Tips to earn more Money / आय वृद्धि प्रयोग- लक्ष्मी चेटक प्रयोग


ऊपर के पृष्ठों में मैंने लक्ष्मी प्राप्ति से सम्बन्धित मंत्र प्रयोग दिये हैं, अब मैं कुछ चेटक तंत्र प्रयोग और मंत्रों का प्रयोग दे रहा हूं, जो कि पूर्ण हैं। मेरे शिष्यों ने इन प्रयोगों को किया है और इनमें वे सफल हूए है। सबसे पहले मैं लक्ष्मी चेटक दे रहा हूं।

इस प्रयोग में साधक को मात्र एक लाख मंत्रों का जप करना होता है और जब एक लाख मंत्र जप सम्पन्न हो जाय, जो गेहूं तथा चने बराबर मात्रा में ले कर दस हजार मंत्रों से आहुति देनी होती है। ऐसा होने पर लक्ष्मी प्रसन्न हो जाती है और उसके जीवन के सारे दुःख दारिद्रय और सन्ताप दूर कर देती है।

मंत्र

।। ऊँ श्रीं काककमलवर्द्धने सर्वकार्य

सर्वार्थान्देहि देहि सर्वकार्य कुरु कुरु

परिचय्र्यसर्वसिद्धिपादुकायां हं क्षं श्रीं

द्वादशान्नदायिने सर्वसिद्धिप्रदाय स्वाहा।।

इस मंत्र को जपने का कोई विशेष विधान नहीं है और न किसी विशेष मुहूर्त आदि की आवश्यकता हैं, इसमें आसन, वस्त्र, दीपक, पूजा, यंत्र, चित्र आदि की आवश्यकता नहीं है। यह चेटक मंत्र है और इसको मात्र ‘ऐश्वर्य माला’ से ही जपना होता है। मंत्र जप करने से तथा उसका दशांश हवन करने से कार्य सिद्ध हो जाता है।

 

कनकधारा

प्रयोग

शास्त्रों में यह कहा गया है, कि जिनके घर में कनकधारा यंत्र स्थापित नहीं है, उसके घर में लक्ष्मी का निवास कैसे हो सकता है? इसका तात्पर्य यह है, कि कनकधारा यंत्र और आर्थिक उन्नति एक दूसरे का पर्याय है।

कनकधारा यंत्र धातु से बना हुआ एक अद्वितीय यंत्र होता है और मंत्रसिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त होने के कारण यह स्वतः ही आर्थिक उन्नति देने में समर्थ होता है।

वस्तुतः यदि कोई साधक अपने घर में मंत्रसिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त ‘कनकधारा यंत्र’ स्थापित कर नित्य कनकधारा मंत्र की एक माला फेरे, तब भी उसके जीवन में आर्थिक उन्नति होती है। प्रयोग के रूप में इसका मंत्र प्रयोग एक लाख जप संख्या है, इसमें ‘कललगट्टे की माला’ या ‘स्फटिक माला’ का प्रयोग किया जाता है।

किसी भी बुधवार को प्रातः सूर्योदय से दस बजे के भीतर-भीतर स्नान कर, शुद्ध वस्त्र धारण कर इस यंत्र को किसी पात्र में स्थापित कर, इस पर केसर, अक्षत, पुष्प आदि चढ़ा कर कनकधारा मंत्र का जप प्रारम्भ कर दें।

मंत्र

।। ऊँ वं श्रीं वं ऐं हृीं श्रीं

क्लीं कनकधारायै स्वाहा।।

जब इस यंत्र पर एक लाख मंत्र जप सम्पन्न जप सम्पन्न हो जाय, तब इस यंत्र को अपने घर के पूजा स्थान में स्थापित कर दें और यदि व्यक्ति चाहे तो इसे अपनी दुकान में अथवा कार्यालय में भी स्थापित कर सकता है। माला तथा अन्य सभी सामग्रियों को किसी नदी या तालाब में प्रवाहित कर दें।

जिस दिन यह अनुष्ठान सम्पन्न होता है, उसी दिन से साधक को आर्थिक उन्नति अनुभव होने लग जाती है और आगे के जीवन में किसी भी प्रकार से कोई आर्थिक बाधा नहीं रहती और उसका व्यापार उन्नति की तरफ अग्रसर होता रहता है। वस्तुतः यह प्रयोग अपने आप में अत्यन्त महत्वपूर्ण है और जो श्री साधक अपने जीवन में आर्थिक उन्नति चाहते हैं, उनको चाहिए, कि वे इस मंत्र का प्रयोग अपने जीवन में अवश्य करें।

 

घण्टाकर्ण

प्रयोग

आर्थिक उन्नति प्राप्त करने क लिए इस प्रयोग को सम्पन्न किया जाता है। यह प्रयोग किसी भी महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को प्रारम्भ किया जाता है। यह प्रयोग 60 दिनों का है। इसमें नित्य ग्यारह मालाएं मंत्र जप किया जाता है। माला ‘कमलगट्टे’ की या ‘मूगे’ की प्रयोग में लानी चाहिए।

मंत्र

।। ऊ­ँ हृीं क्लीं घण्टाकार्णो

नमोऽस्तुते ठः ठः ठः स्वाहा।।

इसके अलावा इसमें अन्य कोई विधि-विधान नहीं है। यदि साधक इस प्रकार सम्पन्न कर लेता है, तो निश्चय ही उसे जीवन में पूर्णता प्राप्त हो जाती है। मंत्र जप के उपरान्त माला को किसी नदी या तालाब में प्रवाहित कर देना चाहिए। साधक को चाहिए, कि वह इस प्रकार का मंत्र जप अवश्य ही सम्पन्न करें।

 

लक्ष्मी बीज

प्रयोग

लक्ष्मी प्राप्ति के लिए यह प्रयोग महत्वपूर्ण है और इस बीज मंत्र का प्रयोग मनुष्य किसी भी समय कर सकता है। इसके लिए आवश्यक नहीं है कि साधक किसी एक स्थान पर ही बैठें या मंत्र जप करते समय हाथ में कोई माला या कोई अन्य सामग्री हो। यह आवश्यक नहीं हैं, कि साधक किसी विशेष रंग के वस्त्र धारण करे अथवा किसी विशेष रंग के आसन को बिछा कर तथा दीप जला कर ही बैठे।

यह तो बीज मंत्र है और इसका निरन्तर मानसिक जप, उठते-बैठते, सोते जागते किया जा सकता है। इस मंत्र जप को पुरुष या स्त्री कोई भी, किसी भी समय कर सकता है।

मंत्र

।। श्रीं।।

यह एक अक्षर का बीज मंत्र है और लक्ष्मी को अत्यन्त प्रिय है, इसका मानसिक जप करना उचित रहता है, इसके लिए किसी प्रकार की मंत्र गणना आवश्यक नहीं होती तथा इसे सम्पन्न करते रहना चाहिए।

 

श्री मन्जू घोष

प्रयोग

यह ”धन-धान्य लक्ष्मी प्रयोग“ भी कहा जाता है। दरिद्रता निवारण एवं घर में धन-धान्य, बुद्धि की दृष्टि से यह मंत्र प्रयोग अत्यन्त ही महत्पपूर्ण माना गया है। यह प्रयोग भोजन करते समय ही सम्पन्न किया जाता है। साधक को दिन में एक या दो बार आसन पर बैठ कर भोजन करना चाहिए। इसके अलावा दिन मंे अपने मुंह को जूठा नहीं रखना चाहिए।

भोजन करने से पूर्व जब थाली परोसी हुई सामने आ जाय जो हाथ जोड़कर मन ही मन निम्नलिखित मंजु घोष लक्ष्मी का ध्यान करना चाहिए-

शशधरमित्र शुभ्रं खड्ग पुस्तांक-पाणि।

चुरचिरमति -शान्तं पंचचूड़ कुमारम्।।

पृथुतर वर मुख्यं पद्म पत्रायनक्षं।

कुमति दहन दक्षं मंजु घोषं नमामि।।

यह प्रयोग अत्यन्त महत्वपूर्ण है और इससे शीघ्र ही धन  की प्राप्ति होने लगती है, आर्थिक अनुकूलता प्रारम्भ होती है और घर में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता। अर्थात् ‘चन्द्रमा के समान शुभ्र वर्ण वाले, एक हाथ में खड्ग तथा दूसरे हाथ में पुस्तक लिए हुए, अत्यन्त शान्त और मनोरम छवि वाले, जिनके मस्तक पर पांच चूड़ाएं हैं, ऐसे स्थूल शरीर वाले तथा कमल की पखुड़ियों के समान बड़ी-बड़ी आंखों वाले, दुर्बुद्धि को नष्ट करने मं समर्थ मंजु घोष को मैं प्रणाम करता हूं। उपरोक्त ध्यान के बाद नीचे लिखे षडाक्षर मंत्र को मन ही मन 108 बार जप करें। मंत्र जप के लिए हल्दी की माला की आवश्यकता होती है।

मंत्र

।।  अ र व च ल धीं।।

यह छः अक्षरों का मंत्र अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है, भोजन करते समय भी साधक को मन ही मन इस मंत्र का जप करते रहना ज्यादा श्रेष्ठ होता है।

भोजन कर चुकने के बाद थाली में पानी डालकर उसमें उंगलियों को डूबो कर इन अक्षरों को लिख दे और फिर भोजन समाप्त कर खड़े हो जाए। भोजन समाप्त कर हाथ-मुंह शुद्ध कर पुनः इस मंत्र का मन ही मन 108 बार उच्चारण करे।

यह प्रयोग अत्यन्त महत्वपूर्ण है और इससे शीघ्र ही धन  की प्राप्ति होने लगती है, आर्थिक अनुकूलता प्रारम्भ होती है और घर में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता।

 

वसुधा लक्ष्मी

प्रयोग

इस मंत्र को सभी मंत्रों में श्रेष्ठ कहा गया है। कहा जाता है, कि जीवन में जितने भोग हैं, वे सभी इस मंत्र के प्रभाव से प्राप्त हो जाते हैं। सामान्य रूप में यह प्रयोग आर्थिक उन्नति और भूमि सम्बन्धी कार्याे में सफलता प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यदि साधक के जीवन में मकान बनाने की इच्छा हो या उसका मकान पूरा नहीं हो रहा हो अथवा जमीन सम्बन्धी कोई विवाद हो, तो इस मंत्र का दस हजार जप करने से ही अनुकूलता प्राप्त होती है।

यह प्रयोग ‘श्रीयंत्र’ के सामने किया जाता है। यह श्रीयंत्र दिव्य मंत्रसिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त होना चाहिए और लाल वस्त्र पर इस श्रीयंत्र को स्थापित कर, उसके सामने अगरबत्ती व दीपक लगाकर, इस मंत्र की कमलगट्टे की माला से नित्य एक माला फेरनी चाहिए।

मंत्र

।। ऊँ ग्लौं श्रीं अन्नं महृयं में तेह्यन्नाधिपतये

ममात्रं प्रदापय स्वाहा श्रीं ग्लौं ऊँ ।।

वस्तुतः यह मंत्र महत्वपूर्ण है और 18 अक्षरों वाला यह मंत्र जीवन में पूर्णता देने के लिए अनुकूल है। कहते है कि दस हजार मंत्र जप से साधक का पूर्णता एवं अनुकूलता प्राप्त हो जाती है। दस हजार मंत्र जप पूर्ण होने के बाद साधक अनुष्ठान समाप्त कर वसुधा माला को नदी में प्रवाहित कर दे व श्रीयंत्र को तिजोरी में स्थापित कर दे।

 

गोमती-चक्र

प्रयोग (प्रथम)

यह प्रकृति का मानव को श्रेष्ठ वरदान है, जिस पर कई प्रकार के तांत्रिक मांत्रिक प्रयोग सम्पन्न किये जाते हैं। यह स्वयं ही व्यापार एवं लक्ष्मी का पर्याय है, अतः प्रत्येक गृहस्थ के घर में गोमती चक्र का पूजा स्थान में होना आवश्यक माना जाता है। साधक सोमवार को प्रातः सूर्याेदय के समय इस चक्र को दूध से और फिर जल से धोकर किसी पात्र में चावल बिछा कर उस पर चक्र को स्थापित कर लेना चाहिए और सामने दीपक लगा लेना चाहिए।

इसके बाद निम्न मंत्र की पांच मालाएं फेरनी चाहिए, इस प्रकार याह प्रयोग मात्र 14 दिन का है और इन 14 दिनों में कुल 70 मालाएं फेरने का विधान है। इसमंे ‘गोमती माला’ का प्रयोग किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में दुर्भाग्य हावी हो गया हो या आर्थिक सफलता नहीं मिल रही हो या व्यापार में अनुकूलता प्राप्त नहीं हो रही हो, तो उसे साधना  अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए। यह साधना सरल और लधु होने के साथ ही निश्चित व श्रेष्ठ फलदायक है।

मंत्र

।। ऊँ हृीं महालक्ष्मी श्रीं चिरलक्ष्मीं

ऐं ममगृहे आगच्छ आगच्छ स्वाहा।।

जब 14 दिन पूरे हो जाएं, तो इस प्रकार के गोमती चक्र को अपने पूजा स्थान में या दुकान में स्थापित कर देना चाहिए और माला व चावलों को लाल रंग के वस्त्र में बाधकर नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए।

 

गोमती-चक्र

प्रयोग (द्वितीय)

किसी भी बुधवार को बाजोट पर बिछी पीली सरसों पर गोमती चक्र को स्थापित कर देें तथा सामने दीपक लगाकर निम्न मंत्र का जप करें-

मंत्र

।। ऊ­ँ हृीं लक्ष्मही दुर्भाग्यनाशिनी

सौभाग्य प्रदायिनी श्रीं स्वाहा।।

यह मंत्र जब भी सुविधा हो, जप सकते हैं, इसका कुल दस हजार मंत्र जप होता है और यह प्रयोग दस या पन्द्रह दिन से सम्पन्न होना चाहिए। इस प्रयोग में ‘मूगे की माला’ का जप किया जाता है। जब प्रयोग सम्पन्न हो जाय, तब वह सरसों, गोमजी चक्र व माला सहित तालाग अथवा नदी में विसर्जित कर देनी चाहिए।

इस प्रकार का प्रयोग दरिद्रता नाश के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है और सबसे बड़ी बात यह है, कि यदि साधक पर, उसके परिवार पर अथवा उसके व्यापार पर किसी प्रकार का कोई तांत्रिक प्रभाव होता है, तो इस प्रयोग से वह तांत्रिक प्रभाव भी समाप्त हो जाता है।

इस प्रयोग से व्यापार में आश्चर्यजनक उन्नति होने लगती है और बिक्री बढ़ जाने के साथ-साथ व्यापार में भी पूर्ण अनुकूलता आने लगती है, शत्रु परास्त हो कर किसी प्रकार से हानि पहंुचाने में अक्षम हो जाते हैं। मेरी राय में यह प्रयोग उसके लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है, जो अपने व्यापार को श्रेष्ठ स्तर पर देखना चाहते है। उसको चाहिए कि, वे इस प्रयोग को अवश्य सम्पन्न करें।

 

गोमती-चक्र

प्रयोग (तृतीय)

यह प्रयोग शत्रु नाश, राज्य बाधा निवारण एवं मुकदमों में सफलता प्राप्ति के लिए किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति व्यापार में हानि पहुंचा रहा हो या प्रतिस्पर्धा हो अथवा आपकी साख को गिराने की कोशिश कर रहा हो, तब भी इस प्रकार के प्रयोग को करने से सफलता मिलती है।

इसके अलावा यदि किसी दुष्ट व्यक्ति ने आपसे रुपये या धन लेकर लौटाने से मना कर दिया हो या वापस रुपये नहीं दे रहा हो या धोखा देने का प्रयास कर रहा हो अथवा कहीं रुपये फंस गये हों या इसी प्रकार की कोई अन्य समस्या सामने आ रही हो, तो यह प्रयोग अत्यन्त अनूकूल एवं महत्वपूर्ण माना गया है।

इस प्रयोग के लिए मंगलवार को किसी पात्र में मुट्ठी भर काली मिर्च रख कर उस पर गोमती चक्र स्थापित कर देना चाहिए, यह गोमती चक्र मंत्रसिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त होना चाहिए।

साधक सर्वप्रथम हो हाथ में जल लेकर संकल्प लेना चाहिए, कि मैं अमुक कार्य विशेष के लिए यह प्रयोग कर रहा हूं और मेरा वह कार्य सिद्ध हो।

इसके बाद अपने सामने तेल का दीपक लगा लें और निम्न मंत्र का ‘लाल हकीक माला’ से 51 माला मंत्र जप करें। ऐसा नित्य 21 दिनों तक करें, इस दीपक में किसी भी प्रकार का तेल प्रयोग में लिया जा सकता है-

मंत्र

।। ऊँ क्लीं शत्रुन्नाशय ऐं

कार्य सिद्धयर्य हृीं लुप्त धन

प्राप्त्यर्थ श्रीं नमः।।

जब यह प्रयोग समाम्त हो जाय, तब गोतमी चक्र, लाल हकीक माला और उस काली मिर्च को किसी मंगलवार को रात्रि को जमीन में गड्डा खोदकर गाड़ देना चाहिए। यह काम साधक स्वयं या उसका कोई शुद्ध वर्ण का नौकर सम्पन्न कर सकता है।

ऐसा करने पर कुछ ही दिनों में साधक को अनुकूल फल प्राप्त हो जाता है और जिस उद्देश्य के लिए वह यह प्रयोग करता है, उसमें सफलता मिल जाती है। वस्तुतः यह प्रयोग अत्यन्त महत्वपूर्ण, श्रेष्ठ और प्रभावयुक्त है और साधक को इसका प्रभाव तुरन्त हीे अनुभव होता है।

 

बिल्ली की नाल

प्रयोग

बिल्ली जब बच्चे को जन्म देती है, तो जो नाल गिरती है, यह नाल लक्ष्मी से सम्बन्धित अनुष्ठान में एवं प्रयोगों मं अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है।

इस पर कई प्रकार के प्रयोग किये जाते है, मैं यहां पर केवल दो प्रयोग दे रहा हूं।

इसमे पहला प्रयोग लक्ष्मी से सम्बन्धित है और दूसरा प्रयोग वशीकरण से सम्बन्धित है।

पहल प्रयोग के लिए इस प्रकार की बिल्ली की नाल प्राप्त कर लेनी चाहिए, पर सामान्य रूप से प्राप्य बिल्ली की नाल प्रयोगों के लिए अनुकूल नहीं होती है, विशेष मंत्रों से चैतन्य बिल्ली की नाल ही प्रभाव युक्त मानी गयी है।

किसी भी शनिवार को इस बिल्ली की नाल को किसी बाजोट के ऊपर एक ताम्रपात्र में रख कर साधक को सामने अगरबत्ती व दीपक लगाना चाहिए।

इसके बाद मंत्र जप प्रारम्भ कर देना चाहिए। इसमे आसन या वस्त्र का कोई विशेष विधान नहीं है तथा यह भी विधान नहीं है, कि वह किसी विशेष दिशा में मुंह करके बैठे, साधक चाहे तो हाथ पैर धोकर भी इस प्रयोग में बैठ सकता है।

यह प्रयोग एक लाख मंत्र जप का है तथा इसमें दिनों की सख्या निर्धारित नहीं है, थोड़ा-थोड़ा करके नित्य मंत्र जप किया जा सकता है। मंत्र जप ‘स्फटिक माला’ से किया जाता है।

मंत्र

।। ऊँ नमो आगच्छ सुरसुन्दरी स्वाहा।।

जब एक लाख मंत्र जप सम्पन्न हो जाय, तब उस बिल्ली की नाल को उठा कर उस स्थान पर रख देना चाहिए, जहां रुपये-पैसे, गहने या द्रव्य आदि रखा जाता है। माला को किसी नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।

जब तक वहां ऐसी बिल्ली की नाल रहेगी, तब तक उसके जीवन में निरन्तर आर्थिक उन्नति होती रहेगी और उसे जीवन में भौतिक दृष्टि से किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहेगा।

वस्तुतः यह प्रयोग अत्यन्त महत्वपूर्ण है और जो भी जीवन में स्थाई सम्पत्ति और पूर्ण आर्थिक अनुकूलता चाहते हैं, उन्हे अवश्य ही इस प्रकार का प्रयोग सम्पन्न करना चाहिए।

मेरी राय में यह अन्य प्रयोगोे की अपेक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण और तीव्र प्रभावों से युक्त है।

द्वितीय प्रयोग भी शनिवार को ही प्रारम्भ किया जाता है। इसमें भी दिशा या आसन का कोई बन्धन नहीं है।

बिल्ली की नाल की बाजोट पर किसी ताम्रपत्र में रख कर सामने तेल का दीपक लगाना चाहिए।

फिर नीचे लिखे मत्र का एक लाख मंत्र जप किया जाता है। इसमें भी दिनों की संख्या निर्धारित नहीं है, पर मंत्र जप एक लाख होना आवश्यक है।

जप ‘सफेद हकीक माला’ से किया जाता है।

मंत्र

।। ऊँ क्लीं हृीं आगच्छ मनोहरे स्वाहा।।

जब एक लाख मंत्र जप सम्पन्न हो जाय, तो किसी चांदी के ताबीज में इस बिल्ली की नाल को भर कर वह ताबीज गले में पहन लेना चाहिए या बांह पर बांध लेना चाहिए।

माला को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है।

जो व्यक्ति इस प्रकार का ताबीज धारण करता है, उस पर किसी प्रकार का कोई तांत्रिक प्रभाव असर नहीं करता, वह स्वयं कामदेव के समान आकर्षक हो जाता है और उसके चारों तरफ विलासिनी स्त्रियों को जमघट लगा रहता है।

यदि किसी पुरुष या स्त्री पर वशीकरण प्रयोग करना हो, तब उपरोक्त मंत्र का मन ही मन पांच बार उच्चारण कर उस व्यक्ति या स्त्री का नाम लिया जाय, तो यह वश में हो जाती है और मनोनुकुल कार्य करती है।

 

धन प्राप्ति कारक

यंत्र

जहां जीवन मंे मंत्रो का प्रभाव तुरन्त होता है, वहीं पर कुछ यंत्र ऐसे भी होते है, जिनका प्रयोग करने से तुरन्त ही कार्य मंे सिद्धि प्राप्त होती है और आर्थिक दृष्टि से अनुकलता प्राप्त हो जाती है।

किसी भी सोमवार को निम्नलिखित यंत्र भोजपत्र पर बना कर (अष्टगन्ध से यह यंत्र भोज पत्र पर लिखना चाहिए) धूप, दीप जलाकर चांदी के ताबीज में भर कर दाहिने हाथ की भुजा में बांधे तो उसे जीवन में निश्चय ही आर्थिक उन्नति प्राप्त होती है

वस्तुतः यह प्रयोग अपने आप में छोटा सा दिखाई देता है, परन्तु महत्वपूर्ण है। जो भी साधक इस प्रकार का प्रयोग करे, उसे निश्चय ही लाभ प्राप्त होती है।