Money you have to stay with me / लक्ष्मी तुझे मेरे घर रहना ही पड़ेगा

In normal course of life we are generally confronted by two things/subjects. One is that is present in front and we have knowledge about it and the other about which we are unawares or have no knowledge.

लक्ष्मी तुझे मेरे घर रहना ही पड़ेगा !

‘‘श्री कृष्ण ने गीता में एक स्थान पर कहा है – गरीबी पाप है व गरीब पापी, कहने में यह बात आज भी प्रासंगिक लगती है धन की देवी लक्ष्मी चंचल और अस्थिर है। वह एक घर में टिक कर नहीं बैठती। इसीलिए शास्त्रों में लक्ष्मी को चंचला और अस्थिरा भी कहा गया है। आज जो व्यक्ति करोड़पति है, वह एक ही क्षण में सड़क पर आ जाता है और गरीबी व निर्धनता का जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य हो जाता है। आज जो व्यक्ति गरीब है धन की वजह से परेशान है लक्ष्मी की कृपा दृष्टि होते ही वह व्यक्ति करोड़ों में खेलने लगता है। इसलिए कहा गया है ‘‘कंचन सह सुखमः’’ अर्थात् धन में ही सारे संसार के सुख छुपे है।’’

शास्त्रों में एक स्वर में यह कहा गया है कि धनी होना अपने आप में मानव-जीवन की सफलता है। एक दृष्टि से देखा जाए तो यह पूर्णता है। इसके विपरीत गरीबी जीवन का अभिशाप है।

साधारण गृहस्थ ही नहीं अपितु राजा, ऋषि, मुनि, योगी, संन्यासी भी धन की जरूरत को अनुभव करते रहे हैं। वशिष्ठ के आश्रम में इतनी सम्पन्नता थी कि दशरथ का सारा राज्य उसके सामने तुच्छ था। पच्चीस हजार शिष्यों को वह नित्य सुबह शाम भोजन कराते थे और जब दशरथ को कैकयी नरेश के विरूद्ध युद्ध करना पड़ा, तो युद्ध लड़ने के लिए दशरथ जैसे राजा को भी वशिष्ठ से धन की याचना करनी पड़ी। धन की आवश्यकता गृहस्थ व्यक्तियों को ही नहीं, अपितु योगियों और संन्यासियों, राजाओं, ऋषि, मुनियों, योगीयों को भी रहती है।

वशिष्ठ कोई अकेले ऐसे ऋषि नहीं थे। विश्वामित्र के समय में उनके पास भी इतनी अधिक सम्पत्ति थी कि वह इन्द्र के राज्य को खरीदने का सामथ्र्य रखते थे और उनका आश्रम उस समय पूरे विश्व में सर्वाधिक सम्पन्न था। गोरखनाथ के पास इतना अधिक स्वर्ण था कि उसको तोला जाना असम्भव था। नागार्जुन अपने में सर्वाधिक सम्पन्न व्यक्ति थे और ये सर्वाधिक सम्पन्न व्यक्ति इसलिए थे कि इनके पास कुछ ऐसी युक्तियां, कुछ ऐसे तन्त्र, मन्त्र या गोपनीय विधियाँ थीं, जिनके माध्यम से वे लक्ष्मी को अपने घर में आबद्ध कर सकते थे, बांँध सकते थे। उसे स्थायित्व देने के लिए बाध्य कर सकते थे और उन्होंने ऐसा किया भी…

लक्ष्मी के रूप

शास्त्रों के अनुसार लक्ष्म के तीन रूप माने गए हैं और तीनों ही रूपों में उसकी अर्चना शास्त्रों में वर्णित है। वह माँ के रूप में शास्त्रों में प्रचलित है इसीलिए हम उसे लक्ष्मी मैया के नाम से भी संबोधित करते हैं। वह पत्नी के रूप में भी शास्त्रों में वर्णित है। इसीलिए धनवान व्यक्ति को हम लक्ष्मी पति कहते है और तीसरा स्वरूप लक्ष्मी का प्रेमिका के रूप में है जिसके माध्यम से लक्ष्मी को हम अपने अनुकूल बना सकते हैं।

माँ के रूप में लक्ष्मी की आराधना आज के युग में न तो उचित है और न प्राचीन युग में भी उचित मानी गई थी। एक विद्वान ने कहा है – माँ को तो जीवन भर देते ही रहना पड़ता है, सेवा के द्वारा, सुविधा के द्वारा, और धन के द्वारा। उससे स्नेह के अलावा और कोई ठोस उपलब्धि संभव नहीं है। इसीलिए माँ के रूप में लक्ष्मी की सेवा करने से केवल आश्वासन और स्नेह ही प्राप्त हो सकता है, इसलिए इससे हमें जीवन में निरन्तर धन खोते ही रहना पड़ता है, इसीलिए जो लक्ष्मीजी की माँ के रूप में पूजा-अर्चना करते है, वे लगभग निर्धन ही बने रहते हैं।

उस विद्वान के शब्दों में वजन, तर्क और शास्त्र तीनों ही है। कई अन्य उच्च कोटि के ऋषियों ने भी लक्ष्मी की माँ के रूप में अर्चना करने को उचित नहीं माना है। लक्ष्मी को माँ के रूप में स्मरण करना या पूजन करना मात्र ही स्वयंम् का अहित करना है।

दूसरा स्वरूप पत्नी के रूप में हैं, और पत्नी का अर्थ अद्र्धांगिनी है, जिसका घर में और शरीर पर बराबर, आधा अधिकार है। हम यहाँ पत्नी शब्द को वासना के रूप में प्रचलित नहीं कर रहे है, बल्कि संबंध-निर्वाह की बात कर रहे है। पत्नी से किसी भी रूप में, किसी प्रकार का कोई लेन-देन नहीं होता। व्यापार-विनिमय नहीं हो सकता। यहाँ तो जितना लिया है, उतना देना ही पड़ता है। उस पर अधिकार नहीं जमा सकते। उस पर पूरी तरह से नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकते। यदि उसे बहुत अधिक दबाया जाए तो वह विद्रोही हो जाती है और वह पर-पुरूषरत हो सकती है। इसीलिए शास्त्रों में भी लक्ष्मी को पत्नी के रूप में भी ज्यादा उचित नहीं माना गया है।

लक्ष्मीजी का तीसरा रूप प्रेमिका का है। प्रेमिका का तात्पर्य, जो सब कुछ देने के लिए उतावली रहती है। अपना जीवन, अपना यौवन, अपना शरीर, अपना धन, मान, प्रतिष्ठा और सब कुछ। जो सब कुछ देकर सन्तुष्ट होती है, उसके मन में लेने की कुछ भी इच्छा नहीं होती, जो लेन-देन में विश्वास नहीं करती, वह प्रेमिका कहलाती है।

शास्त्रों ने लक्ष्मीजी को प्रेमिका के रूप में स्वीकार किया है। यजुर्वेद में लक्ष्मी का आह्वान करते समय कहा है, ‘‘तू प्रेमिका रूप में मेरे जीवन में थी, जिससे मेरे जीवन में सभी दृष्टियों से पूर्णता आ सकी, प्रेमिका को भी आबद्ध करना आवश्यक होता है, क्योंकि नारी स्वभाव से ही चंचल होती है, उसे शब्दों से, विचारों से या कार्यों से आबद्ध करना जरूरी होता है। प्रेमिका को भी अपने पौरुष से आबद्ध किया जा सकता है और तांत्रिक ग्रन्थों में तन्त्र को ही पौरुष माना गया है। तंत्र का अर्थ ही पौरुष है।

अद्वितीय बंधन

विश्वामित्र क्रांतिकारी व्यक्तित्व सम्पन्न ऋषि थे। सही अर्थों में वह गृहस्थ  थे, मगर सीने में पौरुष का सागर लहराता था, आँखों में एक विशेष चमक और प्रकृति पर पूर्णतः नियन्त्रण प्राप्त करने की शक्ति और क्षमता भी उनमें थी, जो कठिन चुनौतियों को हंसकर स्वीकार कर लेते थे और उन चुनौतियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेते थे।

विश्वामित्र ने लक्ष्मीजी की इस चंचल प्रवृत्ति को पहचाना। ‘ लक्ष्मी सपर्या ग्रन्थ’ में इस विधि का विस्तार से वर्णन है। वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने लक्ष्मी पर एक स्वतन्त्र ग्रन्थ की रचना की। लक्ष्मी के तीनों स्वरूपों को स्पष्ट किया और बताया कि लक्ष्मी के सामने गिड़गिड़ाने से, हाथ जोड़ने से, प्रार्थना करने से लक्ष्मी हमारी मदद नहीं कर सकती, उसका तो प्रेमिका स्वरूप ही महत्वपूर्ण है और प्रेमिका दो तरीकों सेही नियंत्रित हो सकती है या तो अत्यधिक स्नेह और प्यार से या प्रबल पौरुष से।

विश्वामित्र ने कहा, ‘‘प्रबल पौरुष के माध्यम से ही प्रेमिका को हमेशा-हमेशा के लिए अपने घर में आबद्ध किया जा सकता है, क्योंकि पौरुष, तन्त्र के माध्यम से ही सम्भव है। तन्त्र का तात्पर्य है, व्यवस्थित तरीके से कार्य सम्पादित करना और यदि सही तरीके से लक्ष्मी से सम्बन्धित प्रयोग को सम्पन्न किया जाए तो लक्ष्मी को मजबूरन घर में आना ही पड़ता है और सदैव के लिए घर में कैद होकर रहना पड़ता है।

विश्वामित्र ने अपने इस अद्वितीय ग्रन्थ में इन सारे प्रयोगों को विस्तार से विवेचित किया। यह ग्रन्थ अभी तक सर्वथा गोपनीय है। इसमें लक्ष्मी को प्रिया रूप में सम्मोहित करके अपने घर में आबद्ध करने की प्रक्रिया और अनुष्ठान को समझाया गया है।

विश्वामित्र ने स्वयं स्वीकार किया कि मैंने लक्ष्मी की अर्चना-पूजा माँ के रूप में भी की, बहन और पत्नी के रूप में भी की, परन्तु मुझे पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं हुई, जब मैंने प्रेमिका रूप में अपने पौरुष के माध्यम से आबद्ध किया, तब उसे मजबूर होकर मेरे आश्रम में आना पड़ा और बैठना पड़ा।

मन्त्र या तन्त्र

लक्ष्मी अर्चना, मन्त्र के माध्यम से भी सम्भव है और तन्त्र के द्वारा भी। मन्त्र का तात्पर्य प्रार्थना करना, स्तुति करना, निवेदन करना है। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक नहीं है कि वह हमारी प्रार्थना या स्तुति स्वीकार करे ही क्योंकि बाजी उसके हाथ में रहती है।

ये सारी पूजा-अर्चना, साधना, विधियां मन्त्रों के द्वारा सम्पन्न होती हैं और हमने इन मन्त्रों के द्वारा मात्र लक्ष्मी को प्रसन्न करने की क्रिया ही की है। उसके सामने घण्टा-घड़ियाल बजाए है, नैवेद्य का भाग लगाया है, आरती उतारी है और प्रार्थना की है। यह सब हमारी कायरता है, निम्नता है, गिड़गिड़ाना है, अपने आपको कमजोर और अशक्त बनाकर हाथ जोड़ना है, भीख माँगना है।

विश्वामित्र ने कहा, ‘‘हाथ जोड़ने से नारी हमारे वश में हो ही नहीं सकती।’’ दीनता और गिड़गिड़ाना उसके सामने अपने आपको कमजोर सिद्ध करना है। कमजोर के घर में तो पत्नी भी नहीं टिकती। इसके लिए तो प्रबल पौरुष की जरूरत होती है और यह पौरुष तन्त्र के द्वारा ही संभव है।

लक्ष्मी तुझे मेरे घर रहना ही पड़ेगा

प्रचलित है कि, जब मन्त्रों के माध्यम से लक्ष्मी विश्वामित्र के आश्रम में नहीं आई, तो विश्वामित्र ने एक सर्वथा नवीन तन्त्रोक्त विधि प्रचलित की जिसे ‘‘लक्ष्मी सपर्या विधि’’ कहा गया। इस विधि के माध्यम से विश्वामित्र ने प्रयोग सम्पन्न किया और ज्यों ही प्रयोग पूरा हुआ, लक्ष्मी को पूर्ण श्रृंगार के साथ विश्वामित्र के सामने आने के लिए बाध्य होना ही पड़ा। इसके बाद लक्ष्मी ने स्थायी रूप से विश्वामित्र के आश्रम में निवास किया तथा पूर्ण समृद्धता, सम्पन्नता दी।

लक्ष्मी-सपर्या विधि

यह तन्त्र की सर्वधा गोपनीय और आश्चर्यजनक विधि अनुष्ठान इस प्रकार है जो विश्वामित्र रचित ग्रन्थ में उपलब्ध है। इसका प्रयोग करने पर आश्चर्यजनक सफलता एवम् सम्पन्नता प्राप्त होती है। अनुष्ठान सम्पन्न होने के बाद एक नहीं बल्कि विभिन्न रास्तों से धन प्राप्त होने लगता है और व्यक्ति के जीवन में धन, यश, मान, पद, प्रतिष्ठा, वैभव, भवन, वाहन आदि की पूर्णता आ जाती है।

विधि: यद्यपि यह थोड़ी जटिल क्रिया है, पर सौम्य साधना है। अष्टगंध से भोजपत्र पर विशेष यन्त्र उत्कीर्ण कर पूरे घेरे में चलते हुए यन्त्र के मध्य में लक्ष्मीजी को आबद्ध किया जाता है। प्रेमिका रूप में लक्ष्मीजी को आबद्ध कर, पूजन के द्वारा उसे स्थायित्व दिया जाता है।

यह विशेष अनुष्ठान दीपावली के पर्व पर सम्पन्न होता है। विशेष मुहूर्त में शरीर को लक्ष्मी सूक्त मन्त्र से आपूरित कर पूर्ण कुम्भ के द्वारा लक्ष्मी का आह्वान कर सपर्या कीलन के द्वारा उसे यन्त्र में स्थापित किया जाता है और फिर उसे हमेशा के लिए आबद्ध कर दिया जाता है। यह सारी विधि विशेष मन्त्रों के द्वारा विशेष क्रिया पद्धति एवं यन्त्र लेखन के द्वारा ही संभव होती है। साधक स्वयं भोज पत्र पर एक विशेष स्थान से लक्ष्मी को अष्ट गंध के द्वारा उत्कीर्ण करता हुआ आबद्ध करता रहता है इस प्रकार एक सौ आठ बार लक्ष्मी आबद्ध क्रिया सम्पन्न करता है। इसमें नित्य छः घण्टे लगते हैं और तीन दिन में यह अनुष्ठान सम्पन्न हो जाता है।