंत्र-साधना के परिप्रेक्ष्य में रुद्राक्ष को अति प्रभावी और उपयोगी माना गया है। तंत्र विशेषज्ञों के अनुसार रुद्राक्ष ही एक ऐसा फल है, जो सदैव शुभ फल ही देता है। रुद्राक्ष का उपयोग सभी कर सकते हैं।
रुद्राक्ष जहां एक तरफ भाग्य को उज्जवल बनाता है, वहीं अशांत आत्माओं से भी बचाता है, तथा स्वस्थ और निरोग भी रखता है। यह मस्तिष्क और हृदय को शक्ति देता है। रक्तस्रोत व स्नायु को स्निग्धता प्रदान करता है।
रुद्राक्ष की माला पहने हुए साधु-संन्यासी, पुरोहित पंडित और बाबा प्रायः दिख पड़ते हैं। रूपरेखा से शोभन और आकर्षक न होने पर भी इसका इतना व्यापक प्रयोग इसकी उपयोगिता और प्रभावशीलता का प्रमाण है। रुद्राक्ष धारण करने से जीवन में शान्ति और आत्मशक्ति प्राप्त होती है। शुद्ध रुद्राक्ष लघुत्ता से गरिमा और प्रतिष्ठा की ओर ले जाता है।
रुद्राक्ष के प्राप्ति स्थान तथा उसकी उपयोगिता
रुद्राक्ष वास्तव में एक फल का बीज है, किन्तु अपने अद्भुत गुणों के कारण आध्यात्मिक जगत् में ही नहीं बल्कि अब तो भौतिक विज्ञानियों ने चिकित्सा जगत् में भी परम पवित्र और पूजनीय स्वीकार किया गया है।
इसकी कई जातियां होती हैं और विश्व के अनेक भागों में प्राप्त होता है। मुख्य रूप से यह पूर्वी द्वीप समूह-जावा, सुमात्रा, वाली, इंडोनेशिया और मलाया में उत्पन्न होता है। नेपाल भी इसका उत्पादक देश है।
अल्प संख्या में भारत में भी इसके वृक्ष पाए जाते हैं। मैसूर, देहरादून, महाराष्ट्र, आसाम और हिमालय की तराई के क्षेत्र में ! मुख्यतः व्यापारिक प्रयोग के लिए स्थानीय लोग इसके कच्चे फलों को तोड़कर उनसे गुठली निकाल लेते हैं और बेचते हैं। किन्तु साधना की दृष्टि से पके फल की गुठली ही श्रेष्ठ और उत्तम होती है।
रुद्राक्ष च शिवाक्षं च सर्वाक्ष भूतनाशनम्।
पावन नीलकण्ठाक्ष राक्षं च शिवप्रियम्।।
रुद्राक्ष भगवान् शिव की सर्वाधिक प्रिय वस्तुओं में से एक है। यह उन्हें इतना रूचिकर लगा कि वो इसके दाने-दाने में अपनी सूक्ष्म-शक्ति के रूप में निवास करने लगे। यही कारण है कि रुद्राक्ष के दाने को लोग शिवलिंग की भांति ही पूजते हैं।
रुद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति भौतिक अथवा दैविक सभी आपदाओं से सुरक्षित रहता है। इसके दानों से बनी माला सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं। रुद्राक्ष के दाने कंठ या बाहु में धारण किये जाते हैं।
आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी स्वीकार किया है कि रुद्राक्ष के दाने मंे एक प्रकार की अद्भुत चुम्बकीय और विद्युत शक्ति निहित रहती है, जो इसके धारक को अनेक प्रकार से प्रभावित करती है।
ज्वर (बुखार), उत्तेजना, अनिद्रा, रक्तचाप, मिर्गी, वातज-व्याधियां, दुःस्वप्न, भूत-प्रेतादि का उपद्रव, उदर-विकार, उमत्तता और चर्म रोगों के शमन में रुद्राक्ष का चमत्कारी प्रभाव देखकर एलोपैथी के चिकित्सक भी रोगियों को इसके धारण करने की सलाह देते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि उन्होंने भी इसके वस्तुगत प्रभाव को स्वीकार कर लिया है।
रुद्राक्ष का प्रयोग चाहें जिस रूप में किया जाए, वो अपना चमत्कारी प्रभाव किसी न किसी अंश में दिखता अवश्य है।
रुद्राक्ष के भेद
वनस्पति जगत् के रुद्राक्ष के फल अनेक आकार-प्रकार के होते हैं। ये काली मिर्च के दाने से लेकर आंवले के आकार तक विभिन्न रुपों में प्राप्त होते हैं। किन्तु ये सहज सुलभ नहीं होते। बहुत छोटे और बहुत बड़े दाने कठिनता से ही प्राप्त होते हैं।
सामान्यतः मध्यम आकार के दाने, जो झरबेरी के बेर के बराबर होते हैं, अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।
नेपाल का रुद्राक्ष साइज में बड़ा होता है। भारतीय रुद्राक्ष सभी आकारों में, किन्तु बहुत थोड़ी मात्रा में उत्पन्न होता है। पूर्वी द्वीप-समूह इसका सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्र है और वहां इसके छोटे दाने बहुतायात से पाए जाते हैं।
पन्द्रह से बीस वर्षों के अंदर विश्व में भारतीय अध्यात्म के साथ-साथ रुद्राक्ष का महत्व व प्रयोग बढ़ता जा रहा है। वहां इसकी बहुत मांग है। वहां के संपन्न, आस्थावान् नागरिक इसकी माला बड़े सम्मान और विश्वास के साथ धारण करते हंै।
दिनों दिन बढ़ती जा रही लोकप्रियता के कारण आज सच्चे और कीमती रुद्राक्षों की भी तस्करी होने लगी है।
यह तथ्य इस बात को प्रमाणित करता है कि अवश्य ही इस खुरदरे और कुरूप दानें में कुछ अलौकिक और अद्भुत गुण समाये हैं।
आकार के अलावा रुद्राक्ष के दोनों में एक भेद ओर भी होता है। वो भेद सूक्ष्म होते हुए भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। उसी भेद के आधार पर रुद्राक्ष की प्रभावशीलता विश्लेषित की जाती है।
रुद्राक्ष का स्तर निर्धारण और मूल्यांकन उसके इस भेद पर ही निर्भर रहता है। वो भेद है- ‘रुद्राक्ष के मुख’
प्रत्येक दाने पर नींबू जैसी फांके और उनकी विभाजक रेखाएं प्राकृतिक रूप में बनी होती हैं। यह धारियां (रेखाएं) ही मुख कहलाती हैं। इन्हीं के आधार पर उस दाने का श्रेणीकरण, मूल्यांकन किया जाता है।
ये रुद्राक्ष (दाने) एकमुखी से लेकर इक्कीसमुखी तक के होते हैं। किन्तु एकमुखी से चैदहमुखी तक के दाने तो उपलब्ध हो जाते हैं, पर पन्द्रहमुखी से लेकर इक्कीसमुखी तक के दाने अत्यन्त दुर्लभ होते हैं और प्रायः देखने में ही नही आते। यों तो एकमुखी दाना भी दुर्लभ ही माना जाता है और आसानी से नहीं मिलता है।
दोमुखी से सातमुखी दानें भी मिल जाते हैं, लेकिन आठमुखी से लेकर चैदहमुखी दाने भी सहज ही सुलभ नहीं होते। उपर्युक्त रुद्राक्षों में सातमुखी दाने ही अधिक मिलते हैं। यह दाना दुर्बलता की कोटि में आता है, अतः इसकी कीमत भी बाजार में बहुत अधिक नहीं आंकी जाती है।
रुद्राक्ष की परख
ऽ वो ही रुद्राक्ष प्रयोज्य और प्रभावी होता है, जिसका दाना समूचा हो, कहीं से टूटा-फुटा, दरका या विकृत न हो। उस पर धारियां स्पष्ट हों, तथा कांटे उभरे हुए हों। दाना पानी में डूब जाए, तांबे के दो टुकड़ों के बीच में रखने से घूमने लगे। घना छिद्रयुक्त न हो, चमकीला और वजनदार हो, ऐसा दाना ही सर्वोत्तम और श्रेष्ठ माना जाता है।
ऽ असली रुद्राक्ष की पहचान के कुछ तरीके बताए जाते हैं जो इस प्रकार हैं।
ऽ रुद्राक्ष की पहचान के लिए रुद्राक्ष को कुछ घंटे के लिए पानी में उबालें यदि रुद्राक्ष का रंग न निकले या उस पर किसी प्रकार का कोई असर न हो, तो वह असली होगा।
ऽ रुद्राक्ष को काटने पर यदि उसके भीतर उतने ही घेर दिखाई दें जितने की बाहर हैं तो यह असली रुद्राक्ष होगा। यह परीक्षण सही माना जाता है, किंतु इसका नकारात्मक पहलू यह है कि रुद्राक्ष नष्ट हो जाता है।
ऽ रुद्राक्ष की पहचान के लिए उसे किसी नुकिली वस्तु द्वारा कुरेदें यदि उसमंे से रेशा निकले तो समझें की रुद्राक्ष असली है।
ऽ दो असली रुद्राक्षों की उपरी सतह यानि के पठार समान नहीं होती किंतु नकली रुद्राक्ष के पठार समान होते हैं।
ऽ एक अन्य उपाय है कि रुद्राक्ष को पानी में डालें अगर यह डूब जाए, तो असली होगा। यदि नहीं डूबता तो नकली लेकिन यह जांच उपयोगी नहीं मानी जाती है क्योंकि रुद्राक्ष के डूबने या तैरने की क्षमता उसके घनत्व एवं कच्चे या पके होने पर निर्भर करती है और रुद्राक्ष मेटल या किसी अन्य भारी चीज से भी बना रुद्राक्ष भी पानी में डूब जाता है।
रुद्राक्ष द्वारा रोगोपचार
दिमागी कमजोरी- कोई भी मुख वाला रुद्राक्ष लेकर, जलाकर उसकी भस्म बना ले और हरे आंवले के रस में घोलकर सिर के बालों की जड़ों में लगाएं। कुछ ही दिनों में दिमागी कमजोरी दूर हो जाएगी। यदि कम उम्र में ही बाल सफेद होने लगे हों, तो इस प्रक्रिया से बाल भी काले हो जाते हैं और काले ही निकलने लगते हैं।
मानसिक रोग- जो स्त्री पुरुष मानसिक रोग से ग्रस्त हों, उन्हें चारमुखी रुद्राक्ष को गाय के दूध में उबालकर पीना चाहिए। इससे कुछ ही दिनों में मन और मस्तिष्क के सभी विकार दूर हो जाते हैं। इसके प्रयोग करते रहने से स्मरण शक्ति का भी विकास होता हैं।
जोड़ों का दर्द- यदि जोड़ों का दर्द और पीड़ा गठिया के कारण हो, तो पांचमुखी दाने को सिल पर घिसकर, बकरी के दूध के साथ सेवन करने से कुछ ही दिनों में चमत्कारी लाभ होता है और गठिया का दर्द पीड़ा दूर हो जाती है।
कैंसर- आंवलासार रुद्राक्ष समस्त प्रकार के कैंसरों को दूर कर देता है।
दाग धब्बे- रुद्राक्ष वट वृक्ष के पीले पत्ते, काली अगर, पठानी, चमेली का पंचांग लोध कूट और लाल चंदन; सबको पानी के साथ पीसकर चेहरे पर लेप करें। कुछ ही दिनों में चेहरे के दाग धब्बे साफ हो जाएंगे।
बालों का न बढ़ना- रुद्राक्ष 1 भाग, तिल के फूल 4 भाग लेकर, चूर्ण बनाकर कपड़छान कर लें और धृत शहद के साथ मिलाकर सिर पर लेप करें, इससे बाल शीघ्र बढ़ने लगते हैं। दूसरी विधि में रुद्राक्ष, मुलहठी, मुनक्का और कमल, समान भाग लेकर कूट छान लें तथा गाय के दूध में मिलाकर उसमें तिल का तेल और गोधृत भी मिला लें। इसके लेप करने से बाल घने, चमकदार और सुंदर हो जाते है।
गंजापन- रुद्राक्ष के महीने चूर्ण को कटोरी के रस में मिलाकर सिर पर लगाएं। कुछ ही दिनों में गंजापन दूर हो जाता है। रुद्राक्ष के चूर्ण को परवल के रस में मिलाकर लगाने से भी गंजापन दूर हो जाता है।
झाइयां- रुद्राक्ष और मजीठ समान भाग लेकर उसका चूर्ण करें। फिर कपड़छान करने के बाद मक्खन में मिलाकर मुख पर लेप करें, इससे झाइयां दूर हो जाती हैं। अच्छा तो यही है कि रात में सोने से पूर्व लेप करें, लेकिन लेप करने से पहले चेहरे को हल्के गुनगुने पानी से अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए।
दुर्गन्ध- रुद्राक्ष, सफेद चंदन, खस और थोड़ा सा कपुर लेकर पीसें और चंदन के तेल में मिलाकर शरीर पर लगाएं (मले)। कुछ ही दिनों में शरीर की दुर्गन्ध दूर हो जाएगी।
वातज शोध- रुद्राक्ष, सोंठ, देवदारू, जटामासी, अरणी, रास्ना और बिजौरे की जड़, सबको एक समान लेकर पानी के साथ पीसें और लेप करें। वातज शोध में यह हितकर है।
पित्त दोष- रुद्राक्ष, मुलहठी, मूर्वा, खस, पदमाख, नरसल की जड़, नेत्रबाला, कमल और लाल चंदन, समान भाग लेकर पानी के साथ पीसें और लेप करें। इससे कुछ ही दिनों में पित्त दोष से उत्पन्न हुई शोध दूर हो जाती है।
अभिमंत्रित कर पहना रूद्राक्ष ही फलदायी
रुद्राक्ष का धार्मिक महत्व तो है परंतु ज्योतिषीय व आयुर्वेदिक महत्व भी कम नही है। इसे धारण करने, नित्य पूजा करने विविध रूपों में इसका उपयोग करने से सभी प्रकार की खुशी प्राप्त होती है। साधकों के लिए मुख्य रूप में एक मूखी से लेकर चैदह मुखी तक तथा गौरीशंकर रूद्राक्ष उपयोग में लाए जाते है। रूद्राक्ष एक फल होता है। इसका रंग, मुख व उस पर बना छिद्र प्राकृतिक रूप से होता है। यह मुख्यतः चार रंगों मे पाए जाते है।
1- श्वेत वर्ण
2- लाल वर्ण
3- पीत वर्ण
4- श्याम वर्ण
रूद्राक्ष धारण करने से जातक की अल्प आयु में मृत्यु नहीं होती। हृदय व रक्तचात रोग इसके धारण करने में समाप्त हो जाते है। रुद्राक्ष धारण करने के लिए सोमवार का दिन श्रेष्ठ है। तिथियों में द्वितीय, तृतीय, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, नवमी, दशमी, एकादशी व पूर्णिमा को भी रुद्राक्ष धारण कर सकते है। असली रुद्राक्ष रक्तचात, वीर्यदोष, बौद्धिक विकास, मानसिक शांति, पारिवारिक एकता, व्यापार में सफलता व क्षणिक उन्माद व गुस्सा शांत करता है। वैसे तो प्रत्येक रंग के रुद्राक्ष का महत्व है परंतु श्याम वर्णी (काला) रुद्राक्ष का अत्यधिक उपयोगी व लाभकारी है।
रुद्राक्ष में विद्युत शक्ति विद्यमान होती है जो कि मानव के शरीर से घर्षण करके हमें विशेष प्रकार की ऊर्जा प्रदान कराता है। शरीर इसे ग्रहण कर लेता है। अतः जातक के ग्रह प्रतिकूल होने पर रुद्राक्ष धारण करने से ग्रहों का अनुकूल फल प्राप्त होता है। शास्त्रों में कहा गया हैं-
रूद्राक्ष यस्यः गात्रेषु ललाटे च त्रिपुण्ड्रक्म।
स चाण्डालो­ऽपि सम्पूज्यः सर्ववर्णोत्तमो भवेत्।।
अर्थात् रुद्राक्ष को शिव का अंश माना गया है। वैसे तो यह अमूल्य फल ऋषियों के शरीर की शोभा है परंतु यह हर प्रकार से मनुष्य जाति के लिए उपयोगी है। यूं तो रुद्राक्ष को वैज्ञानिक आधार पर बिना मंत्र के उच्चारण किए भी धारण किया जा सकता है किंतु यदि शास्त्रीय विधि से अभिमंत्रित करके धारण किया जाए तो अति उत्तम रहता है। अतः रुद्राक्ष के प्रत्येक मुख के अनुसार इसे धारण करने के लिए अलग से मंत्र पाठ करने का नियम है।

Dus Mahavidya ki Aathvi Shakti / 10 महाविद्या की आठवी शक्ति


तन्त्रशास्त्र में दशमहाविद्याएं साधना के क्षेत्र म परमोच्य स्थान तो रखती ही हैं, साथ ही सृष्टि तत्व विज्ञान, पदार्थ विज्ञान भी इन विद्याओं में निहित है। दश महाविद्याओं का रहस्य गहन, गंभीर और निगूढ़ है। देवियों के रूप में दशमहाविद्या क्रम से (1) काली (2) तारा (3) षोडषी (4) भुवनेश्वरी (5) भैरवी (6) छित्रमस्ता (7) धूमावती (8) बगलामुखी (9) मातंगी और (10) कमलात्मिका प्रसिद्ध है और इनकी उत्पति कथा भी नारद पाश्चरात्र, स्वतंत्र तंत्र, कालिका पुराण, देवी भागवत आदि तांत्रिक, पौराणिक ग्रंथों में मिलती है, किन्तु जब हम वैज्ञानिक सार्वभौम दृष्टिकोण से दशमहाविद्याओं के रहस्य पर विचार करते हैं, तो वैदिक वाड्मय के आधार पर विस्तृत व्यापक रहस्य बोध होता है।

विद्या- आगन का आगमन निगम से होने के कारण आगम के संपूर्ण सिद्धान्त निगम पर निर्भर है। निगम में ‘त्रयी बह्मा’, ‘त्रयी विद्या’ और ‘वेदत्रयी’ रूप में ब्रह्मा, विद्या और वेद को परस्पर अभिन्न माना गया है। आध्यात्मिक दृष्टि से तीनों अभिन्न है, किन्तु भौतिक दृष्टि से तीनों भिन्न है,  विश्वसृष्टि से वेद, ब्रह्मा और विद्या इन तीनों तत्वों का आधिपत्य है। शब्द ब्रह्मा वेद तत्व है, विषय ब्रह्मा ब्रह्मा तत्व है और संस्कार ब्रह्मा विद्या तत्व है। शब्द सुनने से शब्दाकार का ज्ञान होता है, पदार्थ देखने से तदाकार ज्ञान होता है। इसलिए शब्द विषय भेद से ज्ञान दो प्रकार का होता है। जो ज्ञान शब्द पर निर्भर होता है, उसे वेद कहते हैं और जो ज्ञान विषयावच्छित होता है। उसे ब्रह्मा कहते है। वेद और ब्रह्मा के अतिरिक्त एक और ज्ञान होता है। शब्द सुनने से और विषय देखने से जो सामान्य ज्ञान होता है,यहि आगे चलकर जब विशेष रूप से परिणत हो जाता है, तो उसे संस्कार कहते है। शब्द और विषय दोनों ही सामान्य उत्पन्न कर विलीन हो जाते हैं, किन्तु वहीं सामान्य ज्ञान आगे चलकर जब अनुभव द्वारा विशेष भाव को प्राप्त करता हुआ आत्मा में अंकित हो जाता है तो दार्शनिक भाषा में उसे ‘अनुभवाहित संस्कार’ कहते है। वैज्ञानिक परिभाषा में इसी को ‘विद्या’ कहा जाता है। इसी से भविष्य का व्यवहार मार्ग चलता है।

जब तक संस्कार है तभी तक कोई स्व-स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं, उसी संस्कार का अभाव होने पर वह विश्वातीत है, मुक्त है। विश्व की संपूर्ण सत्ता संस्कार सत्ता पर टिकी हुई है। अवएव शब्द रूप वेद और विषय रूप ब्रह्मा की अपेक्षा संस्कार रूप विद्या की विधायिका है। उसी विद्या ज्ञान पर चितिक्रम से संस्कार पुट लगने से विश्व बनता है। जैसे हमारा विश्व हमारा संस्कार है, वैसे ही यह महाविश्व उसका संस्कार है। अतएव विश्व विद्यारूप है। संस्कारवच्छित होता हुआ वह ज्ञान मुर्ति विद्या है, शब्दावच्छित होता हुआ वही वेद है और विषयावच्छित बनकर वहीं ब्रह्मा है। उपर्युक्त विष्लेषण से सिद्ध है कि सृष्टि का संबंध विद्या से है। निगम और आगम दोनों विश्व का निरूपण करते है, इसलिए ये दोनों विद्या से प्रसिद्ध हुए। सूर्य-चन्द्र, ग्रह-नक्षत्र, औषधि, वनस्पति, धातु, रस, विष, कृमि, कीट, पशु, पक्षी, मनुष्य आदि प्रत्येक पदार्थ एक-एक विद्या है, विश्व के अंतर्गत ये सब क्षुद्र विद्या है और संपूर्ण विश्वविद्या महाविद्या है। इसी को महाविश्वविद्या भी कहा जाता है। इस महाविद्या को ऋषियों ने दस भागों में बांटा है। निगम में दश अवयव वाली विराट विद्या के नाम से प्रख्यात है। आगमशास्त्र ने दशमहाविद्याओं के द्वारा विश्व कैसे उत्पन्न हुआ ? उत्पन्न विश्व का क्या स्वरूप है, उस विश्व विद्या को समझने से क्या लाभ हैं ? उनकी उपासना से क्या उपलब्धि होती है ? इत्यादि प्रश्नों का समाधान किया है।

दशमहाविद्या की दश संख्या का रहस्य- विश्व की सृष्टि पुरुष और प्रकृति के समन्वय से हुई है। दर्शनशास्त्र उस पुरूष के ‘काल’ एवं ‘यज्ञ’ भेद से दो विवर्त मानता है। कालपुरुष व्यापक है आदि है और यज्ञ पुरुषसादि है, सीमित है। व्यापक काल पुरुष का ही थोड़ा सा प्रदेश सीमित होकर यज्ञ पुरुष कहलाता है। सृष्टि का प्रथम प्रवर्तक काल पुरूष है, और काल पुरुष का आश्रय लेकर यज्ञ पुरुष विश्व रचना में समर्थ होता है। यजुर्वेद और उपनिषदों के अनुसार उस महाकाल के उदर में अनन्त विश्व-चक्र घूम रहे है। यजुर्वेद में जिस तत्व को ‘काल’ कहा गया है, उपनिषद् उसे परात्पर कहती है। शतपथ ब्राह्माण परात्पर केा सर्वम त्युधन अमृत्व कहता है अमृत्व सत्य है और मृत्यृतत्त असत् है।

अन्तरं मृत्योरम तं मृत्यावमृतमाहितम्।

तदन्तरस्य सर्वस्य तदुसर्वस्याबाह्मतः।

यजुर्वेद के इस कथन के अनुसार दोनों एक दूसरे में ओत-प्रोत है।  एक निरंजन, निर्गुण, शांत, शाश्वत और अभय है, पूर्ण मृत्यु लक्षण है तो दूसरा साज्जन, सगुण, अशांत, अशाश्वत, समय और स्वलक्षण है। वस्तुतः दोनों में से एक सत् है, उसका कभी विनाश नहीं होता है। दूसरा असत् है और विनाश उसका स्वरूप है। ताप्तर्य यह कि सत् असत् रूप अमृत-मृत्यु की समष्टि ही ‘कालपुरुष’ ही है। इसी असीम परातपर में प्रतिक्षण विलक्षण धर्म वाली माया की शक्ति का उदय होता रहता है। वही माया बल उस असीम ‘कालपुरुष’ को ससीम बना देता है, जिसके प्रभाव से वह विश्वातीत, विश्वकार और विश्व बन जाता है। जो शक्ति काल को यज्ञ रूप में परिणत कर देती है, उसका नाम ‘प्रकृति’ है। इसी का समन्वय प्राप्त कर वह ‘कालपुरुष’ अपने कुछ एक प्रदेश से सीमित बनकर कामनाओं के चक्कर में फंस जाता है। एक-एक माया से एक-एक विश्व चक्र उत्पन्न होता है। माया बल अनन्त है अतएव उसमें अनन्त विश्वचक्र है। उसके रोम-रोम में ब्रह्माण्ड समाए हुए है। अनन्त विश्वाधिष्ठाता कालपुरुष उन सब पर शासन करता है। सात लोक चैदह भुवन सब ‘काल पुरुष’ से उत्पन्न हुए है। समस्त विश्व चक्रों की उत्पत्ति उसी से हुई।

अथर्व संहिता (19 16 153-54) का कथन है कि ‘तम’ के तीन भेद है-

अनुपारव्य, निरुक्त और अनिरुक्त

कालारंग, कोयला आदि पदार्थ निरुतम् है इनका निर्वचन विष्लेषण भली-भांति किया जा सकता है। आंख मंूदने पर छा जाने वाला अंधकार और घोर अंधियारी रात का अंधकार ‘अतिरुक्ततम’ है, क्योंकि इसका प्रत्यक्षीकरण तो होता है किन्तु निर्वचन नहीं। ‘निरुक्त’ विश्वसत्ता है और ‘अहः’ काल है, सृष्टि है। ‘अतिरुक्त’ रात्रिकाल-प्रलय है। अहोरात्रि की समष्टि विश्व है- यह ‘अनुपारव्य’ तम है, जो प्रलय काल में अनिरुक्त तम से ढका रहता है। इसी को वेद ‘पुरुष’ कहते है।

तम आसितमसाग्रजहमग्रेऽप्रकेतम्।

सलिलंसर्वमा इदम्।

तुच्छये नाम्ब पिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकम्।।

जो विश्वात्तीस अनुपाख्यतम है, वहीं ‘कालपुरुष’ है। इस विश्वाभाव रूप है अतएव सत् रूप होने पर भी ज्ञात चक्षुओं से अतीत है, इसलिए ऋषियों ने उसे ‘असत्’ कहा है। यहां पर असत् का अर्थ अभाव नहीं बल्कि विश्व काल में वह इसमें विलक्षण किन्तु सत् है।

असदेवेमग्र आसीत। तत् सदासीत्।

कथमसतः सज्जायेत्। तत् समभवत्।।

तद् अण्डं निरवर्तत्।।

वहीं असत् किन्तु सत् कालपुरुष महामाया से घिर जाता है। वह अपरितिम है, वहां पर कोई अभाव नहीं, कोई कामना नहीं, वह आप्त काम है, किन्तु उसी का माया प्रदेश जब सीमित हो जाता है तो वह आप्त काम न रह कर कामनामय बन जाता है। उसकी कामना का ‘एकोऽहं बहुस्याम’ यहीं रूप है। माया बल के अव्यवहित उत्तर काल में हृदय बल (केन्द्र शक्ति) उत्पन्न होता है। उसके उत्पन्न होने पर वही रसबलात्मक तत्व कामनामय होकर ‘मन’ यह नाम धारण कर लेता है। कामना या इच्छा मन का व्यापार है। ‘हत्प्रतिष्ठंयदजिरं’ (यजुर्वेद) के अनुसार मन हृदय में ही प्रतिष्ठित रहता है और कामस्तदगे्र समवत्तेताधि मनसोरेतः प्रथम यदासीत् (ऋग्वेद) के अनुसार सबसे पहले इस मन से विश्वरेत (शुक्ल) भूत कामना का उदय होता है। उसकी इस कामना से पच्चन् क्रम से पहले वेद नाम के ‘पुरज्जन’ का प्रादूर्भाव होता है। वेद  चार प्रकार के ऋक्, यजुः, साम और अथर्वण । त्रयीवेद अग्निवेद है और अथर्व सोमवेद है। त्रयीवेद स्वायम्भुव ब्रह्म है और अथर्व पारमेष्ठयसु ब्रह्म है। ब्रह्म आग्नेय होने से पुरुष है और सुब्रह्म सौभ्य होने से स्त्री है। त्रयी ब्रह्म के मध्य पतित यजुः भाग में ‘यतच्जूदो’ तत्व है। यत् गति तत्व है यह प्राण और वायु नाम से प्रसिद्ध है। प्राण, वाक् ब्रह्माकाश रूप में स्थिति गति तत्व की समष्टि यजुुर्वेद है। प्राण रूप ‘यत’ से काम से वाक्, जू भाग से सर्वप्रथम जल उत्पन्न होता है। इसी की व्याख्या शतपथ ब्रह्माण (6 11 13) में मिलती है-

सोऽपसृजत वाच एवं लोकात् वागेवमासृजत।

त्रयी ब्रह्म के वाक् भाग से उत्पन्न इसी ‘आप’ तत्व का नाम अथर्ववेद है। यजुः रूप स्वायम्भुख का पसीना की अथर्वरुप सुब्रह्म है (गोपथ ब्रह्माण 1 11 11) शतपथ (10 12 13 16 11) का वचक हैं कि

अयमेवाकाशों जूः यदिदमन्तरिक्षं तदेतद्यजुवद्य्रिुचान्तरिक्षच्च यच्च जूश्च तस्ताद्यजुः तदेतद्यजृः ऋक्सामयोंः प्रतिष्ठज्ञ। ऋकस्तवेहतः।।

इस प्रकार ऋक, यजुः, साम ‘यज’ ‘जू’ भेद से अग्निवेद चतुष्कल हो जाता है। दूसरा आपोमय सोम अथर्व है। यह मृगु और अंगिरा भेद से दो भागांें मंे विभक्त है। घन-तरल-विरल इन तीन अवस्थाओं के कारण भृगु आप, वायु और सोम इन तीन अवस्थाओं में परिणत हो जाता है। इस प्रकार आपोवेद ‘शट्कल’ हो जाता है। भृगु-अंडिरा रूप आपोवेदके साथ चतुष्कल त्रयीवेद का समन्वय होता है।

आपो भृग्वंडिरो रूपमापो भृग्वंडिरोऽयम्।

अन्तैरेते त्रयो वेदा भृग­ऽरंडिरसः श्रिताः।

उक्त श्कल सुब्रह्म सौम्य होने से स्त्री है और आग्नेय चतुष्कल त्रयी ब्रह्मा पुरुष हैं। दोनों के मिलन से ब्रह्म-सब्रह्मात्मक विराट् पुरुष का जन्म होता है। वह वेदमूर्ति पूर्ण पुरुष अपने आपकों इन्हीं दो भागांें में विभक्त कर विराट को उत्पन्न करता है।-

द्विधा कृतात्मनो देहमद्र्धेन पुरुषो­ऽभवत्।

अद्र्धेन नारी तस्यां स विराजमस जत प्रभुः।।

दशाक्षर विराट्- शतपथ ब्रह्माण (1 11 12) में ‘दशाक्षर वै विराट कह कर बताया गया है कि ऋक, साम, यत-जू, आप, वायु, सोम, यम, अग्नि और दशफल बन जाता हैं। अग्नि-सोम रूप ब्रह्म-सुब्रह्म के मिलन से उत्पन्न होने वाला वह विराट पुरुष ‘यज्ञ पुरुष’ है इसी से सारी सृष्टि की उत्पत्ति होती है। इसलिए इसे ‘प्रजापति’ विश्व विद्या का निगम-आगम के आधार पर दशावयव माना जाना उपयुक्त है। इन्हीं को दशहोता, दशाह आदि नामों से पुकारा जाता है।

यज्ञो वै दश होता (तै. बा. 2 12 11 16)

दशाक्षरा वै विराट् ( श. ब्रा. 1 11 11)

यज्ञ उ वै प्रजापतिः (कौ. ब्रा. 10 11)

प्रजापति वै दशहोता (तै. ब्रा. 3 12 16 11)

अन्तो वा एष यज्ञस्त यद्दशममाह (तै. ब्रा 2 12 16 11)

प्रतिष्ठा दशमहः (को. ब्रा. 2 19 12)

एतद्वै कृत्स्नमन्नाघं यद् विराट् (को. ब्रा. 1413)

विराट् विरमणाद् विराजनाद् वा (3 112)

‘न्युवाद् वा इमाः प्रजाः प्रजायनते’ शतपथ (11 11 12 14) ब्राह्मण के इस वाक्य अनुसार न्युन विराट् से ही सृष्टि की उत्पत्ति होती है। तात्पर्य यह कि पुरुष और स्त्री के संयोग से सृष्टि होती है, न कि पुरुष-पुरुष या नारी-नारी के मिलन से । पुरुष आग्नेय है और स्त्री सौम्य है, इसलिए सौम्य होने के कारण स्त्री आग्नेय पुरुष की भौग्या होती है। भौक्ता, भौग्या से प्रबल होता है, इसलिए स्त्री पुरुष की उपेक्षा न्युन होती है। इस न्युन संबंध से ही प्रजाओं की उत्पत्ति होती है। निष्कर्ष यह निकला कि दशाक्षर पूर्ण विराट से सृष्टि नहीं होती है, नवाक्षर के न्युन विराट से ही सृष्टि होती है। एक अक्षर कम हो जाने पर भी विराट का विराटत्व अक्षत बना रहता है-

न वै एकेनाक्षरेण छन्दांसि छन्दांसि वियन्ति न द्वाभ्याम्।

सर्वप्रथम कुछ भी नहीं था। केवल शुन्य बिन्दुु मात्र था। बिन्दु का अर्थ पूर्ण है। यह बिन्दु उन ब्रह्मक्षरों का पहला रूप है, जिनसे नव अक्षर का विराट उत्पन्न होता है पहले केवल शुन्य था, उस शुन्य से 1-2-3-4-5-6-7-8-9 ये नौ संख्याएं विकसित हुई है। नव पर संख्या समाप्त हो जाती है। 9 पर संख्या समाप्त होने पर शून्य के साथ 1 का संबंध जोड़ने से 10 संख्या बनती है। पुनः एक-एक संख्या का संबंध जोड़ने के क्रमशः 11, 12 आदि संख्याएं बनती है। 9 पर संख्या समाप्त होने के कारण 9 का संकलन-फल समान आता है।

1-2-3 आदि किसी संख्या का संकलन फल समान नहीं आता, अन्ततः 9 शेष रह जाते है। दसवां वही महत्वपूर्ण है। वही महाकाल नाम का विश्ववातीत परात्पर है। उस शून्य रूप पुरूष के उदर में नवां अक्षर विराट रूप यज्ञ पुरुष समाया हुआ है। उसी पूर्ण रूप को दसवां प्रतिष्ठा नाम अहः बतलाया गया है। इसी पूर्ण ब्रह्म का निरूपण श्रुति इस प्रकार करती है-

यस्मात् परं नापरमस्ति किच्चित्।

यस्मात्रणीयो न ज्यायोऽस्तिकिच्चित्।

वृक्ष इवस्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सवंय्।।

दस (10) संख्या मंे एक अंक स्वतंत्र विभाग है, वही बिन्दु है और 9 का जो विभाग है, वहीं विराट् है। यही दशा संख्या का वैज्ञानिक रहस्य है।

इस वैज्ञानिक विवेचन से सिद्ध है, कि वेदोक्त सृष्टि विद्या दस भागांे में विभक्त है। एक ही ‘पुरुष’ इस पुरुष बन रहा है। पुरुष प्रकृति से संबंद्ध है, इसलिए निगम मूलक आगन शास्त्र सृष्टि विद्यारूप इन दश शक्तियोें का निरूपण करता है। वहीं शक्तिप्रपच्च दशमहाविद्यानाम से ख्यात है।

महारुद्र की महाशक्ति बगलामुखी-

तंत्र शास्त्र की ‘बगलामुखी’ और वैदिक साहित्य की बगलामुखी दोनों ही एक है व्याकरण के लोपागम वर्णविकार पद्धति के अनुसार जिस प्रकार हिंस शब्द वर्णव्यत्यय से ‘सिह’ बन जाता है, उसी प्रकार निगम का ‘बाल्गा’ शब्द आगन शास्त्र में पहुंचकर ‘बगला’ रूप में परिणत हो जाता है। शतपथ ब्राह्मण (3 15 14 13) में बगलामुखी का उल्लेख इस प्रकार है।

यदा वै कृत्यामुत्खनन्ति अथ सालसा मोघा भवति।

तथो एवैश एतद्यद्यस्मा अत्र कश्चिद द्विशान भ्रातृव्यः

कृत्यां बल्गां निखनति तानेवैतदुत्किरति।।

बगलामुखी शक्ति कृत्याशक्ति (मारण, मोहन, उच्चाटन, कीलन, विद्वेषण में प्रयुक्त होने वाली है) इसकी आराधना से आराधक अपने शत्रु को मनमाना कष्ट पहुंचा सकता है।

बगलामुखी का संबंध अथर्वासुत्र से है अर्थवेदीय चिंतन के आधार पर बगलामुखी का तत्व चिन्तन इस प्रकार है-

हर प्राणी के शरीर से अथर्वा नाम का एक प्राण सुत्र निकला करता है। यह प्राण रूप है, इसलिए इसे स्थूल-दृष्टि सं नहीं देखा जा सकता। व्यावहारिक दृष्टि से इस अथर्वा प्राण सूत्र को इस तरह समझा जा सकता है-

दूरातिदुर बसे हुए किसी आत्मीयजन के दुःख से अकस्मात हमारा मन व्याकुल हो उठता है, परोक्ष रूप से उस दुख का संकेत और उसकी अनुभूति करने वाले परोक्ष सूत्र का नाम अथर्वासूत्र है। अथर्वासूत्र एक ऐसा शक्ति सूत्र है, जिसकी साधना करने से हजारों मील दूर स्थित व्यक्ति का आकर्षण किया जा सकता है। लोक व्यवहार में घर में प्रातःकाल कौवा बोलने से किसी अतिथि के आगमन की कल्पना की जाती है। कौवा को अतिथि के आगमन का संकेत अथर्वासुत्र से मिलता है। जिस अथर्वासूत्र हो हम नहीं जान पाते, उसे कुत्ते प्राणशक्ति द्वारा जान जाते है। कुत्तों द्वारा चोरांे, डाकुओं, हत्यारों का पता लगाने के प्रयोग का रहस्य यह है कि चोर, डकैत, हत्यारे जिस रास्ते से जाते हैं उस रास्ते में उनका अथवा प्राण वासना रूप से मिट्टी में समा जाता है। कुत्ते कपड़ा, नाखून, केश आदि अंग और अवयव सूंघकर अपराधी को पहचानते हैं। चिकित्सक विशेष रोगी का कपड़ा सूंघ कर रोग का निदान करते हैं, तांत्रिक किसी के द्वारा उपयोग में लाई गई किसी भी वस्तु पर मन माना प्रयोग करते है- इसका तात्पर्य यही है कि अंगों, अंगावयवों और उपयोग में लाई गई वस्तुओं आदि पर व्यक्ति के अथर्वाप्राण वासना रूप में विद्यमान रहते है।

अथर्वाप्राणों को प्रयोग ऋग्वेद काल से अब तक जन समाज मंे प्रचलित है, भले ही अब उसके वैज्ञानिक रहस्य का बोध हमें न हो अथवा किसी और विज्ञान विद्या से उसकी व्याख्या हम करें। ऋग्वेद में सरमा नाम की कुतिया द्वारा देवताओं की औरतों के अपहरणकर्ता पणियों का पता लगाना, देवताओं द्वारा असुरों पर कृत्या का प्रयोग करना इत्यादि घटनाओं के मूल में अथर्वासूत्र ही है। अथर्ववेद के घोर अंडिरस और अथर्व अंडिरस’ दो भेद हैं। घोर अंगिरा मंे औषधि, वनस्पति विज्ञान है और अथर्व अंगिरा में कृत्या (अभिचार कर्म) के प्रयोग हैं। बगला मुखी की रहस्य साधना के प्रतिपादक बगलामुखी मंत्र में बगलामुखी का जो प्रार्थना लोक है, उसमें बगला मुखी शक्ति के उपर्युक्त गुण कर्मो की निर्देशन मिलता है-

जिहृाग्रमादाय करेण देवी,

वामेन शत्रून् परिपीडयन्तीम्।

गदाभिघातेन च दखिणेन,

पीताम्बराख्यां द्विभूजां नमामि।।

Enemy Control Mantra / शत्रु पर विजय प्राप्ति हेतु बीज ‘क’ का ध्यान इस प्रकार है-


‘क’    जवायावकसिन्दूरसद्दशीं कामिनीं परां।

चतुर्भुजां त्रिनेत्रां च बाहुवल्लीविराजितां।।

कदम्बकोरकाकारः स्तनयुग्मविराजितां।

रत्नकडणकेयूरहारनूपुरभूषितां।।

एवं ककारं ध्यात्वा तु तन्मन्त्रं दशधा जपेत्।

शडकुन्दसमा कीर्तिर्मात्रा साक्षात्सरस्वती।।

कुण्डली चांकुशाकारा कोटिविश्रुल्लताकृतिः।

कोटिचन्द्रप्रतीकाशो मध्ये शून्यः सदाशिवः।।

शून्यगर्भस्थिता काली कैवल्यपददायिनी।

अर्थश्च जायते देवि तथा धर्मच्श्र नान्यथा।

ककारः सर्ववर्णानां  मूलप्रकृतिरेव च।

कामिनी या महेशानि स्वयं प्रकृतिसुन्दरी।।

माता सा सर्वदेवानां कैवल्यपददायिनी।

ऊध्र्वकोणे स्थिणा वामा ब्रह्मयशक्तिरितीरिता।।

वामकोणे स्थिरा ज्येष्ठा विष्णुशक्तिरितीरिता।

दक्षकोणे स्थिता शक्तिः श्रीरोद्री संहाररूपिणीं।।

ज्ञानात्मा सा तु चार्वडी चतुः षष्टयात्मकं कुलं।

इच्छाशक्तिर्भवेद्ब्रह्मा (दुर्गा) विष्णुच्श्र ज्ञानशक्तिमान्।।

क्रियाशक्तिभवेद्रुद्रः सर्वप्रकृतिमूर्तिमान्।

आत्मविद्याशिवैस्तत्वै पूर्णा मात्रा प्रतिष्ठिता।।

आसनं त्रिपुरा देव्याः ककारः पच्´दैवतः।

ईश्वरो यस्तु देवेशि त्रिकोणे तस्य संस्थितः।

त्रिकोणमेतत्कथितं योनिमण्डलमुत्तमं।

कैवल्यं प्रपदे यस्याः कामिनी सा प्रकीर्तिता।।

एषा सा कादिविद्या चतुर्वर्गफलप्रदा।

क्लीम

बीजाक्षर- ‘क्व’, जप संख्या- 1000, जप स्थान – मूलाधार, होम- रक्त पुष्प, बिल्व, तिल और यवों से 100 या 10 आहुतियाँ, मार्जन- 10 तर्पण- 10, श्लोक पाठ संख्या- 10, श्लोक पाठ आहुति- 1, पूजन यन्त्र- समचतुर्भुज के मध्य में ‘क्ली’।

मन्त्र

क्वणत्काच्´ी दामा करिकलभकुम्भस्तननता।

परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्रवदना।।

धनुर्वाणान्पाशं सृणिमपि द्धाना करतलैः।

पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहोपुरुषिका।।

भावार्थ- हे माँ! विश्व व्यापिनी कर्तुमर्तुमन्यथा कर्तु समर्था है श्री जगदम्बा! अनेक ब्रह्माण्ड रूप घुँघरूओं से बनी मधुर शब्द युक्ता यह करधनी आपकी ललित कटि में बँधी हुई है। बाल हाथी के गण्ड स्थलवत् मध्य मंे क्रमक्षीण आपके स्तन (विश्वपोषिणी शक्ति) भक्तों को पिलाने के लिए स्तोक झुके हुए हैं। आपका श्री मुख अनन्त कोटि शरच्चन्द्र श्री के समान परम शान्ति से भरा हुआ हैै। आपकी चतुर्भुजाओं में इक्षु धनु पाशांकुश तथा बाण दुष्टदमिनी भक्तरक्षिणी आपकी अनिर्वचनीय शोभा को बढ़ा रहे हैं। हे त्रिपुरारि, महाशिव परमेश्वर पर आवरण डालने वाली महामाया पुरुषिका! तेरी दया से हमे तेरा साक्षात्कार हो। तेरी ब्रह्माण्डमयी कटि-किंकिणि की मधुर ध्वनि तेरे साधकों तथा प्रेमी भक्तों को मायावरण के विचित्र कण्टक युत गर्तो से बचने के लिए चेतावनी देने वाली हो। श्री माँ के नीचे के वामहस्त में भ्रमर प्रत्यंच वाला इक्षु धनु (विवेक-बुद्धि) है। कमल, रक्त कैरव (करवीर), कल्कार, इन्दावर तथा सहकार पुष्प निर्मित पंचबाण हैं। ये पंचबाण (पंच तन्मात्रा) नीचे के दक्ष कर में हैं। ऊपर के वामकर में पाश (मन) है। ऊपर के दक्षिण कर में अंकुश (बुद्धि) है।

इन शस्त्रों का गुप्त भाव तीन प्रकार का है- 1. स्थूल (गुणमय), 2. सूक्ष्म (मन्त्रमय), और 3. पर (वासनामय)। शस्त्रों का गुणमय स्थूल रूप ऊपर बताया है। शेष दो रूप इस प्रकार हैं-

मन्त्रमय- 1. धनुष = स्वाहा ठः ठः, 2. बाण = द्रां द्रीं क्लीं ब्लूं सः, 3. अंकुश = क्रों, 4. पाश = हृीं।

वासनामय- 1. धनुष = मोक्ष, 2. बाण = काम, 3. पाश = अर्थ, 4. अंकुश = धर्म।

इस श्लोक के बीज ‘क्व’ का भाव अत्यन्त रहस्यमय तथा मोक्षद है। प्रत्येक की आपत्ति से दूर करने वाले इस मन्त्र का 224 अनुष्ठान पुरश्चरण सर्वसिद्धियों को देने वाला है। इस श्लोक में से वशीकरण बीज ‘ब्लू’ की उत्पति बताई है। यथा बाणान् में से ‘ब’ करतल में से ‘ल’, पुरमथितुः में से ‘उ’ और पौष्पं मेें से ‘बिन्दु’।

चन्द्र का अर्थ है – अर्द्धमात्रा बिन्दु। बिन्द्वावरण द्वितीया का चन्द्र शिव तथा माँ के मस्तक पर बताया है। बिन्द्वावरण का अर्थ है- जिसमें से बीज मन्त्रों का विस्फुरण हो। तृतीया नेत्र का अर्थ है- मूलाग्नि, लयात्मिका पृथ्क्कीरण शक्ति।

विधि- मन्त्र अगर ध्वनि शक्ति का चमत्कार है तो यन्त्र आकृति विज्ञान का परिणाम है इन दोनों का सम्मिलित रूप अनेक आश्चर्यजनक परिणाम प्रदान कर सकता है। हमारे धर्मगुरू जगद्गुरू पूज्यनीय शंकर भगवत्पाद ने यन्त्र मन्त्र की इस शक्ति को पहचाना और सौन्दर्य लहरी की रचना दो भागांे – आनन्द लहरी एवं सौन्दर्य लहरी में की। इनका सम्मिलित रूप ही ‘सौन्दर्य लहरी’ है।

उपरोक्त मन्त्र एवं यन्त्र अत्यन्त चमत्कारी है। इस यन्त्र को नियमित 1000 की संख्या में 12 दिन तक लिखें । इसके लिए स्वर्ण प्लेट, अनार की कलम और काली स्याही की आवश्यकता होती है। इसके माध्यम से हरेक वस्तु को प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए शुद्धता, श्रद्धा और विश्वास अनिवार्य हैं। यह प्रयोग मुख्यतः शुत्र पर विजय प्राप्त करने के लिए है।

How to win over Enemies / विरोधियों को कैसे बनायें अनुकूल तंत्र मार्ग

विरोधी चाहे जितना शक्तिशाली, बलशाली, उच्चपदासीन हो परन्तु आपके हर कार्य में बाधा उत्पन्न कर रहा हो और हर संभव प्रयास करने पर भी अनुकूल नहीं हो रहा हो तो उसे अपने अनुकूल बनाने के लिए तीन प्रणव ऊँ लगाकर गायत्री का जाप किया जाना उत्तम रहता है। जप काल में इस प्रकार का ध्यान रखा जाना चाहिए कि हमारे मस्तिष्क में से नील वर्ण का विद्युत प्रवाह निकलकर उसके मस्तिष्क में जा रहा है, जिसे कि अपने अनुकूल बनाना है और वह उससे प्रभावित होकर हाथ जोड़कर सामने खड़ा होकर प्रसन्न मुद्रा में हमारे अनुकूल विचारांे में बातचीत कर रहा है और अपनी मित्रता व सहयोग का आश्वासन दे रहा है। किसी भी व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए यह ध्यान अत्यन्त सफल है।

ऊँ ऊँ ऊँ भूर्भुवः स्वं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

शत्रु परिहार

शत्रु द्वारा नित्य हानि पहुँचाने वाली मनोवृत्ति व द्वेषभाव को परिवर्तन करना आवश्यक हो तो निम्न प्रकार से गायत्री की साधना करनी चाहिए।

जातक साधना काल में लाल वस्त्र धारण करें। ऊनी वस्त्र का आसन बिछाए। जिस व्यक्ति को द्वेष भावना से दूर करना हो, उसका नाम पीपल के पत्ते पर लाल चंदन की स्याही और अनार की कलम से लिखे। उसे उल्टा करके अपने सामने रख दे। चार ‘क्ली’ शब्द का अर्थात बीज मंत्रों का सम्पुट लगाकर गायत्री मंत्र का उच्चारण करे और प्रत्येक मंत्र के उच्चारण के पश्चात चम्मच से कुछ जल उस पत्ते पर छोड़ते जाए और यह भावना करे कि अमुक व्यक्ति कट्टर शत्रुता को भूलकर हमसे मित्रभाव से बातचीत कर रहा है। इस प्रकार कम से कम 108 मन्त्रों का जाप किया जाना चाहिए। सिंह की सवारी किए हुए, हाथ में खड्ग लिए भाव बनाए हुए दुर्गा वेषधारी गायत्री का ध्यान करना चाहिए। जप लाल चंदन की माला से करना चाहिए।

 

तारा यंत्र

सामग्री: लाल वस्त्र, ऊनी आसन, अनार की कलम, पीपल का पत्ता, लाल चंदन की स्याही, जल व जल-पात्र, लाल चंदन की माला।

क्लीं क्लीं क्ली ऊँ भूर्भुवः स्वं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।।

 

Tips to earn more Money / आय वृद्धि प्रयोग- लक्ष्मी चेटक प्रयोग


ऊपर के पृष्ठों में मैंने लक्ष्मी प्राप्ति से सम्बन्धित मंत्र प्रयोग दिये हैं, अब मैं कुछ चेटक तंत्र प्रयोग और मंत्रों का प्रयोग दे रहा हूं, जो कि पूर्ण हैं। मेरे शिष्यों ने इन प्रयोगों को किया है और इनमें वे सफल हूए है। सबसे पहले मैं लक्ष्मी चेटक दे रहा हूं।

इस प्रयोग में साधक को मात्र एक लाख मंत्रों का जप करना होता है और जब एक लाख मंत्र जप सम्पन्न हो जाय, जो गेहूं तथा चने बराबर मात्रा में ले कर दस हजार मंत्रों से आहुति देनी होती है। ऐसा होने पर लक्ष्मी प्रसन्न हो जाती है और उसके जीवन के सारे दुःख दारिद्रय और सन्ताप दूर कर देती है।

मंत्र

।। ऊँ श्रीं काककमलवर्द्धने सर्वकार्य

सर्वार्थान्देहि देहि सर्वकार्य कुरु कुरु

परिचय्र्यसर्वसिद्धिपादुकायां हं क्षं श्रीं

द्वादशान्नदायिने सर्वसिद्धिप्रदाय स्वाहा।।

इस मंत्र को जपने का कोई विशेष विधान नहीं है और न किसी विशेष मुहूर्त आदि की आवश्यकता हैं, इसमें आसन, वस्त्र, दीपक, पूजा, यंत्र, चित्र आदि की आवश्यकता नहीं है। यह चेटक मंत्र है और इसको मात्र ‘ऐश्वर्य माला’ से ही जपना होता है। मंत्र जप करने से तथा उसका दशांश हवन करने से कार्य सिद्ध हो जाता है।

 

कनकधारा

प्रयोग

शास्त्रों में यह कहा गया है, कि जिनके घर में कनकधारा यंत्र स्थापित नहीं है, उसके घर में लक्ष्मी का निवास कैसे हो सकता है? इसका तात्पर्य यह है, कि कनकधारा यंत्र और आर्थिक उन्नति एक दूसरे का पर्याय है।

कनकधारा यंत्र धातु से बना हुआ एक अद्वितीय यंत्र होता है और मंत्रसिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त होने के कारण यह स्वतः ही आर्थिक उन्नति देने में समर्थ होता है।

वस्तुतः यदि कोई साधक अपने घर में मंत्रसिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त ‘कनकधारा यंत्र’ स्थापित कर नित्य कनकधारा मंत्र की एक माला फेरे, तब भी उसके जीवन में आर्थिक उन्नति होती है। प्रयोग के रूप में इसका मंत्र प्रयोग एक लाख जप संख्या है, इसमें ‘कललगट्टे की माला’ या ‘स्फटिक माला’ का प्रयोग किया जाता है।

किसी भी बुधवार को प्रातः सूर्योदय से दस बजे के भीतर-भीतर स्नान कर, शुद्ध वस्त्र धारण कर इस यंत्र को किसी पात्र में स्थापित कर, इस पर केसर, अक्षत, पुष्प आदि चढ़ा कर कनकधारा मंत्र का जप प्रारम्भ कर दें।

मंत्र

।। ऊँ वं श्रीं वं ऐं हृीं श्रीं

क्लीं कनकधारायै स्वाहा।।

जब इस यंत्र पर एक लाख मंत्र जप सम्पन्न जप सम्पन्न हो जाय, तब इस यंत्र को अपने घर के पूजा स्थान में स्थापित कर दें और यदि व्यक्ति चाहे तो इसे अपनी दुकान में अथवा कार्यालय में भी स्थापित कर सकता है। माला तथा अन्य सभी सामग्रियों को किसी नदी या तालाब में प्रवाहित कर दें।

जिस दिन यह अनुष्ठान सम्पन्न होता है, उसी दिन से साधक को आर्थिक उन्नति अनुभव होने लग जाती है और आगे के जीवन में किसी भी प्रकार से कोई आर्थिक बाधा नहीं रहती और उसका व्यापार उन्नति की तरफ अग्रसर होता रहता है। वस्तुतः यह प्रयोग अपने आप में अत्यन्त महत्वपूर्ण है और जो श्री साधक अपने जीवन में आर्थिक उन्नति चाहते हैं, उनको चाहिए, कि वे इस मंत्र का प्रयोग अपने जीवन में अवश्य करें।

 

घण्टाकर्ण

प्रयोग

आर्थिक उन्नति प्राप्त करने क लिए इस प्रयोग को सम्पन्न किया जाता है। यह प्रयोग किसी भी महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को प्रारम्भ किया जाता है। यह प्रयोग 60 दिनों का है। इसमें नित्य ग्यारह मालाएं मंत्र जप किया जाता है। माला ‘कमलगट्टे’ की या ‘मूगे’ की प्रयोग में लानी चाहिए।

मंत्र

।। ऊ­ँ हृीं क्लीं घण्टाकार्णो

नमोऽस्तुते ठः ठः ठः स्वाहा।।

इसके अलावा इसमें अन्य कोई विधि-विधान नहीं है। यदि साधक इस प्रकार सम्पन्न कर लेता है, तो निश्चय ही उसे जीवन में पूर्णता प्राप्त हो जाती है। मंत्र जप के उपरान्त माला को किसी नदी या तालाब में प्रवाहित कर देना चाहिए। साधक को चाहिए, कि वह इस प्रकार का मंत्र जप अवश्य ही सम्पन्न करें।

 

लक्ष्मी बीज

प्रयोग

लक्ष्मी प्राप्ति के लिए यह प्रयोग महत्वपूर्ण है और इस बीज मंत्र का प्रयोग मनुष्य किसी भी समय कर सकता है। इसके लिए आवश्यक नहीं है कि साधक किसी एक स्थान पर ही बैठें या मंत्र जप करते समय हाथ में कोई माला या कोई अन्य सामग्री हो। यह आवश्यक नहीं हैं, कि साधक किसी विशेष रंग के वस्त्र धारण करे अथवा किसी विशेष रंग के आसन को बिछा कर तथा दीप जला कर ही बैठे।

यह तो बीज मंत्र है और इसका निरन्तर मानसिक जप, उठते-बैठते, सोते जागते किया जा सकता है। इस मंत्र जप को पुरुष या स्त्री कोई भी, किसी भी समय कर सकता है।

मंत्र

।। श्रीं।।

यह एक अक्षर का बीज मंत्र है और लक्ष्मी को अत्यन्त प्रिय है, इसका मानसिक जप करना उचित रहता है, इसके लिए किसी प्रकार की मंत्र गणना आवश्यक नहीं होती तथा इसे सम्पन्न करते रहना चाहिए।

 

श्री मन्जू घोष

प्रयोग

यह ”धन-धान्य लक्ष्मी प्रयोग“ भी कहा जाता है। दरिद्रता निवारण एवं घर में धन-धान्य, बुद्धि की दृष्टि से यह मंत्र प्रयोग अत्यन्त ही महत्पपूर्ण माना गया है। यह प्रयोग भोजन करते समय ही सम्पन्न किया जाता है। साधक को दिन में एक या दो बार आसन पर बैठ कर भोजन करना चाहिए। इसके अलावा दिन मंे अपने मुंह को जूठा नहीं रखना चाहिए।

भोजन करने से पूर्व जब थाली परोसी हुई सामने आ जाय जो हाथ जोड़कर मन ही मन निम्नलिखित मंजु घोष लक्ष्मी का ध्यान करना चाहिए-

शशधरमित्र शुभ्रं खड्ग पुस्तांक-पाणि।

चुरचिरमति -शान्तं पंचचूड़ कुमारम्।।

पृथुतर वर मुख्यं पद्म पत्रायनक्षं।

कुमति दहन दक्षं मंजु घोषं नमामि।।

यह प्रयोग अत्यन्त महत्वपूर्ण है और इससे शीघ्र ही धन  की प्राप्ति होने लगती है, आर्थिक अनुकूलता प्रारम्भ होती है और घर में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता। अर्थात् ‘चन्द्रमा के समान शुभ्र वर्ण वाले, एक हाथ में खड्ग तथा दूसरे हाथ में पुस्तक लिए हुए, अत्यन्त शान्त और मनोरम छवि वाले, जिनके मस्तक पर पांच चूड़ाएं हैं, ऐसे स्थूल शरीर वाले तथा कमल की पखुड़ियों के समान बड़ी-बड़ी आंखों वाले, दुर्बुद्धि को नष्ट करने मं समर्थ मंजु घोष को मैं प्रणाम करता हूं। उपरोक्त ध्यान के बाद नीचे लिखे षडाक्षर मंत्र को मन ही मन 108 बार जप करें। मंत्र जप के लिए हल्दी की माला की आवश्यकता होती है।

मंत्र

।।  अ र व च ल धीं।।

यह छः अक्षरों का मंत्र अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है, भोजन करते समय भी साधक को मन ही मन इस मंत्र का जप करते रहना ज्यादा श्रेष्ठ होता है।

भोजन कर चुकने के बाद थाली में पानी डालकर उसमें उंगलियों को डूबो कर इन अक्षरों को लिख दे और फिर भोजन समाप्त कर खड़े हो जाए। भोजन समाप्त कर हाथ-मुंह शुद्ध कर पुनः इस मंत्र का मन ही मन 108 बार उच्चारण करे।

यह प्रयोग अत्यन्त महत्वपूर्ण है और इससे शीघ्र ही धन  की प्राप्ति होने लगती है, आर्थिक अनुकूलता प्रारम्भ होती है और घर में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता।

 

वसुधा लक्ष्मी

प्रयोग

इस मंत्र को सभी मंत्रों में श्रेष्ठ कहा गया है। कहा जाता है, कि जीवन में जितने भोग हैं, वे सभी इस मंत्र के प्रभाव से प्राप्त हो जाते हैं। सामान्य रूप में यह प्रयोग आर्थिक उन्नति और भूमि सम्बन्धी कार्याे में सफलता प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यदि साधक के जीवन में मकान बनाने की इच्छा हो या उसका मकान पूरा नहीं हो रहा हो अथवा जमीन सम्बन्धी कोई विवाद हो, तो इस मंत्र का दस हजार जप करने से ही अनुकूलता प्राप्त होती है।

यह प्रयोग ‘श्रीयंत्र’ के सामने किया जाता है। यह श्रीयंत्र दिव्य मंत्रसिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त होना चाहिए और लाल वस्त्र पर इस श्रीयंत्र को स्थापित कर, उसके सामने अगरबत्ती व दीपक लगाकर, इस मंत्र की कमलगट्टे की माला से नित्य एक माला फेरनी चाहिए।

मंत्र

।। ऊँ ग्लौं श्रीं अन्नं महृयं में तेह्यन्नाधिपतये

ममात्रं प्रदापय स्वाहा श्रीं ग्लौं ऊँ ।।

वस्तुतः यह मंत्र महत्वपूर्ण है और 18 अक्षरों वाला यह मंत्र जीवन में पूर्णता देने के लिए अनुकूल है। कहते है कि दस हजार मंत्र जप से साधक का पूर्णता एवं अनुकूलता प्राप्त हो जाती है। दस हजार मंत्र जप पूर्ण होने के बाद साधक अनुष्ठान समाप्त कर वसुधा माला को नदी में प्रवाहित कर दे व श्रीयंत्र को तिजोरी में स्थापित कर दे।

 

गोमती-चक्र

प्रयोग (प्रथम)

यह प्रकृति का मानव को श्रेष्ठ वरदान है, जिस पर कई प्रकार के तांत्रिक मांत्रिक प्रयोग सम्पन्न किये जाते हैं। यह स्वयं ही व्यापार एवं लक्ष्मी का पर्याय है, अतः प्रत्येक गृहस्थ के घर में गोमती चक्र का पूजा स्थान में होना आवश्यक माना जाता है। साधक सोमवार को प्रातः सूर्याेदय के समय इस चक्र को दूध से और फिर जल से धोकर किसी पात्र में चावल बिछा कर उस पर चक्र को स्थापित कर लेना चाहिए और सामने दीपक लगा लेना चाहिए।

इसके बाद निम्न मंत्र की पांच मालाएं फेरनी चाहिए, इस प्रकार याह प्रयोग मात्र 14 दिन का है और इन 14 दिनों में कुल 70 मालाएं फेरने का विधान है। इसमंे ‘गोमती माला’ का प्रयोग किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में दुर्भाग्य हावी हो गया हो या आर्थिक सफलता नहीं मिल रही हो या व्यापार में अनुकूलता प्राप्त नहीं हो रही हो, तो उसे साधना  अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए। यह साधना सरल और लधु होने के साथ ही निश्चित व श्रेष्ठ फलदायक है।

मंत्र

।। ऊँ हृीं महालक्ष्मी श्रीं चिरलक्ष्मीं

ऐं ममगृहे आगच्छ आगच्छ स्वाहा।।

जब 14 दिन पूरे हो जाएं, तो इस प्रकार के गोमती चक्र को अपने पूजा स्थान में या दुकान में स्थापित कर देना चाहिए और माला व चावलों को लाल रंग के वस्त्र में बाधकर नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए।

 

गोमती-चक्र

प्रयोग (द्वितीय)

किसी भी बुधवार को बाजोट पर बिछी पीली सरसों पर गोमती चक्र को स्थापित कर देें तथा सामने दीपक लगाकर निम्न मंत्र का जप करें-

मंत्र

।। ऊ­ँ हृीं लक्ष्मही दुर्भाग्यनाशिनी

सौभाग्य प्रदायिनी श्रीं स्वाहा।।

यह मंत्र जब भी सुविधा हो, जप सकते हैं, इसका कुल दस हजार मंत्र जप होता है और यह प्रयोग दस या पन्द्रह दिन से सम्पन्न होना चाहिए। इस प्रयोग में ‘मूगे की माला’ का जप किया जाता है। जब प्रयोग सम्पन्न हो जाय, तब वह सरसों, गोमजी चक्र व माला सहित तालाग अथवा नदी में विसर्जित कर देनी चाहिए।

इस प्रकार का प्रयोग दरिद्रता नाश के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है और सबसे बड़ी बात यह है, कि यदि साधक पर, उसके परिवार पर अथवा उसके व्यापार पर किसी प्रकार का कोई तांत्रिक प्रभाव होता है, तो इस प्रयोग से वह तांत्रिक प्रभाव भी समाप्त हो जाता है।

इस प्रयोग से व्यापार में आश्चर्यजनक उन्नति होने लगती है और बिक्री बढ़ जाने के साथ-साथ व्यापार में भी पूर्ण अनुकूलता आने लगती है, शत्रु परास्त हो कर किसी प्रकार से हानि पहंुचाने में अक्षम हो जाते हैं। मेरी राय में यह प्रयोग उसके लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है, जो अपने व्यापार को श्रेष्ठ स्तर पर देखना चाहते है। उसको चाहिए कि, वे इस प्रयोग को अवश्य सम्पन्न करें।

 

गोमती-चक्र

प्रयोग (तृतीय)

यह प्रयोग शत्रु नाश, राज्य बाधा निवारण एवं मुकदमों में सफलता प्राप्ति के लिए किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति व्यापार में हानि पहुंचा रहा हो या प्रतिस्पर्धा हो अथवा आपकी साख को गिराने की कोशिश कर रहा हो, तब भी इस प्रकार के प्रयोग को करने से सफलता मिलती है।

इसके अलावा यदि किसी दुष्ट व्यक्ति ने आपसे रुपये या धन लेकर लौटाने से मना कर दिया हो या वापस रुपये नहीं दे रहा हो या धोखा देने का प्रयास कर रहा हो अथवा कहीं रुपये फंस गये हों या इसी प्रकार की कोई अन्य समस्या सामने आ रही हो, तो यह प्रयोग अत्यन्त अनूकूल एवं महत्वपूर्ण माना गया है।

इस प्रयोग के लिए मंगलवार को किसी पात्र में मुट्ठी भर काली मिर्च रख कर उस पर गोमती चक्र स्थापित कर देना चाहिए, यह गोमती चक्र मंत्रसिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त होना चाहिए।

साधक सर्वप्रथम हो हाथ में जल लेकर संकल्प लेना चाहिए, कि मैं अमुक कार्य विशेष के लिए यह प्रयोग कर रहा हूं और मेरा वह कार्य सिद्ध हो।

इसके बाद अपने सामने तेल का दीपक लगा लें और निम्न मंत्र का ‘लाल हकीक माला’ से 51 माला मंत्र जप करें। ऐसा नित्य 21 दिनों तक करें, इस दीपक में किसी भी प्रकार का तेल प्रयोग में लिया जा सकता है-

मंत्र

।। ऊँ क्लीं शत्रुन्नाशय ऐं

कार्य सिद्धयर्य हृीं लुप्त धन

प्राप्त्यर्थ श्रीं नमः।।

जब यह प्रयोग समाम्त हो जाय, तब गोतमी चक्र, लाल हकीक माला और उस काली मिर्च को किसी मंगलवार को रात्रि को जमीन में गड्डा खोदकर गाड़ देना चाहिए। यह काम साधक स्वयं या उसका कोई शुद्ध वर्ण का नौकर सम्पन्न कर सकता है।

ऐसा करने पर कुछ ही दिनों में साधक को अनुकूल फल प्राप्त हो जाता है और जिस उद्देश्य के लिए वह यह प्रयोग करता है, उसमें सफलता मिल जाती है। वस्तुतः यह प्रयोग अत्यन्त महत्वपूर्ण, श्रेष्ठ और प्रभावयुक्त है और साधक को इसका प्रभाव तुरन्त हीे अनुभव होता है।

 

बिल्ली की नाल

प्रयोग

बिल्ली जब बच्चे को जन्म देती है, तो जो नाल गिरती है, यह नाल लक्ष्मी से सम्बन्धित अनुष्ठान में एवं प्रयोगों मं अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है।

इस पर कई प्रकार के प्रयोग किये जाते है, मैं यहां पर केवल दो प्रयोग दे रहा हूं।

इसमे पहला प्रयोग लक्ष्मी से सम्बन्धित है और दूसरा प्रयोग वशीकरण से सम्बन्धित है।

पहल प्रयोग के लिए इस प्रकार की बिल्ली की नाल प्राप्त कर लेनी चाहिए, पर सामान्य रूप से प्राप्य बिल्ली की नाल प्रयोगों के लिए अनुकूल नहीं होती है, विशेष मंत्रों से चैतन्य बिल्ली की नाल ही प्रभाव युक्त मानी गयी है।

किसी भी शनिवार को इस बिल्ली की नाल को किसी बाजोट के ऊपर एक ताम्रपात्र में रख कर साधक को सामने अगरबत्ती व दीपक लगाना चाहिए।

इसके बाद मंत्र जप प्रारम्भ कर देना चाहिए। इसमे आसन या वस्त्र का कोई विशेष विधान नहीं है तथा यह भी विधान नहीं है, कि वह किसी विशेष दिशा में मुंह करके बैठे, साधक चाहे तो हाथ पैर धोकर भी इस प्रयोग में बैठ सकता है।

यह प्रयोग एक लाख मंत्र जप का है तथा इसमें दिनों की सख्या निर्धारित नहीं है, थोड़ा-थोड़ा करके नित्य मंत्र जप किया जा सकता है। मंत्र जप ‘स्फटिक माला’ से किया जाता है।

मंत्र

।। ऊँ नमो आगच्छ सुरसुन्दरी स्वाहा।।

जब एक लाख मंत्र जप सम्पन्न हो जाय, तब उस बिल्ली की नाल को उठा कर उस स्थान पर रख देना चाहिए, जहां रुपये-पैसे, गहने या द्रव्य आदि रखा जाता है। माला को किसी नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।

जब तक वहां ऐसी बिल्ली की नाल रहेगी, तब तक उसके जीवन में निरन्तर आर्थिक उन्नति होती रहेगी और उसे जीवन में भौतिक दृष्टि से किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहेगा।

वस्तुतः यह प्रयोग अत्यन्त महत्वपूर्ण है और जो भी जीवन में स्थाई सम्पत्ति और पूर्ण आर्थिक अनुकूलता चाहते हैं, उन्हे अवश्य ही इस प्रकार का प्रयोग सम्पन्न करना चाहिए।

मेरी राय में यह अन्य प्रयोगोे की अपेक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण और तीव्र प्रभावों से युक्त है।

द्वितीय प्रयोग भी शनिवार को ही प्रारम्भ किया जाता है। इसमें भी दिशा या आसन का कोई बन्धन नहीं है।

बिल्ली की नाल की बाजोट पर किसी ताम्रपत्र में रख कर सामने तेल का दीपक लगाना चाहिए।

फिर नीचे लिखे मत्र का एक लाख मंत्र जप किया जाता है। इसमें भी दिनों की संख्या निर्धारित नहीं है, पर मंत्र जप एक लाख होना आवश्यक है।

जप ‘सफेद हकीक माला’ से किया जाता है।

मंत्र

।। ऊँ क्लीं हृीं आगच्छ मनोहरे स्वाहा।।

जब एक लाख मंत्र जप सम्पन्न हो जाय, तो किसी चांदी के ताबीज में इस बिल्ली की नाल को भर कर वह ताबीज गले में पहन लेना चाहिए या बांह पर बांध लेना चाहिए।

माला को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है।

जो व्यक्ति इस प्रकार का ताबीज धारण करता है, उस पर किसी प्रकार का कोई तांत्रिक प्रभाव असर नहीं करता, वह स्वयं कामदेव के समान आकर्षक हो जाता है और उसके चारों तरफ विलासिनी स्त्रियों को जमघट लगा रहता है।

यदि किसी पुरुष या स्त्री पर वशीकरण प्रयोग करना हो, तब उपरोक्त मंत्र का मन ही मन पांच बार उच्चारण कर उस व्यक्ति या स्त्री का नाम लिया जाय, तो यह वश में हो जाती है और मनोनुकुल कार्य करती है।

 

धन प्राप्ति कारक

यंत्र

जहां जीवन मंे मंत्रो का प्रभाव तुरन्त होता है, वहीं पर कुछ यंत्र ऐसे भी होते है, जिनका प्रयोग करने से तुरन्त ही कार्य मंे सिद्धि प्राप्त होती है और आर्थिक दृष्टि से अनुकलता प्राप्त हो जाती है।

किसी भी सोमवार को निम्नलिखित यंत्र भोजपत्र पर बना कर (अष्टगन्ध से यह यंत्र भोज पत्र पर लिखना चाहिए) धूप, दीप जलाकर चांदी के ताबीज में भर कर दाहिने हाथ की भुजा में बांधे तो उसे जीवन में निश्चय ही आर्थिक उन्नति प्राप्त होती है

वस्तुतः यह प्रयोग अपने आप में छोटा सा दिखाई देता है, परन्तु महत्वपूर्ण है। जो भी साधक इस प्रकार का प्रयोग करे, उसे निश्चय ही लाभ प्राप्त होती है।

Tips for getting Land and building a home / भूमि एवं भवन प्राप्ति प्रयोग

मनुष्य के जीवन में अपना घर होना बहुत ही आवश्यक है, और यह कर्म तथा भाग्य दोनोें पर निर्भर करता है। जब कोई अपने द्वारा संचित धन से भूमि खरीदकर उस पर मकान बनाता है तो उसके मन में प्रसन्नता से भूमि खरीदकर उस पर मकान बनाता है तो उसके मन में प्रसन्नता हजार गुना हो जाती है। लोकोक्ति में एक कहावत है कि किराये के महल से अपनी झौपड़ी अच्छी होती है। पाठकों के लाभार्थ भूमि और भवन से सम्बन्धित यह प्रयोग है, जिसे प्रयोग में लाकर लाभ उठाया जा सकता है। प्रयोग सिद्ध है। विधि इस प्रकार है।

शुक्ल पक्ष के किसी भी बुधवार को प्रातः अपनी नित्यक्रिया स्नानादि से शुद्ध हो पीले रंग के सूती आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुँह करके बैठ जाये। अपने सामने एक थाली तांबा या कांसा की रखकर उसमें कुमकुम से स्वास्तिक बनायें। स्वास्तिक के बीच में जहाँ बिन्दु लगाये जाते हैं, वहाँ पर चार साबुत सुपारी स्थापित करें। स्वास्तिक के बीच में चावल की एक ढेरी बनाकर उस पर पीला पुष्प रखें, पुष्प पर प्राण प्रतिष्ठा युक्त लक्ष्मीयन्त्र स्थापित करें। सर्व प्रथम हाथ जोड़कर प्रार्थना करें-

यावच्चं सूर्यश्च यावद् देवा वसुन्धरा।

तावन्मम गृहे देवि अचला सुस्थिरा भवः।।

यावद् ब्रह्यादयों देवामनु भुञज चतुर्दशा

तावन्मम गृहे देवि अचला सुस्थिरा भवः।

यावद् तारागणकाशे यावद् इन्द्रादयोऽमरा।

तावन्मम गृहे दवि अचला सुस्थिरा भवः।।

विनियोगः- ऊँ अस्य श्री पृथ्वी मन्त्रस्य वाराह ऋषिः। निवृच्छन्दः। वसुधा देवतः। सर्वेष्ट सिद्धये जपे विनियोगः।

तदोपरान्त अपनी मनोकामना लक्ष्मी के समक्ष दोनों हाथ जोड़कर व्यक्त करें। स्वस्तिक में रखी चारों सुपारी उठाकर अपने बाएं हाथ की मुट्ठी में रखकर दाहिने हाथ से वसुधासौभाग्य ‘‘नीलीहकीक’’ माला से निम्न मन्त्र की चार माला जाप करें।

ऊँ नमो भगवत्यै धरण्यै धरणि धरे-धरे स्वाहा।

पूजा के समय इस बात का ध्यान रखें की बायें हाथ में सुपारी कसकर पकड़े रहे। मन्त्र जप के बाद माला को यन्त्र के पास थाली मे रख दें। चारों सुपारी बायें हाथ में दाहिने हाथ में लेकर मुट्ठी बाँधकर अपने सिर पर चार बार घुमायें, फिर उन सुपारियों को किसी चैराहे पर या खाली मैदान में जाकर पूर्व से दक्षिण परिक्रमा से चारों दिशाओं में फेंक दें। इस प्रकार यह पूजा कार्य चार बुधवार सम्पन्न करना है। हर बार नया स्वस्तिक बनाकर नई सुपारी प्रयोग में लानी है। चार बुधवार के बाद पूजा पूर्ण होने पर या हर बुधवार को लक्ष्मी जी की आरती अवश्य करें। पूजा पूर्ण होने के बाद माला और यन्त्र को जल मे प्रवाहित कर दें। यह एक अत्यन्त सिद्धिदायक श्रेष्ठ प्रयोग है।

Importance of Beesa Yantra / बीसा यन्त्रों के चमत्कार ‘‘ जिनके घर हो बीसा, उसका क्या बिगाड़ेे जगदीशा ’’

बीसा यन्त्रों के चमत्कार

‘‘ जिनके घर हो बीसा,

उसका क्या बिगाड़ेे जगदीशा ’’

अर्थ स्पष्ट है। बीसा यन्त्र एक ऐसा यन्त्र है जोे हर समस्या का समाधान करता है। इसी कारण इसे यन्त्रराज कहा जाता है। बीसा यन्त्र कई प्रकार के होते है। जैसा कार्य या समस्या हो, वैसा ही यन्त्र बनाया जाना चाहिए।

सिद्धि दाता बीसा यन्त्र

इस यन्त्र का निर्माण अष्ट गंध व स्याही से भोजपत्र पर सोने की कलम से लिखना उत्तम रहता है। स्वच्छ भोजपत्र लेकर गुरु पुष्य या रवि पुष्य को या पूर्णातिथि 5/10/15 तिथि को लिखना चाहिए। जिस समय यह मन्त्र लिखें उस समय आपका मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना आवश्यक है। अपने सामने धूप-दीप, अगरबत्ती जलती रहनी चाहिए। जब यन्त्र तैयार हो जाए तो जिसे यन्त्र दिया जाना है, वहाँ खड़ा हो जाए। यन्त्र को दोनों हाथों में लेकर मस्तक पर लगाएं और सदैव अपने पास रखें। ऐसा करने पर यह सदैव सभी कार्यो में शत प्रतिशत सफलता प्राप्त कराता हैं।

श्री लक्ष्मी बीसा

इस यन्त्र को ताम्रपत्र पर बनाकर आधी रात के समय केशरयुक्त रक्त चंदन से इस यन्त्र पर ऊँ के ऊपर ‘श्री’ लिखकर पीत पुष्प से, बिल्व-पत्र आदि से पूजन करें एवं 16 ऋचायुक्त श्री सूक्त का पाठ करें एवं 7 माला का जाप प्रातःकाल के समय करें। ऐसा नित्य करने से महालक्ष्मी की शीघ्र की कृपा हो जाती है। इस प्रयोग में संपुट लगाकर बीज मंत्र युक्त 7 पाठ करें तो उत्तमोत्तम फल की प्राप्ति होती है।

बीज मंत्रः ऊँ श्रीं हृीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं हृीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मयै नमः।

संपुट:     ऊँ दुर्गे स्मृता हरषि भीति मशेष जन्तोः,

स्वस्थैस्मृता मति मतीव ददासि।

दारिद्रय दुःख भय हारिणी कात्व दन्या,

सर्वोपकार करणाय सदार्द्र चित्ता।।

शिव-शक्ति बीसा यन्त्र

इस यन्त्र को शुभ मुुहूर्त में ताम्रपत्र पर बनवा लें, फिर नित्यप्रति स्नानादि कर साफ धुले वस्त्र पहनकर, पवित्र होकर कुश या ऊन का बना आसन बिछाकर अथवा मृगचर्म पर लाल वस्त्र बिछाकर बैठ जाना चाहिए। मस्तक पर ‘त्र्यम्बक’ मन्त्र से भस्म तिलक धारण करें! अपने सामने एक लकड़ी का पट्टा रखकर उस पर लाल कपड़ा बिछा दें और गंगाजल, पवित्र नदी जल, कूप, किसी सरोवर के जल से यन्त्र को स्नान करवा कर लाल चंदन, रोली, लाल कनेर, गुड़हल के पुष्प या अन्य किसी भी लाल फूलों से पूजन करें। फिर 1 माला अर्थात् 108 बार लाल चंदन की माला या रुदाक्ष की माला से मां भगवती के नवार्ण मंत्र का जाप करें।

नवार्ण मन्त्र:- ऊँ ऐं हृीं क्लीं चामुण्डाये विच्चेः।

जाप के बाद दुर्गा सप्तशती के चतुर्थ अध्याय सकरादय स्तुति कर नित्य पाठ करें। इस प्रकार प्रयोग करने से मां भगवती प्रसन्न हो जाती है। मन चाहा धन, स्त्री, संतान, विद्या, भौतिक, सुखों की पूर्ति करती है। देवी सभी प्रकार के रोगों, संकटों व शत्रुओं को नष्ट कर अभय का वरदान देती है।

सिंह बीसा यन्त्र

 

 

यह यन्त्र मां भगवती चण्डी का है। मां भगवती की असीम कृपा प्राप्त करने के लिए यह अचूक श्रेष्ठतम व उत्तम यन्त्र है जो सभी प्रकार की विपत्तियों को दूर करने के लिए श्रेष्ठ है।

ताम्रपत्र पर बनेे इस यन्त्र को पलास के पत्ते पर स्थापित करके पूजन किया जाना चाहिए। ऐसा करने पर हर प्रकार के शत्रु और विरोधी अनुकूल हो जाते हैं। इस यन्त्र को भोजपत्र पर लिखकर भूजा पर बांधने से शत्रु विशेष भयभीत होकर भाग जाता है। भयभीत शत्रु हार जाता है चाहे कितना ही बलवान क्यों न हो। अतः आत्म-विश्वास की वुद्धि, आत्म-विश्वास दृढ़ करने व शत्रु को भयभीत करने का यह सिद्ध बीसा यन्त्र है।

लक्ष्मी-दाता विजय बीसा यन्त्र

इस यन्त्र को लिखना हो तब ताम्रपत्र पर गुलाल छिड़ककर उस पर चमेली की कलम से एक सौ आठ बार मन्त्र लिखें। वही गुलाल या अन्य दूसरा गुलाल छांटता रहे। बारीक कपड़े में गुलाल रखकर पोटली बनाने से छांटने में सुविधा होगी। जब एक सौ आठ बार लिख लें, तब उसी समय अष्टगंध से भोजपत्र पर या कागज पर यन्त्र को लिखकर पास से रखना उत्तम है। व्यापार या क्रय-विक्रय का कार्य पास में यन्त्र रखकर करें। यदि संभव हो तो रोज धूप करें।

 

राम भद्र बीसा यन्त्र

 

भगवान राम की कृपा करने के लिए इस यन्त्र का निर्माण किया गया है। इसी कारण इस यन्त्र का नाम भी राम भद्र बीसा यन्त्र रखा गया है। ‘ ऊँ नमो राम भद्राय’ इस मंत्र को यन्त्र के प्रत्येक कोष्ठक में अंक क्रम से लिख लें, अर्थात 1 नं वाले कोष्ठक में ऊँ, 2. नं वाले कोष्ठक में ‘न’, 3 नं वाले कोष्ठक मंे ‘मो’, 4 नं वाले कोष्ठक मं ‘रा’, 6 नं. वाले कोष्ठक मंे ‘म’, 7 नं. वाले कोष्ठक मंे ‘भ’, 8 नं. वाले कोष्ठक में ‘द्रा’, 9 नं. वाले कोष्ठक में ‘य’ इस प्रकार से पूरा मंत्र इन आठों खानों में आएगा। पूरा मंत्र लिखकर इसी मंत्र का आठ माला जप करें। तत्पश्चात् ‘रामायण’ या ‘राम रक्षा स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए। मन्त्र सिद्ध होने पर श्रीराम जी की कृपा से सभी कार्य सफल होते है।

बाल रक्षा बीसा यन्त्र

 

इस यन्त्र की योजना में एक अक्षर बाएं से दाई ओर का एक खाना बीच में छोड़कर दो बार आया है जो रक्षा करने में बलवान है। इस यन्त्र को शुभ योग में भोजपत्र या कागज पर अष्टगंध से अनार की कलम से लिखें और लिखने के बाद भेट कर ऊपर रेशम का धागा लपेटते हुए नौ गांठे लगा दें। बाद मे धूप देवें तथा चांदी के ताबीज में रखें। गले में या कमर पर जहां सुविधा हो बांध लें। वास्तव में गले में बांधना श्रेष्ठ रहता है। इसके प्रभाव से बालक-बालिका के लिए भय, चमक, डर, उबरना आदि उपद्रव नहीं होते तथा हर प्रकार से रक्षा होती है।

सर्व कार्य सिद्धि दाता बीसा

 

इस यन्त्र के प्रभाव से जीवन के सभी कार्यो में सफलता प्राप्त होती है। यह यन्त्र ताम्रपात्र या भोजपत्र पर लिखकर तैयार कर अष्टगंध व चमेली की स्याही व स्वर्ण कलम से लिखें। शुक्ल पक्ष में शुभवार प पूर्णा तिथि (5/10/15) सिद्धि या अमृत योग, अमृत सिद्धि योग, रविपुष्य या गुरुपुष्य के दिन लिखकर रख लें। धूप-दीप करें। प्रातःकाल यन्त्र की स्थापना कर अपने सामने श्वेत आसन पर बैठकर निम्न मंत्र का जाप करें। जप संख्या न्यूनतम साढ़े बारह हजार व अधिकाधिक सवा लाख जप पूरा करें, फिर यन्त्र को अपने पास रखने से हर कार्य में सफलता मिलती है।

मंत्र: ऊँ हृीं श्रीं सर्व कार्य फलदायक कुरू कुरू स्वाहा।

यन्त्र तैयार हो जाने के बाद जब पास में रखा जाए और अनायास प्रसुतिगृह या मृत देह दाह क्रिया मंे जाना हो तो लौटकर यन्त्र को धूप देने मात्र से शुद्ध हो जाएगा।

श्री गरुड़ बीसा यन्त्र

 

इस यन्त्र को ताम्रपत्र पर बनवाया जाना चाहिए। ताम्रपत्र पर बने इस यन्त्र का नित्य पूजन करने से भगवान श्री विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। शत्रु भय नष्ट हो जाता है। सर्प दंश का तथा व्याधियों का भय दूर हो जाता है। इस यन्त्र को घर में दीवार पर घृत सिंदूर से बना देने पर घर में निवास करने वाले सभी सर्प एवं कष्ट घर छोड़कर भाग जाते है। यह गरुड़ यन्त्र है जो सर्प शत्रु है। सभी प्रकार से आनंद में वृद्धि करने वाला यह यन्त्र श्रेष्ठ फलदायक है।

श्री नारायण बीसा

 

इस यन्त्र का ताम्रपत्र पर खूदवा लें। प्रातः काल स्नानादि कर साफ धुले वस्त्र पहन, पवित्र होकर, दैनिक पूजा पाठ से निवृत्त होकर इस यन्त्र को श्रेष्ठ उत्तम आसन पर स्थापित कर लें तथा गंगा जल या पवित्र कुए-बावड़ी आदि के जल से स्नानादि कराएं। इसके बाद जल से स्नान कराएं। इसके बाद केशरयुक्त चन्दन या श्वेत चंदन के अंक क्रम से 1/2/3/4/6/7/8/9 व ऊँ नमो नारायण लिखें। इस मंत्र को आठों कोष्ठकों में लिखकर पुष्प-घृत दीपक आदि से पूजन करके इसी मंत्र का पाठ करें। माला जाप रुदाक्ष माला या स्फटिक माला से करें। श्री विष्णु सहस्त्रनाम या पुरुषसूक्त का पाठ करें तो भगवान विष्णु से प्रसन्नता प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार लक्ष्मी जी का निवास स्वतः हो जाता है। शत्रु संहार, भय, रोगादि का निवारण होकर जीवन परम सुखी हो जाता है।

शान्ति-पुष्टि दाता बीसा यन्त्र

 

शान्ति-पुष्टि प्राप्त करने के लिए यह यन्त्र श्रेष्ठतम व उत्तम माना गया है। जब उक्त यन्त्र तैयार करना हो तो स्वच्छ धुले वस्त्र पहनकर पूर्व दिशा की ओर देखते हुए बैठकर धूप-दीप रखकर इष्ट देव का स्मरण कर इस यन्त्र का आम के पटिये पर 108 बार गुलाल छिड़कर लिखें और विधि पूरी होने पर भोजपत्र या कागज पर अष्टगंध से लिखकर यन्त्र को अपने पास में रखें। जिसके लिए यन्त्र बनाया गया हो, उसका नाम यन्त्र के ऊपर लिखें अर्थात् मनुष्य के श्रेयार्थ ऐसा लिखकर शुभ समय में हाथ में चावल, सुपारी लेकर यन्त्र सहित दें। लेने वाला लेते समय तो आदर से लें और कुछ लेने वाला भेंट के नाम से धर्मार्थ खर्च करे। यह यन्त्र शुभ फलदायक है। शान्ति व पुष्टिदायक है। श्रृद्धा के साथ पास में रखें।

हंस बीसा यन्त्र

 

ताम्रपत्र पर इस यन्त्र को षोडषोपचार पूजन करने से अध्ययन में सम्पूर्ण सफलता प्राप्त होती है। स्मरण शक्ति को बल मिलता है। स्मरण शक्ति तीव्र होती है। भूल-जाने का कभी भय नहीं रहता। इस यन्त्र को भोजपत्र पर लिखकर धारण करने से बुद्धि कुुशाग्र हो जाती है। यन्त्र के प्रातः दर्शन करने से अन्तः करण पवित्र और निर्मल बनता है। इसी यन्त्र की कृपा से सरस्वती प्रसन्न होती है। अतः विद्यार्थियों हेतु यह यन्त्र उपयोगी है।

चतुर्भुज बीसा यन्त्र

 

यह यन्त्र धारण करने के लिए है तथा इसे भोजपत्र पर अष्टगंध की स्याही से अनार की कलम से शुभ मुहुर्त में तैयार कर विधिवत् पूजार्चन कर धारण करना चाहिए। ऐसा करने पर अकाल मृत्यु भय अर्थात् शत्रु भय नहीं रहता। भूत-प्रेत, पिशाच, डाकिनी-शाकिनी आदि से सदैव रक्षा होती है। हर प्रकार के उपद्रवों से रक्षा होती है।

सुख-सौभाग्य बीसा यन्त्र

 

यदि आप कार्य-व्यापार में निरन्तर हार रहे हैं। निरन्तर अथक प्रयास करने पर भी हानि से उबर नहीं रहे हो। व्यापार में बाधाएं आ रहीं हों या नौकरी में निरंतर विघ्न उपस्थित हो रहे है। सफलता व सिद्धि आप से दूर भाग रही है। ज्योतिषी कुण्डली देख कर अपार धन, विशेष सफलता, भाग्यवान होने की भविष्यवाणी करता है, पर वह भविष्यवाणी गलत सिद्ध हो जाती है और दरिद्रता है कि पिंड नहीं छोड़ती। ऐसे व्यक्ति को इस यन्त्र का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

विधिवत् पूजा करके दाहिनी भुजा पर या गले में धारण करना चाहिए। ऐसा करने पर सौभाग्य जाग जाता है। सिंदूर-घृत से दुकान या फैक्ट्री, कार्य-व्यापार स्थल पर लिखकर नित्य धूप-दीप करना उत्तम रहता है।

राम हृदय बीसा यन्त्र

 

तांबे पर या भोजपत्र पर लिखे इस यन्त्र का यथाशक्ति पूजन करके रामायण की किसी भी फलदायक चैपाई का पाठ करें। फिर राम-राम की 10 माला का जाप रोज करें। श्रीराम कृपा से इच्छित कार्य सिद्ध हो जाता है। फल की प्राप्ति बहुत जल्दी होती है।

गृह-क्लेश निवारण बीसा यन्त्र

 

जहां घर-गृहस्थी में छोटी-छोटी बातों पर अनायास क्लेश उत्पन्न हो जाते है, छोटी-छोटी समस्याएं जहां कुछ समय बाद समाप्त हो जाती हैं परन्तु कई बार ऐसा भी होता है कि उसे दूर करने में अनेक प्रकार के विघ्न और कठिनाईयां उत्पन्न हो जाती हैं और क्लेश, विघ्न दिन-प्रतिदिन बढ़ता रहता है। जैसे-जैसे दवा ली और मर्ज बढ़ता गया वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है। ऐसे समय में यह बीसा यन्त्र बहुत महत्त्वपूर्ण काम करता है। इस यन्त्र को भोजपत्र या कागज पर यक्षकर्दम से लिखना चाहिए। यन्त्र को लिखने के बाद यन्त्र को ऐसी जगह लगा देना चाहिए कि जिस पर सारे कुटुम्ब की दृष्टि पड़ती रहे और एक यन्त्र घर का मुखिया पुरुष अपने पास में रखें ओर पहला यन्त्र जिस जगह लगाया हो, वह शरीर भाग से ऊंची जगह पर लगाएं और रोज धूप देकर प्रार्थना करें तो क्लेश नष्ट हो जाएगा। प्रत्येक कार्य में श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए। इष्ट के स्मरण को कभी भूलना नहीं चाहिए। ऐसा करने पर कार्यसिद्धि अवश्य होता है।

सुदर्शन बीसा यन्त्र

 

इस यन्त्र को ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण करवाकर मकान निर्माण के समय पूजादि कर नींव में रख देने से मकान चिरकाल पर स्थायी रहता है। मकान में रहने वालों में सुख-शान्ति, आनंद-ऐश्वर्य बना रहता है। धन-धान्य, ऐश्वर्य की श्री वृद्धि होती हैै।

इस यन्त्र का कांसे की थाली में गेरु से लिखकर धूप दीप करके जल में घोल लें और उस घोल को प्रसूता स्त्री को पिलाने से प्रसव सुलभ होता है।

इसी यन्त्र को घी और सिंदूर से मकान की दीवार पर लिखने से हर प्रकार का कष्ट और अनिष्ट दूर हो जाता है।

विघ्नविनाशक बीसा

 

इस यन्त्र को भोजपत्र पर लिखकर अपनी दाहिनी भुजा पर बांधकर आप जो भी कार्य करना चाहें करंे, वह अवश्यमेव सिद्ध होगा।

आधे-अधुरे कार्य समय पर पूरे होंगे। घर में, दीवार पर, दुकान में या फैक्ट्री अथवा कार्य स्थान पर घी में मिलाकर, सिंदूर से लिखने पर घर में कलह, उपद्रव, विघ्न-बाधाएं, अशान्ति आदि समाप्त हो जाती है। खेत-खलिहान, बाग-बगीचे में गाड़ देने से खेत में होने वाले नुकसान रुक जाते है। पशु-पक्षी नुकसान नहीं करते। फसल चोरी होने का भय नहीं रहता। पैदावार में निरन्तर वृद्धि होती है।

पुरुष बीसा यन्त्र

 

इस यन्त्र को भोजपत्र पर लिखकर नित्य प्रातः नियमपूर्वक पूजन करते रहने से सभी प्रकार के संकट जीवन से दूर हो जाते हैं।

संकटनाशक शक्ति इस यन्त्र में है। रोगी या पीड़ित जिस रोग से या संकट से ग्रसित हो, वह उस कष्ट को इस यन्त्र के ऊपर लिखकर धूप-दीप करें। हाथ में, लाल वस्त्र में बांधकर धारण करें। रोग और संकट से मुक्ति मिल जाएगी। भूत-प्रेत और यक्ष-राक्षस आदि भी इस यन्त्र के धारण करने से दूर हो जाते हैं।

भूत-पिशाच-डाकिनी पीड़ा निवारण बीसा यन्त्र

 

जब ऐसा वहम हो जाए कि भूत पिशाच-डाकिनी आदि पीड़ा दे रही हैं और यन्त्र-मन्त्र-तन्त्र वालों की जानकारी प्राप्त की जा रही है। इस प्रकार के वहम प्रायः स्त्रियों में हो जाते हैं और ऐसे वहम का असर हो जाने से दिन भर सुस्ती रहती है, रोती हैं, रुग्णता रहती है और ऐसे वहम का असर से पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती है, और भी अनेक प्रकार के उपद्रव हो जाने से सारा परिवार चिन्तातुर हो जाता है और मन्त्र-तन्त्र वालों की तलाश करने में बहुत व्यय करते हैं। ऐसे समय में यह बीसा यन्त्र विशेष उपयोगी सिद्ध होता है।

इस यन्त्र को यक्षकर्दम से अनार की कलम से लिखना चाहिए। लिखते समय अपना मुंह उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। यन्त्र भोजपत्र पर अथवा कागज पर लिखकर दो यन्त्र तैयार करें। इस यन्त्र को ताबीज मंे डालकर गले में पहनें या हाथ पर बांध लें।

दूसरा यन्त्र नित्य प्रति देखकर डिब्बी में रख दें और जिस समय पीड़ा हो तब 2-4 मिनट तक आंख बंद किए बिना यन्त्र को एक दृष्टि से देखकर पुनः डिब्बी में रख दें। ऐसा करने पर पीड़ा दूर हो जाएगी। कष्ट मिट जाता है और अपव्यय से बचेंगे।

मण्डन बीसा यन्त्र

 

इस यन्त्र को भोजपत्र पर लिखकर मकान, तिजोरी में रखने से अन्न, धन-लक्ष्मी की कमी नहीं रहती है।

भोजपत्र पर बने इस यन्त्र को भूजा या गले में ताबीज में धारण करने से शरीरिक बल और स्वास्थ्य-सौंदर्य में वृद्धि होती है। यह यन्त्र भोजपत्र पर तैयार करके बाग या खेत में गाड़ देने से फल व अन्न की हानि नहीं होती है।

द्यूत बीसा यन्त्र

 

इस यन्त्र को सिद्ध करके अपने पास रखने से द्युत अर्थात् जुआ, सट्टा आदि में विजय श्री प्राप्त होती है।

इष्ट ग्रह कुमार बीसा

 

इस यन्त्र को पीपल के पत्ते पर लिखकर जिस ग्रह से पीड़ा या संकट हो उस ग्रह का नाम लिख लें और भूमि में गाड़कर उसके ऊपर उस ग्रह के मन्त्र से हवन करके नमस्कार कर दें। इस प्रकार से वह कुपित ग्रह शान्त हो जाता है। पीपल के पत्ते पर बने इस यन्त्र के ऊपर चोरी गई वस्तु का नाम लिख कर घी, धूप-दीप से पूजन करें। इस मंत्र की 40 माला का जाप प्रातः काल ब्रह्म-मुहूर्त मे करके इस यन्त्र का बहते जल में विसर्जन कर दें तो चोरी गई या खोई वस्तु मिल जाती है।

ताम्रपत्र या भोजपत्र पर यह यन्त्र बनाकर घर में रखें। घी, दीप, धूप से पूजन करें जो सुख -सौभाग्य की वृद्धि होकर सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिल जाती है। भोजपत्र पर लिखकर अपने पास रखने से सदा विजय प्राप्त होती है और वह व्यक्ति सबका प्रिय बन जाता है।

स्थानान्तरण बीसा

 

इस यन्त्र को किसी शुभ दिन प्रायः काल के समय 108 बार भोजपत्र पर लिखे जाने पर उन्हें बहते पानी में बहा दें तो साधक का स्थानान्तरण इच्छित स्थान पर हो जाता है।

गृह निर्माण बीसा यन्त्र

 

इस यन्त्र को गुरुपुष्य या रविपुष्य अथवा अमृत योग पूर्णा तिथि के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में अष्टगंध, रक्त चंदन या केशर से चमेली की कमल से भोजपत्र पर 11,000 बार लिखें तथा बताई क्रियानुसार मंत्र भी लिखें। इसे बहते जल में प्रवाहित कर दें तो इच्छित भवन निर्माण की पूर्ति होती है।

पद प्राप्ति बीसा यन्त्र

 

इस यन्त्र का लेखन बृहस्पतिवार से प्रारम्भ करें। यन्त्र रक्त चंदन से अनार की कलम से भोजपत्र पर लिखें । प्रतिदिन 101 यन्त्र लिखें व उन्हें जल मं प्रवाहित कर दें। कुल 5 हजार यन्त्र लिख कर जल में बहा देने पर पदवृद्धि अवश्य होती है।

त्रिभुज बीसा यन्त्र

यह यन्त्र 9 त्रिभुजों से निर्मित विशेष सफलतादायक बीसा है। इस यन्त्र को 21 दिन तक प्रतिदिन 101 की संख्या में अष्टगंध की स्याही से भोजपत्र पर लिखना चाहिए। लिखे हुए सभी यन्त्रों को आटा गूंथकर छोटी-छोटी गोलियां बना, उसमें लपेटकर मछलियों को खिला दें। अंतिम दिन स्वर्ण पत्र पर यह यन्त्र प्राण-प्रतिष्ठित करके गले में धारण करेें। ऐसा ही एक यन्त्र पूजा स्थान पर स्थापित कर दें। जिसका साधक नित्य धूप-दीप नैवेद्य से पूजन करता रहे तो इस यन्त्र के प्रभाव से व्यक्ति की निरन्तर अबाध गति से उन्नति होती है। शत्रुओं का बल नष्ट होता है। अपने प्रत्येक कार्य में सफलता प्राप्त होती है। अज्ञात इष्ट शक्ति कदम-कदम पर सहायता करती है।

Karz Mukti Upay / इन्हें भी आजमायें कर्ज मुक्ति विशेष


अनेक बार व्यक्ति को कुछ कार्यवश कर्ज लेना पड़ता है और कभी-कभी मित्रों एवं रिश्तेदारों को कर्ज देना भी पड़ता है। कई बार कर्ज लेने के बाद उसे चुकाना बड़ा मुश्किल हो जाता है। कर्ज कब लिया जाए और कर्ज कब दिया जाए। इस पर ध्यान देना आवश्यक है। इस आलेख में मैंने इन्हीं सब बातों का खुलासा उपायों के रूप मंे प्रस्तुत किया है। आप भी इन उपायों को अपनाकर लाभान्वित हो सकते है।

  1. यदि आपका कर्ज नहीं उतर रहा हो तो आप कर्ज की किश्त शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से आरम्भ करें।
  2. मंगलवार, संक्रान्ति, वृद्धि योग, हस्त नक्षत्र तथा रविवार को ऋण नहीं लेना चाहिए। इन दिनों कर्ज वापस करना शुभ होता है।
  3. प्रथम सोमवार (उपवास रखकर) को अशोक वृक्ष के नीचे बैठकर पूर्व की ओर मुख करके वृक्ष की पूर्व दिशा की मिट्टी इकट्ठी करें। फिर उसे छानकर एक कटोरी में रखकर, उसमें केसर की 11 सल, थोडा-सा हरसिंगार का इत्र, 11 नागकेसर, एक चुटकी चन्दन तथा काली गाय का दूध मिलाकर आटे के समान बनाएं। फिर उस गीली मिट्टी से भगवान शंकर की पिण्डी बनाएं। अब उसे धूप-दीप के साथ भोग अर्पित करके ऊँ नमः शिवाय मंत्र का 108 बार जप करें। प्रत्येक जप पर एक बिल्वपत्र अर्पित करें। इस प्रकार 108 बिल्वपत्र अर्पित करें। फिर प्रणाम करके घर आ जाएं और अर्पित प्रसाद बच्चों मे बांट दें।

अगले सोमवार को उसी पिण्डी पर मंत्र जप करते हुए पुनः 108 बिल्वपत्र अर्पित करें। इस प्रकार लगातार सात सोमवार व्रत रखकर उस पिण्डी की सेवा करें और बिल्वपत्र अर्पित करे। सातवें सोमवार को पिण्डी पर महाभोग अर्पित करके पूजन करें। पूजन के बाद पहले सोमवार से सातवें सोमवार तक अर्पित बिल्वपत्र में से सात पत्र चुनकर चांदी की किसी डिब्बी में रखकर अपने पूजा स्थल में रख दें और नियमित पूजन करें। पिण्डी व बचे बिल्वपत्र को किसी नदी में विसर्जित कर दें। व्र्रत में सिर्फ फलाहार ही करे। यह उपाय मां लक्ष्मी के स्थायी वास तथा कर्ज मुक्ति में लिए करते है।

  1. यदि आप अधिक कर्जदार हो और कर्ज उतरने का नाम नहीं ले रहा हो, तो किसी भी शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि को स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। फिर पूर्व की ओर मुख करके बैठ जाएं। अब एक हत्था जोड़ी को नीले धागे से 110 बार लपेटें। लपेटते समय ईश्वर से ऋण मुक्ति की प्रार्थना करें। जब 110 चक्र पूरे हो जाएं, तो श्री गणेशजी का स्मरण करके 28 बार ऊँ गं गणपत्यै ऋणहर्तायै नमः मंत्र का जाप करें। मंत्र जप के बाद हल्दी से रंगे पीले चावल अर्पित करते हुए पुनः इसी मंत्र का 35 बार जप करें। जप के बाद लाल अथवा गुलाबी वस्त्र पर हत्थाजोड़ी रखकर प्रणाम करके उठ जाएं।

अलगे दिन पुनः यही क्रिया करें। इस प्रकार नवमी तिथि तक यह प्रक्रिया करते रहें। नवमी की रात को उसी कपड़े में हत्थाजोड़ी को बांधकर अपने घर के किसी कच्चे स्थान पर दबा दें। फिर उस पर कोई वजनी पत्थर अथवा अन्य वस्तु रख दें। कुछ ही समय में आप कर्ज से मुक्त हो जाएंगे।

  1. बुधवार के दिन किसी को भी ऋण अथवा धन नहीं देना चाहिए अन्यथा उसके वापस आने में बाधा रहेगी।
  2. अगर आप निरंतर ऋण में फंसते जा रहे हों तो 6 शनिवार को श्मशान के कुएं का जल लाकर पीपल के वृक्ष पर चढ़ाएं। ऋण मुक्ति हो जाएगी।
  3. ‘अमृतसिद्धि’, ‘द्विपुष्कर’ अथवा ‘त्रिपुष्कर’ योग में कभी भी कर्ज नहीं लेना चाहिए।
  4. स्थिर लग्न में भी कर्ज नहीं लेना चाहिए। चर लग्न (मेष, कर्क, तुला तथा मकर) में लिया गया कर्ज जल्दी चुकाया जाता है, इसलिए चर लग्न में ही कर्ज लें।
  5. स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, अश्विनी, पुष्प अथवा विशाखा नक्षत्रों मे कर्ज ले सकते है, जिससे आप जल्दी ही कर्जमुक्त हो सकें।
  6. जब तक आप पूर्णतः कर्ज से मुुक्त न हो जाएं तब तक नियमित्र रूप से ऋणमोचक मंगल स्तोत्र और कवच का पाठ करते रहें। इसके प्रभाव से आप बहुत जल्दी ऋण मुक्त हो जाएंगे।
  7. यदि आपकी राशि का स्वामी बारहवें घर में हो तब भी आप ऋण चुकाना आरम्भ कर सकते है।
  8. यदि आपकी जन्म-पत्रिका के छठे भाव का स्वामी बारहवें भाव में हो तो आप ऋण की किश्त देना आरम्भ कर सकते है।
  9. यदि आपने मकान के लिए ऋण लिया है, तो शीघ्र ऋण मुक्ति के लिए हस्त नक्षत्र में प्लाॅट में लगाए गए आम के वृक्ष के नीचे बैठकर श्री सूक्त का पाठ करें। अति शीघ्र ऋण मुक्ति प्राप्त करेंगे।
  10. यदि आपकी जन्मपत्रिका में मंगल के साथ कोई पाप ग्रह हो, तो आप अपने नाम से मकान अथवा भवन के लिए ऋण न लें।
  11. यदि आपको निवास के लिए कर्ज लेना हो, तो जिस समय मंगल आपकी राशि में आए, उस समय शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार को आप ऋण ले सकते है।
  12. यदि आपको मकान के लिए कर्ज लेना हो, तो गोचर में जब आपकी जन्मपत्रिका के नवम अथवा चतुर्थ भाव के स्वामी के साथ चन्द्र आए, तब आप भवन के लिए ऋण ले सकते हैं।
  13. ऋण की प्रथम किश्त हनुमान जी के चरणों से स्पर्श कराकर दें।
  14. यदि आप अपने निवास के निर्माण के लिए कर्ज लेते हैं, तो मकान के निर्माण के समय विधिवत अभिमंत्रित श्रीयंत्र, वास्तुदोष निवारण यंत्र तथा श्री मंगल यंत्र को मकान मंे स्थान दें।
  15. जब आप किसी भी प्रकार के कर्ज की प्रथम किश्त का भुगतान करें, तो उस दिन हनुमान जी के नाम से दो गरीबों को भोजन कराएं।
  16. कर्ज की किश्त प्रथम मंगलवार से देना आरम्भ करें और उसी दिन सवा मीटर लाल कपड़े में 9 सौ ग्राम लाल मसूर किसी को दान करें। फिर लगातार तीन मंगलवार यह उपाय करते रहें। यह दान किसी ऐसे गरीब को दें, जो मंगलवार को दाल बनाकर अपने परिवार को खिलाए। इससे उपाय अधिक प्रभावी होगा।
  17. यदि आपने कर्ज लेकर मकान का निर्माण करवाया है, तो मकान में प्रवेश से पहले वास्तुपूजन अवश्य करवाएं। विधि-विधान से गृहप्रवेश करें तथा गृहप्रवेश के समय अपने इष्टदेव की तस्वीर लेकर प्रवेश करें। उस तस्वीर को पूजा स्थल में स्थान दें। प्रवेश के बाद नियमित रूप से सवा माह तक मुख्य द्वार पर किसी कन्या से हल्दी द्वारा स्वस्तिक का चिह्न बनावाएं। इसके प्रभाव से आप बहुत जल्दी कर्ज से मुक्त हो जाएंगे।
  18. शुक्रवार के दिन कमल का पुष्प लाकर लाल वस्त्र में लपेटकर अपनी तिजोरी में रख दें। धन का आगमन होने लगेगा और आपकी तिजोरी कभी खाली नहीं रहेगी।
  19. अगर लाभ मार्ग अवरूद्ध हो तो शुक्रवार के दिन से नित्य गोधूलि वेला में श्रीमहालक्ष्मी के सामने या तुलसी के पौधे के पास गौधृत का एक दीपक जलाएं। इससे धनागमन होने लगेगा।
  20. घर में केले के दो वृक्ष लगाकर नियमित रूप से उसे जल अर्पित करें। मां लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होगा। शुद्ध घी का दीपक अर्पित करने से जल्द ही ऋण मुक्त हो जायेगें।
  21. सवा 3 रत्ती का पन्ना चांदी की अंगूठी में जड़वाकर शुभ मुहूर्त में कनिष्ठा उंगली मंे शुक्ल पक्ष के बुधवार को धारण करें। आपकेे पास धन की कमी नहीं रहेगी।
  22. यदि आप अपने घर के भोजन में से तीन रोटी क्रमशः गाय, कुत्ता और कौए के लिए निकालें, तो कभी भी आर्थिक समस्या नहीं आएगी।
  23. नित्य प्रातःकाल भगवती लक्ष्मी को लाल पुष्प अर्पित करके दुध से बनी मिठाई का भोग लगाएं। आर्थिक संकट दूर होकर धन लाभ होगा।
  24. गूलर के जड़ को कपड़े में लपेटकर चांदी की तावीज में रखकर गले में धारण करने से आर्थिक संकट से मुक्ति मिलती है।
  25. यदि आप प्रत्येक सोमवार को नीम के वृक्ष में जल अर्पित करके शुद्ध घी का दीपक और अगरबत्ती अर्पित करें, तो आर्थिक संकट दुर होकर तीव्र गति से आर्थिक उन्नति होगी।
  26. यदि आप पर कोई आर्थिक संकट हो, तो प्रत्येक गुरुवार को बड़, पीपल और अशोक के 3-3 पत्तों का गुच्छा बनाकर 11 गुच्छों का बन्दनवार मुख्य द्वार के दोनों ओर टांगें। आर्थिक संकट दूर हो जाएगा।
  27. माह में एक बार किसी शनिवार को कुत्ते को इमरती तथा भिखारी को भोजन दान करें। इससे आर्थिक हानि में रूकावट आएगी।
  28. यदि आप किसी हिजडे़ या हरिजन को दान करते है, तो यह आपके लिए बहुत शुभ है। इस उपाय से भी आर्थिक हानि में रुकावट आएगी।
  29. शनिवार को शनिदेव का स्मरण कर सरसों के तेल से तिलक करें। आर्थिक हानि नहीं होगी।
  30. यदि आपको आर्थिक हानि अधिक होती हो, तो धन स्थान पर पीपल के कुछ पत्ते रखें, परन्तु पत्ते से पहले आप उन्हें गंगाजल से शुद्ध करें और हल्दी से स्वस्तिक का चिहृ बनाकर ही रखें। आर्थिक हानि नहीं होगी।

Lal Kitab remedies for Debts / लाल किताब और ऋण-मुक्ति

मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसके पूर्व जन्म के कर्मों के फल भी उसके साथ ही जुड़े रहते हैं। कोई अपने पूर्व जन्मों के कर्म के कारण अच्छे कुल (खानदान) में जन्म लेता है तो कोई गरीब की झोंपड़ी में। हर व्यक्ति का नसीब भी उसके साथ जुड़ा रहता है। एक गरीब व्यक्ति झोंपड़ी में जन्म लेकर भी अपनी मेहनत एवं लगन से आसमान की बुलन्दियों को छू लेता है तो कोई महलों में पैदा होकर सोने-चांदी के चम्मच से दुध पीने वाला भी बड़ा होकर ऐयाशी में अपने पिता-दादा के दौलत को उड़ा हर गरीब बन जाता हैै। यह किस्मत का खेल है जो व्यक्ति के साथ खेला जाता है।

इसी प्रकार कई व्यक्तियों की अच्छी तकदीर होने के बावजूद वे अपने पूर्वजों के पाप का, उनके कर्मों का, उनके गुनाहों की सजा भूगतते हैं। जो करीबी रिश्तेदार होगें जैसे-बेटा, भाई, भतीजा, पोता आदि, वह अपने पूर्वजों के कर्मो का फल इस जन्म में भोगेगा।

पितृ-ऋण

भारत के हर प्रान्त की परम्परा है कि कर्ज लेता है तो उसे कर्ज को चुकाने का फर्ज उसके पुत्रों का ही होता है। लाल किताब ने इसे ज्योतिष से जोड़ दिया है। आप मात्र अपने कर्मों का फल ही नहीं पूर्वजों के कर्मो का फल भी भोगते हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है-“कर्मण्येवााधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्“, अर्थात कर्म करते रहो, फल की चिन्ता न करो। फल का वंशानुगत प्रभाव इस बात से स्पष्ट है।

पारंपरिक ज्योतिष में कालसर्प नामक एक योग है। यह योग भी वंश-परम्परा के दोष को स्पष्ट करता है। पितृ-दोष के कारण ही व्यक्ति की कुण्डली में कालसर्प योग होता है एवं उसके परिवार में कई व्यक्तियों की कुण्डली में यह योग देखने को मिल जाता है प्रायः सारा परिवार ही इस योग के दोष से पीड़ित होता है। आर्थिक प्रगति रूक जाती है, घर का सुख-चैन छिन जाता है।

इसी प्रकार किसी परिवार के एक सदस्य की कुण्डली में केमद्रुम योग  होगा तो उस परिवार में पुत्र-पौत्र, भाई-भतीजा आदि की कुण्डलियों में यह योग स्थिर होगा। इस योग के कारण चन्द्रमा पीड़ित होता है और मानसिक परेशानियों के कारण जातक को व्यथित कर देता है। यह सत्य है कि पूर्वजों के कर्मो के फल भोगने ही पड़ते है। यही पूर्वजों का ऋण है अर्थात् पित्-ऋण है।

पितृ-ऋण को कैसे पहचाना जाय, किस प्रकार ज्ञात किया जाय कि अनिष्ट, पितृ-ऋण के कारण ही है ? किन पूर्वजों के पाप या कर्म के कारण है ? पितृ-ऋण के दोष का निवारण कैसे करे ?

लाल किताब में पितृ-ऋण के बारे में लिखा है-

घर नौवें हो ग्रह कोई बैठा बुध बैठा जड़ साथी जो।

ऋण पितर उस घर से होगा असर ग्रह सब निष्फल को।

साथी ग्रह जब जड़ कोई काटे दृष्टि मगर वह छुपाता हो।

5, 12, 2, 9 कोई मन्द, ऋण पितर बन जाता हो।।

जन्म कुण्डली में जिस ग्रह की राशि में उसका शत्रु ग्रह बैठकर उसके फल को नष्ट कर रहा हो और साथ ही स्वयं भी बेअसर-मंदा हो रहा हो तो ऋण पितृ होगा। जिसकी पहचान होगी कि पिता, पुत्र, भाई आदि सभी या अधिकांश जन्म कुण्डलियों में मंदा ग्रह एक ही भाव में या ऐसे ही किसी दूसरे भाव में जहां के पूर्ण मंदा समझा जाता हो, स्थिर होगा। ऐसे व्यक्ति के ग्रह-योग राजयोग कारक क्यों न हों, जिन ग्रहों का बुरा असर होगा उनके उपाय करने होंगे।

लाल किताब के अनुसार जिस ग्रह के पक्के घर (कारक भाव) में शत्रु ग्रह स्थिर हों वह भाव पीड़ित माना गया है पीड़ित ग्रह जिन परिवारजन के कारक होंगे उन्हीें परिवारजन के पाप/श्राप से पितृ-ऋण दोष होगा।

 

 

उपर्युक्त कुण्डली में देखें-चन्द्रमा के घर में अर्थात् भाव नम्बर 4 में चन्द्रमा का शत्रु केतु स्थिर है एवं सूर्य भी केतु के भाव में स्थिर होकर पीड़ित है। पितृ-ऋण की पहचान केवल जन्म-कुण्डली से ही होती है।

पितृ-ऋण की पहचान

भाव 9 का स्वामी बृहस्पति किसी अन्य भाव में स्थिर हो, बृहस्पति पर उसके शत्रु ग्रह की दृष्टि हो तब बृहस्पति पितृ-ऋण का ग्रह कहलायेगा।

जिस ग्रह के भाव में उसका शत्रु ग्रह बैठ जाये, शत्रु ग्रह का अपना प्रभाव भी नष्ट हो रहा हो तो वह कुण्डली पितृ-ऋण की कुण्डली मानी जायेगी।

जन्म-कुण्डली में जिस ग्रह की कारक राशि में उसका शत्रु ग्रह स्थिर होकर उसके फल को नष्ट कर रहा हो एवं साथ ही स्वयं भी अपना प्रभाव खो रहा हो तो यह योग वंश की कई जन्म कुण्डलियों में दिखाई देगा। जैसे राहु 11 में, शनि 4 एवं 9 में, बुध 2,3,8,11 एवं 12 में हो।

9 वे भाव के कारक बृहस्पति के अन्य भावों में स्थिर एक या एक से अधिक ग्रह आपसी शत्रुता रखते हो, या बृहस्पति का असर नष्ट कर रहे हों तो पितृ-ऋण होगा।

चन्द्रमा के समय मातृ-ऋण आदि और ग्रह भी अपने ऋण देंगे। अशुभ प्रभाव दो ग्रहों का होगा और उपाय भी दोनों ग्रहों के ही करने होंगे।

कारणः

कुण्डली के जातक के पिता ने कुत्ते मरवाये हों या मारे हों या पशुओं को कष्ट दिया हो तो जातक पर बृहस्पति और केतु दोनों ग्रहों का पितृ-ऋण होगा जो कि 16 से 24 वर्ष तक हो सकता है।

निवारण उपाय-

जो ग्रह पितृ-ऋण को हो, उसे उच्च करने का

उपाय उसकी अवधि से पूर्व ही कर लेना चाहिये

अन्यथा वह अपनी अवधि में हानि अवश्य

पहुंचायेगा, जैसे-बृहस्पति के लिए 16 वर्ष से पूर्व, सूर्य के लिए 22 वर्ष से पूर्व, चन्द्रमा के लिए 24 वर्ष से पूर्व, मंगल के लिए 28 वर्ष के पूर्व, शुक्र के लिए 25 वर्ष से पूर्व, बुध के लिए 34 वर्ष से पूर्व, शनि के लिए 36 वर्ष से पूर्व  उस ग्रह की शान्ति हेतु उपाय कर लेने चाहिए। एक समय में केवल एक ही उपाय करें। कुछ समय के उपरान्त दूसरा उपाय शुरू करें।

पक्के घर का राहु (12 वे भाव का कारक) और केतु (6 या 2, 8 भाव का कारक) सही रूप में मदद करने वाला न हो तो केवल सांसारिक सुखों पर ही असर होगा, अशुभ प्रभाव नहीं देगा।

पितृ-ऋण के उपाय में रक्त-सम्बन्धी जैसे बेटा, बेटी, पौत्र, दौहित्र, बहिन, भांजा, भांजी सभी शामिल हैं। यदि कोई भी नहीं हो तो स्वयं ही उन सभी के हिस्सों की भरपाई कर दें लेकिन इस स्थिति मंे स्वयं का हिस्सा अपने हिस्से के हिसाब से 10 गुना अधिक होना चाहिये।

नवम भाव और बुध से पितृ-ऋण

लग्न या 8 वें भाव में बुध और 9 मेें गुरू हो।, 2 या 7 वें भाव में बुध और 9 में राहु हो।, 3 में बुध और 9 में राहु हो।, 4 में बुध और 9 में चन्द्रमा हो।, 5 मे बुध और 9 में सूर्य हो।, 6 में बुध और 9 में केतु हो।, 10 या 11 में बुध और 9 में शनि हो।, 12 में बुध और 9 में गुरू हो।

उपर्युक्त सभी स्थितियों में बुध मुकाबले का ग्रह बन जाता है और दूसरे ग्रहों के फल को बिगाड़ता और अशुभ करता है। इस परिस्थिति में बुध का उपचार सहायक होगा।

गुरू से पितृ-ऋण

गुरू केन्द्र में और शनि 2 में हो।, गुरू केन्द्र में और शुक्र 5 में हो।,  गुरू केन्द्र में और बुध 9 में हो।, गुरू केन्द्र में और राहु 12 में हों।, गुरू केन्द्र में और बुध, शुक्र 3, 6 में हो।, गुरू केन्द्र में और शनि 3 या 6 में हो।

उपर्युक्त सभी स्थितियों में गुरू (बृहस्पति) के कारक पितृ-ऋण योग बनेगा अतः बृहस्पति का उपचार करने पर अशुभ प्रभाव से मुक्ति मिलती है।

पितृ-ऋण के कारणः  कुल पुरोहित कारणवश बदला गया होगा।

लक्षण: आस-पास धर्म-मन्दिर या बृहस्पति की वस्तुएं (पीपल का वृक्ष) नष्ट कर दिया गया हो।

अनिष्ट प्रभाव

40 वर्ष की आयु पश्चात् दुर्भाग्य का दौर शुरू हो जाता है। पैसा खो जाता है या चोरी हो जाता है। शिखा (चोटी) के स्थान पर से सिर के बाल झड़ने लगते है। गले में माला पहनने की आदत पड़ जाती है। विद्या में रुकावट आती है फलतः शिक्षा अधूरी रह पाती है। जातक पर झूठे अभियोग चलते हैं, अफवाहें उड़ती हैं। निर्दोष होने पर भी जेल होती हैै।

निवारण उपायः

परिवार के प्रत्येक व्यक्ति से धन एकत्र कर मंदिर में दान दें या अपने घर के समीप मंदिर की सेवा करें, सफाई करें, पीपल के वृक्ष को सींचे, देख-भाल करें।

अन्य कारणः

सूर्य 1,11 में न हो एवं शुक्र 5 में हो।, चन्द्रमा 4 में न हो एवं बुध, शुक्र शनि 4 में हो।, शुक्र 1 या 8 में न हो एवं सूर्य, चन्द्र, राहु 2 या 7 में हो।, मंगल 7 में हो एवं बुध, केतु या 1 या 8 में हो।, बुध 2 या 12 में न हो एवं चन्द्र 3 या 6 में हो।, शनि 3 या 4 में न हो एवं सूर्य, चन्द्रमा, मंगल 10, 11 में हो।, राहु 3 या 4 में न हो एवं सूर्य, शुक्र, मंगल  12 मंे हो।, केतु 2 में न हो एवं राहु, केतु, मंगल 6 मे हो।

उपर्युक्त परिस्थितियों में क्रमशः सूर्य, चन्द्रमा, शुक्र, मंगल, बुध, शनि, राहु, केतु पीड़ित होंगे एवं सभी परिस्थितियों में भी पितृ ऋण होंगे।

स्व-ऋण (अपना ऋण)

जब शुक्र पांचवें घर (भाव) में हो तब सूर्य पीड़ित हो जाता है।

कारणः  धर्म, देव, रीति-रिवाज आदि का अपमान करने लगे, ईश्वर को न माने, नास्तिक हो जाये तब स्वयं का ही ऋण होता है।

लक्षण: घर में जमीन के नीचे अग्नि-कुण्ड हो या छत खुली हुई हो अर्थात् छत में छेद से रोशनी आती हो, दिल की बीमारी हो।

अनिष्ट प्रभावः व्यक्ति खूब उन्नति करके धन-संपत्ति एकत्रित करता है। मान-सम्मान, प्रतिष्ठा पाता है। जब व्यक्ति का पुत्र ग्यारह माह या ग्यारह वर्ष का होगा तब अचानक सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है। पैसा चोरी हो जाता है। प्रतिष्ठा अपमान में बदल जाती है। शरीर के अंग अकड़ जाते है। चलने-फिरने से लाचार हो जाता है। मुंह मे हर समय थूक/लार बहती रहती है।

निवारण उपायः परिवार के प्रत्येक व्यक्ति से बराबर का हिस्सा लेकर सूर्य का यज्ञ करें। जब केतु चैथे भाव में होगा तब चन्द्रमा पीड़ित होने पर मातृ-ऋण होगा।

कारणः अपनी संतान उत्पन्न करने के बाद माता का अपमान करना, घर से बाहर निकाल देना, मां के दुःखी होेने पर उसकी उपेक्षा करना।

लक्षणः पड़ोस के कुएं, नदी, नाले, तालाब या पूज्य स्थानों को गंदगी का ढेर बना दिया जाय, गंदगी ड़ालने का स्थान बना दे।

अनिष्ट फलः

व्यक्ति की सारी जमा-पूँजी चूकने लगती है, नष्ट होने लगती है। बीमारी घेर लेती है। शिक्षा में रुकावट आती है। जो भी उसकी मदद करने की चेष्टा करता है उसका भी अहित होने लगता है। व्यक्ति गलत सोहबत (संगत, माहौल, दोस्ती) में पड़ जाता है। व्यक्ति की हिम्मत जवाब देने लगती है, उसकी महसूस करने की शक्ति समाप्त हो जाती है।

निवारण उपायः  पूरे परिवार मंे बराबर के

हिस्से में चांदी लेकर एक ही दिन में, एक साथ

दरिया, नदी, नाले, तालाब में डाल दें तो उसे

मातृ-ऋण से मुक्ति मिल जायेगी।

स्त्री-ऋण

सूर्य, राहु या केतु दूसरे भाव में हो तो शुक्र पीड़ित होगा, इस कारण स्त्री ऋण होगा।

कारणः गर्भवती स्त्री को प्रसूति के समय लालचवश मार डाला हो। परिवार के सदस्यों में आपस में मारपीट आदि होती हो।

लक्षणः उस परिवार के व्यक्तियों में किसी एक बात या उसूल पर सभी को घुणा होगी विशेषकर गाय-पालन से। परिवार में खुशी के समय विवाद होगा।

अरिष्ट प्रभावः परिवार में खुशी के समय किसी की मौत हो जाये, मातम छा जायें तो स्त्री-ऋण के कारण शुक्र पीड़ित होने की पहचान है।

निवारण उपायः परिवार के सभी सदस्यों से बराबर मात्रा में धन एकत्रित करके एक ही दिन एक ही समय पर लगभग सौ गायों को (जो अंगहीन न हों) चारा आदि खिलाने से मुक्ति होती है। सलीके के वस्त्र पहनने से भी शुक्र के दोष से निवृत्ति होती है।

रिश्तेदारी (सम्बंदियो) का ऋण

पहले या आठवें भाव (घर) में बुध या केतु हो तो मंगल पीड़ित हो जाने से रिश्तेदारी का ऋण दोष होगा।

कारणः किसी मित्र को धोखा देना, जहर देना, किसी के मकान में या पकी फसल मंे आग लगाना या लगवा देना, किसी का जानवर मार देना या मरवा देना।

लक्षणः व्यक्ति अपने सगे-सम्बन्धियों से धृणा करता होगा। घर में जन्म-दिन या त्यौहार नहीं मनाता होगा। हर प्रकार की खुशी से दूर रहता होगा। सब कुछ पाकर भी दीन-हीन होगा।

अनिष्ट प्रभावः युवा-अवस्था में आने पर व्यक्ति रुपया-पैसा कमाने लगता है एवं स्वयं के पैरों पर खडे़ होकर मान-सम्मान पाता है। लेकिन सब कुछ पाकर भी वह खो देता है। शक्तिहीन हो जाता है। संतान नहीं होती और अगर होती भी है तो जीवित नहीं रहती, अपाहिज होती है। मंगल जनित दोष होते है। शरीर में खून की कमी होती है। एक आँख का मालिक (काणा) बन जाता है। अकारण लड़ाई-झगडा कर पिटता है।

निवारण उपायः परिवार के सभी सदस्यों से बराबर पैसा लेकर गरीबों के इलाज के लिए किसी वैद्य या डाॅक्टर को दें।

सुहासिनी (बहन-बेटी) का ऋण

तीसरे या छठे भाव में चन्द्रमा हो तो बुध पीड़ित होगा और बहन-बेटी के ऋण को दोष होगा।

कारणः किसी कि बहन-बेटी के साथ धोखा किया हो, इज्जत (जवानी) से खिलवाड़ किया हो, अत्यधिक जूल्म किये हों या हत्या कर दी हो।

लक्षणः मासूम बच्चों को चोरी-छिपे पिटने की इच्छा होगी। खर्च अधिक होता होगा।

अरिष्ट प्रभावः घर में लड़की या बहन के विवाह के समय दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं घटती होगी। पैसा बर्बाद हो जाता है संभोग करने की शक्ति खत्म हो जाती है या क्षीण हो जाती है। दाँत झड़ जाते है और ग्रहण शक्ति अल्प हो जाती है।

निवारण उपायः परिवार के सभी सदस्यों से पीले रंग की कौड़ियां एक़ित्रत करें। कौड़ियों को जलाकर राख बना लें और पानी में बहा दें। या सभी से बराबर-बराबर पैसा एकत्रित कर बुधवार के दिन शुद्ध घी से हलवा-पूरी आदि बनाकर 101 कन्याओं के चरण धोकर दक्षिणा सहित हलवा-पूरी दें।

निर्दयी (जालिमाना) ऋण

सूर्य, चन्द्र 10 या 11 वें भाव में होने पर शनि के पीड़ित होकर जालिमाना ऋण दोष देगा।

कारणः किसी भी जीव की हत्या करना। किसी का मकान धोखे से हड़प लेना।

लक्षणः स्वयं के मकान का मुख्य द्वार दक्षिण में होगा। अनाथों के लिए बनाये मकान पर मकान बनाया हो, रास्ते पर या कुएं पर मकान खड़ा किया गया होगा।

अरिष्ट प्रभावः परिवार पर विपदाएं आती है। दुर्घटनाएं होती हैं। परिवार के सदस्य अपाहिज होते है। शरीर के बाल विशेषकर पलकों एवं भोंहों के विशेष रूप से झड़ते है।

निवारण उपायः परिवार के सभी सदस्यों से धन एकत्रित करके एक दिन एक साथ सौ मजदूरों को भोजन करवायें अथवा सौ स्थानों से मछलियां एकत्रित कर उन्हें चारा डालें। 43 दिन तक कौओं को रोटी देने से भी शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है।

अजन्मे (अजात) का ऋण

बारहवें भाव में सूर्य, चन्द्र या मंगल पर राहु पीड़ित होगा।

कारण:

सम्पर्क में आये व्यक्तियों से धोखा करना या ऐसा ठगना की सारा परिवार, खानदान का नाश हो गया हो। ससुराल से धोखा किया हो।

लक्षणः

घर की दक्षिण दीवार साथ उजाड़ एवं वीरान

होगी या चने-भूट्टे भूनने वाले (भड़भूंजे) की भट्टी

होगी। घर के मुख्य द्वार की दहलीज के नीचे से घर का

गंदा पानी बाहर निकलने की नाली होगी।

अरिष्ट प्रभावः

अचानक ही सभी कार्य उलटे होने लगते है। पैसे की बर्बादी होती है। सोचे-विचारे सभी कार्यो में रुकावट आती है। बिना किसी कारण के भी जेल की यातना सहनी होती है।

निवारण उपायः

परिवार के प्रत्येक सदस्य से एक-एक नारियल लेकर एक ही दिन एक साथ पानी में बहा दंे। संयुक्त परिवार में रहें एवं ससुराल से बनाकर रखें।

कुदरती (देवी) ऋण

छठे भाव में चन्द्रमा या मंगल हो तो केतु पीड़ित होता है।

कारणः

बदनीयत के कारण किसी के कुत्ते को मार डाला हो। किसी फकीर हो परेशान किया हो। बदचलनी से धोखा किया होगा। किसी जीव का नाश किया हो।

लक्षणः

दूसरों के वंशजों को गुप्त रूप से, धोखे से मार डालना। कुत्तों को गोली से मारना या मरवाना। सगे-संबंधियों के प्रति बुरी नीयत रखते हुए उनके वंश का नाश कर डालना।

अरिष्ट प्रभावः

केतु के पीड़ित होने पर पुरुष संतान पर प्रभाव होगा है। मूत्र जनित रोग होते है। फलतः पुत्र होता नहीं है और होता है तो जीवित नहीं रहता। यदि जीवित रह भी जाय तो अपाहिज होगा।

निवारण उपायः

परिवार के प्रत्येक सदस्य के बराबर मात्रा में धन जमा कर एक ही दिन एक साथ सौ कुत्तों को रोटी खिलायें। पड़ोस की विधवा की सहायता करें। उनका आशीर्वाद लें।

जहा पर आलेख में 8 वें, 4 में, 6 सें इस प्रकार लिखा गया है वह भाव के सम्बन्ध में लिखा गया है। अतः इस आलेख के शुरूआती भाग को न समझ पाये हो, तो भाव को दिमाग मे रखकर पुनः पढे़।

 

 

 

 

आपकी सुविधा के लिए विभिन्न प्रकार के ऋणों को एक ही दृष्टि में तालिका के जरीये समझाया जा रहा है।

Moles on the hand and what they Mean / हाथ में कौन सी अंगुली पर तिल हो तो क्या होता है ?

हाथ में कौन सी अंगुली पर तिल हो तो क्या होता है ?

शास्त्रों के अनुसार तिल भी हमारे स्वभाव और भविष्य को प्रभावित करते हैं। शरीर के अलग-अलग अंगों पर तिल का होना अलग-अलग प्रभाव देता है। ऐसा माना जाता है कि पुरुषों के लिए दाएं अंग पर तिल होना शुभ है और बाएं अंग पर तिल होना अशुभ। जबकि स्त्रियों के लिए बाएं अंग पर तिल होना शुभ है तो दाएं अंग पर तिल होना अशुभ माना जाता है।

जिन लोगों के हाथों पर तिल होते हैं वे चतुर होते हैं। गुरु पर्वत यानि इंडेक्स फिंगर के ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तिल भी हमारे स्वभाव और भविष्य को प्रभावित करते हैं।

गुरु पर्वत यानि इंडेक्स फिंगर के नीचे वाले भाग पर तिल हो तो व्यक्ति धार्मिक हो सकता है। दायीं हथेली पर तिल हो तो व्यक्ति बलवान होता है। कुछ परिस्थितियों में दायीं हथेली का तिल व्यक्ति को धनवान भी बनाता है। बायीं हथेली पर तिल हो तो व्यक्ति खर्चीला तथा कंजूस भी हो सकता है। जिसकी तर्जनी यानि इंडेक्स फिंगर पर तिल हो, वह विद्यावान, गुणवान और धनवान किन्तु शत्रुओं से पीड़ित होता है।

जिसकी अनामिका या रिंग फिंगर पर तिल हो  तो वह ज्ञानी, यशस्वी, धनी और पराक्रमी होता है। कनिष्का या लिटिल फिंगर पर तिल हो तो वह व्यक्ति संपत्तिवान होता है, किंतु उसका जीवन दुःख मय होता है।

अंगूठे या थम्ब पर तिल हो तो व्यक्ति कार्य-कुशल, व्यवहार-कुशल तथा न्यायप्रिय होता है। मध्यमा या मीडिल फिंगर पर तिल उत्तम फलदायी होता है। व्यक्ति सुखी होता है। उसका जीवन शांतिपूर्ण होता है।