Matchmaking Rules for Marriage / विवाह से पहले देखें मेलापक विचार

विवाह से पहले कुंडली मिलान एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इनके मिलान से ही वर-वधु के वैवाहिक जीवन में सामंजस्य का पता लगता है।

गुण मिलान:- वर और कन्या के जन्म नक्षत्र के अनुसार गुणों का मिलान करना चाहिए। कुल गुण 36 होते हैं। यदि 18 गुणों से अधिक गुण मिले तो संबंध किया जा सकता है। 18 से 22 तक साधारण, 23 से 26 मध्यम तथा 27 से ऊपर उत्तम माना गया है।

भकूट दोष:- कन्या की राशि से वर की राशि तक और वर की राशि से कन्या की राशि तक गणना कर लेनी चाहिए। यदि गिनने से दोनों राशियां परस्पर छठी और आठवीं होने पर षडाष्टक भकूट होता है। नवीं और पांचवीं हो, तो नवपंचम तथा दूसरी और बारहवीं हो तो द्विदशंश दोष होता है। षडाष्टक हो तो मृत्यु, नवपंचम हो तो संतान हानि तथा द्विदशंश हो निर्धनता फल होता है।

नाड़ी दोष:- वर-कन्या के जन्म नक्षत्र के अनुसार नाड़ी देखकर विचार करना चाहिए। नाड़िया तीन होती हैं आद्या, मध्य व अन्नय। वर कन्या की नाड़ी भिन्न-भिन्न होना जरूरी है। एक नाड़ी होने से दोष माना जाता है। वर-कन्या की राशियों में मित्रता हो तो नाड़ी दोष नहीं होता है।

ग्रह मिलान:- वर कन्या की कुंडली का मिलान करने के लिए दोनों के ग्रहों का मिलान करना चाहिए। यदि जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में मंगल, शनि, राहू तथा केतु हो, तो पति या पत्नी की हानि या कुछ और अनिष्ट भी हो सकता है।

इनका रखें खास ध्यान

–              मंगल पुरुष – मंगल स्त्री से संबंध करना श्रेष्ठ माना जाता है।

–              वर की कुंडली में लग्न तथा शुक्र से 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में पाप ग्रहों मंगल, शनि, राहू तथा केतु का तथा कन्या की कुंडली में लग्न व चंद्रमा से 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में पाप ग्रहों का होना खराब होता है।

–              वर की कुंडली में लग्न से छठे स्थान में मंगल, सातवें स्थान पर राहु तथा आठवें स्थान पर शनि होने से पत्नी नाश होता है। इसी प्रकार कन्या की कुंडली में उपर्युक्त योग होने से पतिहंता योग होता है।

–              कन्या की कुंडली में 7वां तथा 8वां और वर की कुंडली में सातवां भाव विशेष रूप से देखना चाहिए। इन स्थानों पर पाप ग्रहों के रहते या पाप ग्रहों की दृष्टि होने से अशुभ फल प्राप्त होता है। यदि वर तथा कन्या दोनों की कुंडलियों में उक्त स्थानों पर अशुभ ग्रह हो, तो संबंध किया जा सकता है।

–              कन्या की कुंडली में सप्तम भाव में स्थित मंगल पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो बहुत अशुभ फल प्राप्त होता है। अष्टमेश सातवें तथा सप्तमेश आठवें भाव में होने से भी अशुभ योग बनता है।