Lal Kitab remedies for Debts / लाल किताब और ऋण-मुक्ति

मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसके पूर्व जन्म के कर्मों के फल भी उसके साथ ही जुड़े रहते हैं। कोई अपने पूर्व जन्मों के कर्म के कारण अच्छे कुल (खानदान) में जन्म लेता है तो कोई गरीब की झोंपड़ी में। हर व्यक्ति का नसीब भी उसके साथ जुड़ा रहता है। एक गरीब व्यक्ति झोंपड़ी में जन्म लेकर भी अपनी मेहनत एवं लगन से आसमान की बुलन्दियों को छू लेता है तो कोई महलों में पैदा होकर सोने-चांदी के चम्मच से दुध पीने वाला भी बड़ा होकर ऐयाशी में अपने पिता-दादा के दौलत को उड़ा हर गरीब बन जाता हैै। यह किस्मत का खेल है जो व्यक्ति के साथ खेला जाता है।

इसी प्रकार कई व्यक्तियों की अच्छी तकदीर होने के बावजूद वे अपने पूर्वजों के पाप का, उनके कर्मों का, उनके गुनाहों की सजा भूगतते हैं। जो करीबी रिश्तेदार होगें जैसे-बेटा, भाई, भतीजा, पोता आदि, वह अपने पूर्वजों के कर्मो का फल इस जन्म में भोगेगा।

पितृ-ऋण

भारत के हर प्रान्त की परम्परा है कि कर्ज लेता है तो उसे कर्ज को चुकाने का फर्ज उसके पुत्रों का ही होता है। लाल किताब ने इसे ज्योतिष से जोड़ दिया है। आप मात्र अपने कर्मों का फल ही नहीं पूर्वजों के कर्मो का फल भी भोगते हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है-“कर्मण्येवााधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्“, अर्थात कर्म करते रहो, फल की चिन्ता न करो। फल का वंशानुगत प्रभाव इस बात से स्पष्ट है।

पारंपरिक ज्योतिष में कालसर्प नामक एक योग है। यह योग भी वंश-परम्परा के दोष को स्पष्ट करता है। पितृ-दोष के कारण ही व्यक्ति की कुण्डली में कालसर्प योग होता है एवं उसके परिवार में कई व्यक्तियों की कुण्डली में यह योग देखने को मिल जाता है प्रायः सारा परिवार ही इस योग के दोष से पीड़ित होता है। आर्थिक प्रगति रूक जाती है, घर का सुख-चैन छिन जाता है।

इसी प्रकार किसी परिवार के एक सदस्य की कुण्डली में केमद्रुम योग  होगा तो उस परिवार में पुत्र-पौत्र, भाई-भतीजा आदि की कुण्डलियों में यह योग स्थिर होगा। इस योग के कारण चन्द्रमा पीड़ित होता है और मानसिक परेशानियों के कारण जातक को व्यथित कर देता है। यह सत्य है कि पूर्वजों के कर्मो के फल भोगने ही पड़ते है। यही पूर्वजों का ऋण है अर्थात् पित्-ऋण है।

पितृ-ऋण को कैसे पहचाना जाय, किस प्रकार ज्ञात किया जाय कि अनिष्ट, पितृ-ऋण के कारण ही है ? किन पूर्वजों के पाप या कर्म के कारण है ? पितृ-ऋण के दोष का निवारण कैसे करे ?

लाल किताब में पितृ-ऋण के बारे में लिखा है-

घर नौवें हो ग्रह कोई बैठा बुध बैठा जड़ साथी जो।

ऋण पितर उस घर से होगा असर ग्रह सब निष्फल को।

साथी ग्रह जब जड़ कोई काटे दृष्टि मगर वह छुपाता हो।

5, 12, 2, 9 कोई मन्द, ऋण पितर बन जाता हो।।

जन्म कुण्डली में जिस ग्रह की राशि में उसका शत्रु ग्रह बैठकर उसके फल को नष्ट कर रहा हो और साथ ही स्वयं भी बेअसर-मंदा हो रहा हो तो ऋण पितृ होगा। जिसकी पहचान होगी कि पिता, पुत्र, भाई आदि सभी या अधिकांश जन्म कुण्डलियों में मंदा ग्रह एक ही भाव में या ऐसे ही किसी दूसरे भाव में जहां के पूर्ण मंदा समझा जाता हो, स्थिर होगा। ऐसे व्यक्ति के ग्रह-योग राजयोग कारक क्यों न हों, जिन ग्रहों का बुरा असर होगा उनके उपाय करने होंगे।

लाल किताब के अनुसार जिस ग्रह के पक्के घर (कारक भाव) में शत्रु ग्रह स्थिर हों वह भाव पीड़ित माना गया है पीड़ित ग्रह जिन परिवारजन के कारक होंगे उन्हीें परिवारजन के पाप/श्राप से पितृ-ऋण दोष होगा।

 

 

उपर्युक्त कुण्डली में देखें-चन्द्रमा के घर में अर्थात् भाव नम्बर 4 में चन्द्रमा का शत्रु केतु स्थिर है एवं सूर्य भी केतु के भाव में स्थिर होकर पीड़ित है। पितृ-ऋण की पहचान केवल जन्म-कुण्डली से ही होती है।

पितृ-ऋण की पहचान

भाव 9 का स्वामी बृहस्पति किसी अन्य भाव में स्थिर हो, बृहस्पति पर उसके शत्रु ग्रह की दृष्टि हो तब बृहस्पति पितृ-ऋण का ग्रह कहलायेगा।

जिस ग्रह के भाव में उसका शत्रु ग्रह बैठ जाये, शत्रु ग्रह का अपना प्रभाव भी नष्ट हो रहा हो तो वह कुण्डली पितृ-ऋण की कुण्डली मानी जायेगी।

जन्म-कुण्डली में जिस ग्रह की कारक राशि में उसका शत्रु ग्रह स्थिर होकर उसके फल को नष्ट कर रहा हो एवं साथ ही स्वयं भी अपना प्रभाव खो रहा हो तो यह योग वंश की कई जन्म कुण्डलियों में दिखाई देगा। जैसे राहु 11 में, शनि 4 एवं 9 में, बुध 2,3,8,11 एवं 12 में हो।

9 वे भाव के कारक बृहस्पति के अन्य भावों में स्थिर एक या एक से अधिक ग्रह आपसी शत्रुता रखते हो, या बृहस्पति का असर नष्ट कर रहे हों तो पितृ-ऋण होगा।

चन्द्रमा के समय मातृ-ऋण आदि और ग्रह भी अपने ऋण देंगे। अशुभ प्रभाव दो ग्रहों का होगा और उपाय भी दोनों ग्रहों के ही करने होंगे।

कारणः

कुण्डली के जातक के पिता ने कुत्ते मरवाये हों या मारे हों या पशुओं को कष्ट दिया हो तो जातक पर बृहस्पति और केतु दोनों ग्रहों का पितृ-ऋण होगा जो कि 16 से 24 वर्ष तक हो सकता है।

निवारण उपाय-

जो ग्रह पितृ-ऋण को हो, उसे उच्च करने का

उपाय उसकी अवधि से पूर्व ही कर लेना चाहिये

अन्यथा वह अपनी अवधि में हानि अवश्य

पहुंचायेगा, जैसे-बृहस्पति के लिए 16 वर्ष से पूर्व, सूर्य के लिए 22 वर्ष से पूर्व, चन्द्रमा के लिए 24 वर्ष से पूर्व, मंगल के लिए 28 वर्ष के पूर्व, शुक्र के लिए 25 वर्ष से पूर्व, बुध के लिए 34 वर्ष से पूर्व, शनि के लिए 36 वर्ष से पूर्व  उस ग्रह की शान्ति हेतु उपाय कर लेने चाहिए। एक समय में केवल एक ही उपाय करें। कुछ समय के उपरान्त दूसरा उपाय शुरू करें।

पक्के घर का राहु (12 वे भाव का कारक) और केतु (6 या 2, 8 भाव का कारक) सही रूप में मदद करने वाला न हो तो केवल सांसारिक सुखों पर ही असर होगा, अशुभ प्रभाव नहीं देगा।

पितृ-ऋण के उपाय में रक्त-सम्बन्धी जैसे बेटा, बेटी, पौत्र, दौहित्र, बहिन, भांजा, भांजी सभी शामिल हैं। यदि कोई भी नहीं हो तो स्वयं ही उन सभी के हिस्सों की भरपाई कर दें लेकिन इस स्थिति मंे स्वयं का हिस्सा अपने हिस्से के हिसाब से 10 गुना अधिक होना चाहिये।

नवम भाव और बुध से पितृ-ऋण

लग्न या 8 वें भाव में बुध और 9 मेें गुरू हो।, 2 या 7 वें भाव में बुध और 9 में राहु हो।, 3 में बुध और 9 में राहु हो।, 4 में बुध और 9 में चन्द्रमा हो।, 5 मे बुध और 9 में सूर्य हो।, 6 में बुध और 9 में केतु हो।, 10 या 11 में बुध और 9 में शनि हो।, 12 में बुध और 9 में गुरू हो।

उपर्युक्त सभी स्थितियों में बुध मुकाबले का ग्रह बन जाता है और दूसरे ग्रहों के फल को बिगाड़ता और अशुभ करता है। इस परिस्थिति में बुध का उपचार सहायक होगा।

गुरू से पितृ-ऋण

गुरू केन्द्र में और शनि 2 में हो।, गुरू केन्द्र में और शुक्र 5 में हो।,  गुरू केन्द्र में और बुध 9 में हो।, गुरू केन्द्र में और राहु 12 में हों।, गुरू केन्द्र में और बुध, शुक्र 3, 6 में हो।, गुरू केन्द्र में और शनि 3 या 6 में हो।

उपर्युक्त सभी स्थितियों में गुरू (बृहस्पति) के कारक पितृ-ऋण योग बनेगा अतः बृहस्पति का उपचार करने पर अशुभ प्रभाव से मुक्ति मिलती है।

पितृ-ऋण के कारणः  कुल पुरोहित कारणवश बदला गया होगा।

लक्षण: आस-पास धर्म-मन्दिर या बृहस्पति की वस्तुएं (पीपल का वृक्ष) नष्ट कर दिया गया हो।

अनिष्ट प्रभाव

40 वर्ष की आयु पश्चात् दुर्भाग्य का दौर शुरू हो जाता है। पैसा खो जाता है या चोरी हो जाता है। शिखा (चोटी) के स्थान पर से सिर के बाल झड़ने लगते है। गले में माला पहनने की आदत पड़ जाती है। विद्या में रुकावट आती है फलतः शिक्षा अधूरी रह पाती है। जातक पर झूठे अभियोग चलते हैं, अफवाहें उड़ती हैं। निर्दोष होने पर भी जेल होती हैै।

निवारण उपायः

परिवार के प्रत्येक व्यक्ति से धन एकत्र कर मंदिर में दान दें या अपने घर के समीप मंदिर की सेवा करें, सफाई करें, पीपल के वृक्ष को सींचे, देख-भाल करें।

अन्य कारणः

सूर्य 1,11 में न हो एवं शुक्र 5 में हो।, चन्द्रमा 4 में न हो एवं बुध, शुक्र शनि 4 में हो।, शुक्र 1 या 8 में न हो एवं सूर्य, चन्द्र, राहु 2 या 7 में हो।, मंगल 7 में हो एवं बुध, केतु या 1 या 8 में हो।, बुध 2 या 12 में न हो एवं चन्द्र 3 या 6 में हो।, शनि 3 या 4 में न हो एवं सूर्य, चन्द्रमा, मंगल 10, 11 में हो।, राहु 3 या 4 में न हो एवं सूर्य, शुक्र, मंगल  12 मंे हो।, केतु 2 में न हो एवं राहु, केतु, मंगल 6 मे हो।

उपर्युक्त परिस्थितियों में क्रमशः सूर्य, चन्द्रमा, शुक्र, मंगल, बुध, शनि, राहु, केतु पीड़ित होंगे एवं सभी परिस्थितियों में भी पितृ ऋण होंगे।

स्व-ऋण (अपना ऋण)

जब शुक्र पांचवें घर (भाव) में हो तब सूर्य पीड़ित हो जाता है।

कारणः  धर्म, देव, रीति-रिवाज आदि का अपमान करने लगे, ईश्वर को न माने, नास्तिक हो जाये तब स्वयं का ही ऋण होता है।

लक्षण: घर में जमीन के नीचे अग्नि-कुण्ड हो या छत खुली हुई हो अर्थात् छत में छेद से रोशनी आती हो, दिल की बीमारी हो।

अनिष्ट प्रभावः व्यक्ति खूब उन्नति करके धन-संपत्ति एकत्रित करता है। मान-सम्मान, प्रतिष्ठा पाता है। जब व्यक्ति का पुत्र ग्यारह माह या ग्यारह वर्ष का होगा तब अचानक सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है। पैसा चोरी हो जाता है। प्रतिष्ठा अपमान में बदल जाती है। शरीर के अंग अकड़ जाते है। चलने-फिरने से लाचार हो जाता है। मुंह मे हर समय थूक/लार बहती रहती है।

निवारण उपायः परिवार के प्रत्येक व्यक्ति से बराबर का हिस्सा लेकर सूर्य का यज्ञ करें। जब केतु चैथे भाव में होगा तब चन्द्रमा पीड़ित होने पर मातृ-ऋण होगा।

कारणः अपनी संतान उत्पन्न करने के बाद माता का अपमान करना, घर से बाहर निकाल देना, मां के दुःखी होेने पर उसकी उपेक्षा करना।

लक्षणः पड़ोस के कुएं, नदी, नाले, तालाब या पूज्य स्थानों को गंदगी का ढेर बना दिया जाय, गंदगी ड़ालने का स्थान बना दे।

अनिष्ट फलः

व्यक्ति की सारी जमा-पूँजी चूकने लगती है, नष्ट होने लगती है। बीमारी घेर लेती है। शिक्षा में रुकावट आती है। जो भी उसकी मदद करने की चेष्टा करता है उसका भी अहित होने लगता है। व्यक्ति गलत सोहबत (संगत, माहौल, दोस्ती) में पड़ जाता है। व्यक्ति की हिम्मत जवाब देने लगती है, उसकी महसूस करने की शक्ति समाप्त हो जाती है।

निवारण उपायः  पूरे परिवार मंे बराबर के

हिस्से में चांदी लेकर एक ही दिन में, एक साथ

दरिया, नदी, नाले, तालाब में डाल दें तो उसे

मातृ-ऋण से मुक्ति मिल जायेगी।

स्त्री-ऋण

सूर्य, राहु या केतु दूसरे भाव में हो तो शुक्र पीड़ित होगा, इस कारण स्त्री ऋण होगा।

कारणः गर्भवती स्त्री को प्रसूति के समय लालचवश मार डाला हो। परिवार के सदस्यों में आपस में मारपीट आदि होती हो।

लक्षणः उस परिवार के व्यक्तियों में किसी एक बात या उसूल पर सभी को घुणा होगी विशेषकर गाय-पालन से। परिवार में खुशी के समय विवाद होगा।

अरिष्ट प्रभावः परिवार में खुशी के समय किसी की मौत हो जाये, मातम छा जायें तो स्त्री-ऋण के कारण शुक्र पीड़ित होने की पहचान है।

निवारण उपायः परिवार के सभी सदस्यों से बराबर मात्रा में धन एकत्रित करके एक ही दिन एक ही समय पर लगभग सौ गायों को (जो अंगहीन न हों) चारा आदि खिलाने से मुक्ति होती है। सलीके के वस्त्र पहनने से भी शुक्र के दोष से निवृत्ति होती है।

रिश्तेदारी (सम्बंदियो) का ऋण

पहले या आठवें भाव (घर) में बुध या केतु हो तो मंगल पीड़ित हो जाने से रिश्तेदारी का ऋण दोष होगा।

कारणः किसी मित्र को धोखा देना, जहर देना, किसी के मकान में या पकी फसल मंे आग लगाना या लगवा देना, किसी का जानवर मार देना या मरवा देना।

लक्षणः व्यक्ति अपने सगे-सम्बन्धियों से धृणा करता होगा। घर में जन्म-दिन या त्यौहार नहीं मनाता होगा। हर प्रकार की खुशी से दूर रहता होगा। सब कुछ पाकर भी दीन-हीन होगा।

अनिष्ट प्रभावः युवा-अवस्था में आने पर व्यक्ति रुपया-पैसा कमाने लगता है एवं स्वयं के पैरों पर खडे़ होकर मान-सम्मान पाता है। लेकिन सब कुछ पाकर भी वह खो देता है। शक्तिहीन हो जाता है। संतान नहीं होती और अगर होती भी है तो जीवित नहीं रहती, अपाहिज होती है। मंगल जनित दोष होते है। शरीर में खून की कमी होती है। एक आँख का मालिक (काणा) बन जाता है। अकारण लड़ाई-झगडा कर पिटता है।

निवारण उपायः परिवार के सभी सदस्यों से बराबर पैसा लेकर गरीबों के इलाज के लिए किसी वैद्य या डाॅक्टर को दें।

सुहासिनी (बहन-बेटी) का ऋण

तीसरे या छठे भाव में चन्द्रमा हो तो बुध पीड़ित होगा और बहन-बेटी के ऋण को दोष होगा।

कारणः किसी कि बहन-बेटी के साथ धोखा किया हो, इज्जत (जवानी) से खिलवाड़ किया हो, अत्यधिक जूल्म किये हों या हत्या कर दी हो।

लक्षणः मासूम बच्चों को चोरी-छिपे पिटने की इच्छा होगी। खर्च अधिक होता होगा।

अरिष्ट प्रभावः घर में लड़की या बहन के विवाह के समय दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं घटती होगी। पैसा बर्बाद हो जाता है संभोग करने की शक्ति खत्म हो जाती है या क्षीण हो जाती है। दाँत झड़ जाते है और ग्रहण शक्ति अल्प हो जाती है।

निवारण उपायः परिवार के सभी सदस्यों से पीले रंग की कौड़ियां एक़ित्रत करें। कौड़ियों को जलाकर राख बना लें और पानी में बहा दें। या सभी से बराबर-बराबर पैसा एकत्रित कर बुधवार के दिन शुद्ध घी से हलवा-पूरी आदि बनाकर 101 कन्याओं के चरण धोकर दक्षिणा सहित हलवा-पूरी दें।

निर्दयी (जालिमाना) ऋण

सूर्य, चन्द्र 10 या 11 वें भाव में होने पर शनि के पीड़ित होकर जालिमाना ऋण दोष देगा।

कारणः किसी भी जीव की हत्या करना। किसी का मकान धोखे से हड़प लेना।

लक्षणः स्वयं के मकान का मुख्य द्वार दक्षिण में होगा। अनाथों के लिए बनाये मकान पर मकान बनाया हो, रास्ते पर या कुएं पर मकान खड़ा किया गया होगा।

अरिष्ट प्रभावः परिवार पर विपदाएं आती है। दुर्घटनाएं होती हैं। परिवार के सदस्य अपाहिज होते है। शरीर के बाल विशेषकर पलकों एवं भोंहों के विशेष रूप से झड़ते है।

निवारण उपायः परिवार के सभी सदस्यों से धन एकत्रित करके एक दिन एक साथ सौ मजदूरों को भोजन करवायें अथवा सौ स्थानों से मछलियां एकत्रित कर उन्हें चारा डालें। 43 दिन तक कौओं को रोटी देने से भी शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है।

अजन्मे (अजात) का ऋण

बारहवें भाव में सूर्य, चन्द्र या मंगल पर राहु पीड़ित होगा।

कारण:

सम्पर्क में आये व्यक्तियों से धोखा करना या ऐसा ठगना की सारा परिवार, खानदान का नाश हो गया हो। ससुराल से धोखा किया हो।

लक्षणः

घर की दक्षिण दीवार साथ उजाड़ एवं वीरान

होगी या चने-भूट्टे भूनने वाले (भड़भूंजे) की भट्टी

होगी। घर के मुख्य द्वार की दहलीज के नीचे से घर का

गंदा पानी बाहर निकलने की नाली होगी।

अरिष्ट प्रभावः

अचानक ही सभी कार्य उलटे होने लगते है। पैसे की बर्बादी होती है। सोचे-विचारे सभी कार्यो में रुकावट आती है। बिना किसी कारण के भी जेल की यातना सहनी होती है।

निवारण उपायः

परिवार के प्रत्येक सदस्य से एक-एक नारियल लेकर एक ही दिन एक साथ पानी में बहा दंे। संयुक्त परिवार में रहें एवं ससुराल से बनाकर रखें।

कुदरती (देवी) ऋण

छठे भाव में चन्द्रमा या मंगल हो तो केतु पीड़ित होता है।

कारणः

बदनीयत के कारण किसी के कुत्ते को मार डाला हो। किसी फकीर हो परेशान किया हो। बदचलनी से धोखा किया होगा। किसी जीव का नाश किया हो।

लक्षणः

दूसरों के वंशजों को गुप्त रूप से, धोखे से मार डालना। कुत्तों को गोली से मारना या मरवाना। सगे-संबंधियों के प्रति बुरी नीयत रखते हुए उनके वंश का नाश कर डालना।

अरिष्ट प्रभावः

केतु के पीड़ित होने पर पुरुष संतान पर प्रभाव होगा है। मूत्र जनित रोग होते है। फलतः पुत्र होता नहीं है और होता है तो जीवित नहीं रहता। यदि जीवित रह भी जाय तो अपाहिज होगा।

निवारण उपायः

परिवार के प्रत्येक सदस्य के बराबर मात्रा में धन जमा कर एक ही दिन एक साथ सौ कुत्तों को रोटी खिलायें। पड़ोस की विधवा की सहायता करें। उनका आशीर्वाद लें।

जहा पर आलेख में 8 वें, 4 में, 6 सें इस प्रकार लिखा गया है वह भाव के सम्बन्ध में लिखा गया है। अतः इस आलेख के शुरूआती भाग को न समझ पाये हो, तो भाव को दिमाग मे रखकर पुनः पढे़।

 

 

 

 

आपकी सुविधा के लिए विभिन्न प्रकार के ऋणों को एक ही दृष्टि में तालिका के जरीये समझाया जा रहा है।