Kal Sarp Dosh Myths and Reality / कालसर्प दोष भ्रांतियाँ और वास्तविकता निवारण के मार्ग


कालसर्प दोष भ्रांतियाँ और वास्तविकता निवारण के मार्ग

आलेख: राजेश श्रीमाली

 

आप जब भी किसी ज्योतिषी से मिलते हो और आपकों यह पता चलता है, कि आपकी कुण्डली में कालसर्प दोष है और ज्योतिषी आपको कहता है कि इस कालसर्प दोष की वजह से ही आपके जीवन में ये कठिनाईयां, ये अवरोध, ये चिन्ताएं एवं कष्ट आ रहे है। आप सफलताओं के करीब पहुँच कर भी अन्तिम समय असफल हो जाते हो , तो शायद ऐसा हो सकता हैै कि उस ज्योतिषी की बात आंशिक सत्य ही हो। कालसर्प दोष सदैव कष्ट कारक नहीं होता। आपको जानकर हैरानी होगी की स्वतन्त्र भारत की कुण्डली, पण्डित जवाहरलाल नेहरु की, सन्त मुरारी बापू की कुण्डली, सम्राट अकबर की कुण्डलियों में भी कालसर्प दोष है। कालसर्प दोष कुछ न कुछ अवरोध जातक के जीवन में अवश्य पैदा करता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है की केवल और केवल कालसर्प दोष ही एक मात्र कारण हो।

कालसर्प दोष क्या है ?

यदि मैं आपको सरलतम भाषा में समझाऊँ, तो जब राहु और केतु के बीच में सारे ग्रह आ जाये, तो यह कालसर्प दोष कहलाता है। राहु को सर्प का मुख व केतु को पूँछ माना गया है।

राहु मुख्य रूप से दो प्रकार का माना गया है।

  1. पूवार्द्ध
  2. उत्तरार्द्ध

पूवार्द्ध के कालसर्प दोष में जातक को जीवन के पहले 46 साल में कष्ट, परेशानियाँ मिलती है।

पूवार्द्ध के कालसर्प दोष के कुछ उदाहरणः

उत्तरार्द्ध के कालसर्प दोष मे जातक को जीवन के 46 साल बाद कष्ट, परेशानियाँ मिलती है।

उत्तरार्द्ध के कालसर्प दोष के कुछ  उदाहरणः

नोटः विश्वविख्यात ज्योतिषविद्ध डाॅ. नारायणदत्त श्रीमाली ने अपनी विभिन्न पुस्तकों में उत्तरार्द्ध के कालसर्प दोष पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया है या उत्तरार्द्ध के कालसर्प दोष को अस्वीकार किया है।

इसके पीछे उनका तर्क ये था कि एक लगड़ा व्यक्ति लगड़ेपन के साथ एक समय पश्चात् लगडे़पन का अभयस्थ हो जाता है। उसके जीवन में लगड़ेपन का प्रभाव समाप्त हो जाता है। इसलिए एक आयु पश्चात् उसे यह महसूस होना ही बन्द हो जाता है, कि वह लगड़ा है परन्तु जब कोई व्यक्ति उसे देखता है तो उसके सामने सबसे पहले उस व्यक्ति का लगड़ापन ही आता है।

ज्योतिष में मुख्य रूप कुल 12 कालसर्प दोष बताये गये है एवं विस्तृत रूप में 12ग12 त्र 144 प्रकार के कालसर्प दोष माने गये है।

मुख्य रूप से 12 कालसर्प दोष के नाम इस प्रकार है।

  1. वासुकी कालसर्प योग

तृतीय भाव अर्थात् पराक्रम भाव में नवम भाव के मध्य राहु-केतु के मध्य अन्यान्य सभी ग्रह आने पर ‘वासुकी कालसर्प योग’ घटित होता है।

इस कुण्डली में देखेंगे राहु वृश्चिक राशि का है जिसका स्वामी मंगल लग्न में नीच के शुक्र के साथ है तथा धनेश नीचस्थ है, भाग्येश होकर एवं अष्टमेश का षडाष्टक है। लाभ भाव पर शनि की दृष्टि है। स्वयं लग्नेश-दशमेश द्वादश भाव में है। गुरु सप्तमेश होकर शत्रु राशिस्थ है एवं जन्म लग्न व चंद्र लग्न से जातक मंगली भी है।

परिणाम

  1. भाई-बहिन व परिवारजनों से निरन्तर कष्ट उठानें पड़ेंगे ।
  2. तृतीय भाव मित्र का होने के कारण जातक मित्रों से धोखा उठायेगा।
  3. गृहस्थ जीवन विशृंखलित रहेगा तथा पति-पत्नी में परस्पर कटुता, अविश्वास, वैमनस्यता, विरोध, भोग से असंतुष्टि रहेगी।
  4. भाग्य कदम-कदम पर आपके साथ चाल चलेगा। भाग्य में निरंतर उठा-पटक तथा भाग्योदय में अनेकानेक बाधाएं आयेंगी।
  5. नौकरी में बाधाएं, उन्नति में रुकावट। राज्य पक्ष से प्रतिकूलता व जातक अनेक बार सस्पेंड होता है।
  6. जातक को विदेश प्रवास में भारी कष्ट उठाने पड़ते है।
  7. कानूनी दस्तावेजों में भावुकतावश हस्ताक्षर कर पछताता है।
  8. जातक में नास्तिक भाव की प्रधानता रहती है।
  9. पद्म कालसर्प योग

पंचम स्थान से एकादश स्थान तक राहु-केतु के मध्य सभी ग्रह होने पर पद्म काल सर्प योग होता है।

पंचम भाव सन्तान एवं शिक्षा का तथा एकादश भाव लाभ का है। गुरु यद्यपि उच्च राशिस्थ है तथा स्वगृही चंद्र के साथ है, पर वह शनि से दृष्ट है तथा द्वादश भाव में है।

सूर्य स्वगृही है पर लग्न पर सूर्य-मंगल दो-दो अग्नि तत्व प्रधान ग्रहों का बल है। शुक्र अपनी नीच राशि में दशमेश होकर तथा अपनी द्वितीय राशि तुला से द्वादश है।

शनि यद्यपि उच्च राशिस्थ है पर राहु पर दृष्टि तथा भाग्य भाव को नीच दृष्टि से देख रहा है इतना ही नहीं सुख भाव पाप कर्तरी योग के मध्य है। स्वयं दशमेश शुक्र, सूर्य-मंगल व शनि के मध्य पाप कर्तरी योग में है।

इतना ही नहीं उच्च का गुरु-स्वगृही चंद्र भी केतु-सूर्य-मंगल के मध्य पाप कर्तरी योग कारक है। सप्तम भाव पर पाप दृष्टि है तथा सूर्य-मंगल की शत्रु राशि पर दृष्टि है।

परिणाम

  1. जातक को गृहस्थ सुख में निरन्तर बाधाएं आयेंगी।
  2. जातक को सन्तान सुख का अभाव रहता है। सन्तान होती ही नहीं और यदि होती भी है तो जी जलाने वाली होती है।
  3. वृद्धावस्था कष्टप्रद व्यतीत होती है-सन्तान दूर चली जाती है या माता-पिता से अलग हो जाती है।
  4. शत्रु कदम-कदम पर अहित करने का सतत प्रयास करता है अथवा शत्रु गोपनीय रूप से इनके मध्य षड्यन्त्र रचता रहता है।
  5. जेल या कारावास भोगना पड़ता है।
  6. गुप्त रोग, गुप्तांग संबंधी रोग जातक को पीड़ा पहुँचाते रहते है। रोग ठीक होना कठिन रहता है। आय का यथेष्ट भाग दवाइयों पर खर्च होता है।
  7. पत्नी चरित्रवान् मिल जाये, इसमें संशय है। स्त्री का चरित्र संदेहस्पद ही बना रहता है।
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  9. सच्चे मित्रों का अभाव रहता है। गुप्त शत्रु पीड़ित करते हैं, विश्वासघात होता है।
  10. सट्टे में, जुए में, रेस में, अशुभ कार्यो में भारी हानि उठानी पड़ती है।
  11. कर्कोटक कालसर्प योग

जब केतु द्वितीय व राहु अष्टम अथवा राहु द्वितीय व केतु अष्टम भाव में हो तो ‘कर्कोटल काल सर्प योग’ होता हैै।।

यहां देखें द्वादश भाव का स्वामी अपने से द्वादश तथा मंगल के साथ गुरु सुखेश होकर षडाष्टक कर रहा है। चंद्रमा राशि स्वामी अष्टम भावस्थ केतु के साथ ग्रहणयोग कर रहा है। वहीं भाग्य राशि भाव का स्वामी अपनी नीच राशि में है तथा मंगल से दृष्ट है। शनि-शुक्र-बुध अस्त हैं, सूर्य के साथ गुरु, मंगल शनि से दुष्ट हैं। षष्ठेश मारक भाव में है। सप्तमेश बुध का भी षडाष्टक योग है। नौ में से सात ग्रहों का बल अष्टम भाव पर है। शनि अपनी कारक राशि से द्वादश हैं।

  • जातक का अपने जीवन में भाग्योदय होता ही नहीं। यदि होता भी है तो बहुत देर से। ‘का वर्षा जब कृषि सुखाने’ भाग्य उदय होता भी है तो भाग्योदय में बार-बार रोड़े अटकते हैै।
  • नौकरी प्रायः नहीं मिलती। मिलती भी है तो सामान्य तथा नौकरी मंे पदोन्नति नहीं होती है या नौकरी से निकाला जाता है।
  • अथक प्रयास करने पर भी व्यापार जमता नहीं है तथा व्यापार में निरन्तर घाटा होता हैै, जिससे वह पीड़ित हो जाता है।
  • चाह कर भी जातक को पैतृक संपत्ति नहीं मिलती, यदि पैतृक संपत्ति मिलती भी है तो नहीं के बराबर।
  • लम्बी-असाध्य-दुरूह बीमारी भोगनी पड़ती है।
  • आॅपरेशन-चीर-फाड़-शल्य क्रिया होती है व घाव शीघ्र नहीं भरता है
  • ऐसे जातक की अकाल मृत्यु हो जाये तो आश्चर्य नहीं मानना चाहिए।
  • सच्चे मित्रांे का अभाव पाता है। मित्र धन हड़प जाते हैं या धोखा देते हैं अथवा कुमार्गगामी बनाते है।
  • कुलिक कालसर्प योग
  • केतु द्वितीय व राहु अष्टम भाव में हो तो ‘कुलिक कालसर्प योग’ होता है-

    देखें सप्तमेश अष्टम भाव में है। मंगल उच्चस्थ पर मंगल की राशि में चन्द्रमा नीच का है। लाभेश शनि नीच के हैं। सूर्य अपनी नीच राशि में है। भोग कारक शुक्र अस्त है। सुखेश -सप्तमेश बुध अस्त है। अष्टम भाव सूर्य- बुध -राहु- शुक्र- शनि के छः ग्रहों से पीड़ित है। शनि-मंगल परस्पर स्थान-परिवर्तन व परस्पर दृष्टि डाल रहे है। व्ययेश की दृष्टि अष्टम पर व अष्टमेश की दृष्टि मारक भाव द्वितीय पर है। स्वयं षष्ठेश सूर्य अष्टम भाव में नीच राशिस्थ है। गुरु की दृष्टि नीचस्थ चंद्रमा पर है।

    परिणाम-

    1. जातक की स्त्री कुरूप- निर्मोही- अल्पज्ञ – अनपढ़- अतिभोगी- अविश्वासी व वहमी है।
    2. सन्तान सुख में न्युनता रहेगी। पुत्र होकर भी क्रूर-दुष्ट अवज्ञा करने वाले, मन की करने वाले हांेगे अर्थात् जातक का सन्तान-सुख नहीं के समान है।
    3. स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट एवं जातक अपने भविष्य -वृद्धावस्था को लेकर सदैव चिन्तित रहता है। मूत्र रोग, धातु क्षीणता, गुर्दे की बीमारी, मस्से की बीमारी पीड़ा देती है।
    4. जातक अपने जीवन में अनेक स्त्रियों से संसर्ग कर अपमानित होता है।
    5. मित्र कदम-कदम पर धोखा देते हैं। मित्र-पिता-कुटुम्बी जनों का सहयोग नहीं पाता है।
    6. पिता की मृत्यु अल्पायु में हो जाती है।
    7. आर्थिक विषमता, अभाव, धन की न्यूनता पिंड नहीं छोड़ती। अथक परिश्रम निरन्तर संघर्ष करके भी जातक आर्थिक पक्ष नहीं सुधार पाता है। आय की अपेक्षा व्यय अधिक होता हैै।
    8. अपशय-निरादा, अपमान-उपेक्षा -आलोचना से जातक घिरा रहता है।
    9. कौटुम्बिक कलह से जातक पीड़ित रहता है।
    10. महापद्म कालसर्प योग

    जब राहु षष्ठ भाव में व केतु द्वादश भाव में हो तो उक्त ‘महापद्म कालसर्प योग’ की सृष्टि होती है।

    इस कुण्डली में द्वितीय धनभाव मंगल-शनि व सूर्य के मध्य होकर पाप कर्तरी योग बना रहा है। सूर्य पर शनि की दृष्टि है। शुक्र पर मंगल की दृष्टि है। दशमेश अपने से अष्टम है। सप्तम भाव पर शनि की नीच दृष्टि है। बुध का भाग्य भाव से षडाष्टक है तथा धनेश भी मंगल अपने से द्वादश है। गुरु स्वयं अपनी नीच राशि में है तथा गुरु राशिस्थ राहु है।

    परिणाम-

    1. जातक प्रेम-प्रकरण में सर्वथा असफल रहता है तथा गृहस्थ सुख न्युनतम रहता है।
    2. पत्नी का विरह योग सहन करना पड़ता है तथा पत्नी मनोनूकुल नहीं मिलती।
    3. जातक आयु पर्यन्त रोग-शोक-कष्ट-शत्रुओं से घिरा रहता है।
    4. जातक के चरित्र पर बार-बार छींटे लगते है। जातक का चरित्र विशुद्ध नहीं रह सकता।
    5. निराशा की भावना से वह ग्रसित रहता है।
    6. वृद्धावस्था कष्टप्रद रहती है एवं रोगपीड़ित रहता है।
    7. आय में न्यूनता, धर्म क्षति एवं खर्च की बहुलता रहती है।
    8. शंखनाद कालसर्प योग

    जब राहु नवम भाव में और केतु तृतीय भाव में हो और शेष ग्रह इनके मध्य हांे तो ‘शंखनाद काल सर्पयोग’ बनता है।

    यहाँ हम देखते हैं कि पंचमेश राहु के साथ भाग्य स्थान पर ग्रहण योग बना रहा है, वहीं भाग्येश षष्ठ भाव में शनि दृष्ट है। जातक का जन्म ही साढे़साती में हुआ है। जहां राहु पर गुरु की दृष्टि तथा लाभ भाव पर गुरु की नीच दृष्टि है, वहीं धन-धान्य-ऐश्वर्य का कारक ग्रह शुक्र अपनी नीच राशि में है तथा अष्टमेश अष्टम से द्वादश है। दशमेश का दशम भाव से षडाष्टक है। लग्न पर बुध की नीच दृष्टि है, शनि-राहु-चंद्र मंगल से दृष्ट है।

    परिणाम-

    1. जातक को भाग्यहीन, दुर्भाग्यशाली, हीन भाग्य कहा जा सकता है।
    2. राज्य पक्ष से प्रतिकूलता, मानहानि, अपमान, अवनति होना संभव है।
    3. पितृ-सुख में न्युनता तथा कार्य व्यापार-व्यवसाय में न्युनता, कम लाभ एवं बार-बार हानि होती रहती है। अथक परिश्रम करके भी व्यवसाय की स्थिति को नहीं संभाल पाता है।
    4. गृहस्थ सुख मंे बाधा एवं भोग से अतृप्ति रहती है।
    5. तक्षक कालसर्प योग

    जब राहु सप्तम और केतु लग्न में हो तथा सप्तम से लग्न के मध्य सूर्य-चंद्र-मंगल-बुध-बृहस्पति-शुक्र-शनि शेष सभी ग्रह हांे तो ‘तक्षक कालसर्प योग’ होता है।

    गुरु-राहु युति चाण्डाल योग बना रहे हैं तथा दशमेश गुरु राशि से षडाष्टक योग बना रहा है। सूर्य का स्व राशि सिंह से द्वि-द्वादश योग है तथा लाभेश मंगल का लाभभाव से षडाष्टक है। स्वयं लग्नेश बुध का अपनी कारक राशि कन्या से द्वि-द्वादश योग है। शनि अपने प्रबल शत्रु सूर्य की सिंह राशि में है तथा अष्टमेश षडाष्टक योग बना रहा है। पंचम भावस्थ स्त्री ग्रह बुध व शुक्र है। सप्तम भाव पर मंगल की दृष्टि है। शुक्र अपनी राशि से षडाष्टक कर रहे है। सप्तम भाव पर राहु-केतु-गुरु-मंगल का दुष्प्रभाव है।

    परिणाम-

    1. जातक को पुुत्र सन्तान का सर्वथा अभाव रहता है तथा कन्या से मानसिकता नहीं जुड़ती है।
    2. स्त्रीसुख में न्युनता तथा जातक परस्त्रीगामी हो जाये तो कोई आश्चर्य नहीं।
    3. जीवन में भारी उथल-पुथल एवं संघर्षरत रहना पड़ता है।
    4. पैतृक संपत्ति या तो दान दे देता है अथवा नष्ट हो जाती है।
    5. जीवन मे कई बार जेल-यात्रा करनी पड़ती है।
    6. गुप्तांग संबंधी रोग जीवन भर परेशान करते है।
    7. शत्रु पक्ष की प्रबलता पीड़ित करती है।
    8. अनन्त कालसर्प योग

    जब लग्न में राहु एवं सप्तम भाव में केतु हो ओर शेष ग्रह उनके मध्य अवस्थित हो तो ‘अनन्त कालसर्प योग’ होता है।

    जातक की कुण्डली में देखे, मंगल लग्नस्थ राहुयुक्त एवं चंद्र केतुयुक्त है। चंद्र व मंगल दोनों का अपनी राशि से द्वि-द्वादश है। धन भाव पर गुरु की नीच दृष्टि है एवं द्वादश भाव पर गुरु दृष्टि है। चंद्र -केतु ग्रहण योग बनाते हैं सूर्य का स्वराशि से द्वि-द्वादश योग है, वहीं शुक्र षडाष्टक करता है। पंचम भाव पर शनि की दृष्टि अपनी नीच राशि पर है। जातक प्राकृतिक लग्न, सूर्य लग्न व चंद्र्र लग्न तीनों से मंगली है। मंगल पर शनि की दृष्टि भी है। गुरु भी शनि से दृष्ट है।

    परिणाम-

    1. जातक को जीवन में मानसिक शान्ति नहीं मिल सकती है। सदैव ही अशान्त, क्षुब्ध, परेशान, अस्थिर रहेगा।
    2. जातक नीच बुद्धि, दुर्बुद्धि, कपटी, चालबाज, लुच्चा, असत्य भाषणकर्ता, प्रपंची, झूठबोला, षड्यन्त्रों में फंसने वाला होगा।
    3. जातक जीवन भर थानों, कोर्ट-कचहरियों के चक्कर काटता रहेगा।
    4. बार-बार पलट-पलट कर व्यवसाय करेगा एवं बार-बार हानि उठायेगा।
    5. जातक को अपनी पद-प्रतिष्ठा संभालने के लिए आवश्यकता से अधिक संघर्ष करना पड़ता है।
    6. गृहस्थ जीवन इनका शून्यवत् रहता है।
    7. शंखपाल काल सर्प योग

    जब राहु सुखस्थ व केतु कर्मभाव में हो और अन्यान्य ग्रह इनके मध्य हों तो ‘शंखपाल काल सर्प योग’ होता है।

    आप देखेंगे कि इसमे लग्नेश गुरु द्वादश भाव के स्वामी मंगल व केतु के साथ दशम भाव में है तथा राहु-भाग्येश सूर्य-द्वितीयेश शनि से दृष्ट है। सप्तमेश बुध द्वादश भाव में है तथा भाग्येश का अपनी राशि से षडाष्टक है। राहु-शनि अपनी शत्रु राशिस्थ है। चंद्र्र्रमा भी षडाष्टक में एवं शनि-मंगल से दृष्ट है।

    परिणाम-

    1. धन-धान्य-समृद्धि तथा चल-अचल संपत्ति में न्युनता आती है तथा पैतृक संपत्ति प्राप्ति में व्यवसाय उपस्थित होते है।
    2. भाई-बहिन-माता तथा नौकर-चाकरों से व्यवधान-परेशानी व बाधाएं आती रहती है।
    3. नौकरी एवं व्यवसाय में उतार-चढ़ाव, उत्थान-पतन का सामना करना पड़ता है।
    4. स्वास्थ्य प्रायः बिगड़ा रहता है।
    5. शिक्षा प्राप्ति में बाधाएँ आती है एवं शिक्षा पूर्ण नहीं होती है।
    6. पातक कालसर्प योग

    जब राहु दशम व केतु चतुर्थ भाव में हो एवं अन्य ग्रह इनके मध्य हों तो ‘पातक कालसर्प योग’ होता है।

    आप देखेंगे कि इनमें लाभेश शुक्र नीचाभिलाषी है तथा षष्ठेश है। धन भाव पर गुरु अर्थात् लग्नेश सुखेश की नीच दृष्टि है। शनि अपने प्रबल शत्रु अपने प्रबल शत्रु सूर्य भाग्येश के साथ सप्तम भाव में है। द्वादशेश मंगल शत्रु के साथ शनि दृष्ट है तथा बुध का दशम् भावाधिपति होकर षडाष्टक है। गुरु पाप कर्तरी योग के अन्तर्गत सूर्य-शनि-मंगल के मध्य है। चंद्रमा अष्टमेश होकर षष्ठ भाव में है।

    परिणाम-

    1. जातक का सम्पूर्ण जीवन विघ्न-बाधाग्रसित रहता है तथा नौकरी व व्यवसाय संबंधी अथक प्रयास करने पर भी सफलता नहीं मिलती है एवं भटकावपूर्ण जीवन यापन करता है।
    2. व्यापार में कदम-कदम पर मित्र धोखा देते हैं एवं जातक हानि उठाता है।
    3. सन्तान होकर भी निरन्तर रोग-ग्रस्त पीड़ित रहती है।
    4. नाना-नानी अथवा दादा-दादी का वियोग सहना पड़ता है।
    5. माता-पिता का विरहजन्य कष्ट सहन करना पड़ता है।
    6. शेषनाग कालसर्प योग

    जब राहु बारहवें एवं केतु षष्ट भाव में हो एवं अन्य सभी ग्रह इनके मध्य हो तो ‘शेष नाग फल सर्प योग’ होता है।

    देखें, राहु-चन्द्र ग्रहण योग द्वादश भाव में बना रहे हैं तथा जातक का जन्म ही साढ़े-साती मे हुआ है। शनि-चंद्र्र-राहु पर मंगल की दृष्टि है। लाभेश अपनी नीच राशि में है तथा लग्नेश गुरु का लग्न से षडाष्टक है।

    परिणाम-

    1. जातक गुप्त शत्रुओं से सदैव पीड़ित रहेगा।
    2. शरीर सुख न्युनतम रहता है तथा स्वास्थ्य प्रायः बिगड़ा रहता है।
    3. लड़ाई-झगड़े-कोर्ट-कचहरी में प्रायः जातक की हार होती है।
    4. जातक कदम-कदम पर अपनों से बदनाम होता है। पर मृत्युपरान्त इनका नाम होता है।
    5. जातक के बायीं आँख का जीवन में आॅपरेशन होता है।
    6. विषाक्त कालसर्प योग

    जब राहु एकादश भाव में व केतु पंचम भाव में हो व शेष ग्रह इनके मध्य हों तो ‘विषाक्त कालसर्प योग’ होता है।

    इस योग में देखें लग्नेश उच्च राशिस्थ होकर भी द्वादश भाव पर नीच दृष्टि है तथा लाभ भावस्थ राहु पर लाभेश अष्टम भाव में शनि के साथ है। धनेश मंगल अपनी नीचराशि में सप्तमेश होकर दशम् भाव में शनि दृष्ट है। दशमेश का सप्तमेश से परस्पर परिवर्तन है। पराक्रमेश गुरु का पराक्रम भाव से दृष्ट है।

    परिणाम-

    1. जातक अपनी आजीविका के लिए घर-परिवार से दूर रहता है।
    2. भाइयों से भरपूर विवाद, कोर्ट-कचहरी का सामना करना पड़ता है और विशेष रूप से बड़े भाई से।
    3. नेत्र रोग, हृदय रोग जैसे रोग से पीड़ित रहता है।
    4. जातक अनिद्रा जैसे रोग से पीड़ित रहता है। सब मिलाकर जातक का शरीर रोग से जर्जर हो जाता है।
    5. जीवन की इहलीला रहस्ममय तरीके से समाप्त होती है।

    कालसर्प दोष होते हुए भी किन कारणों से कालसर्प दोष का प्रभाव कम हो जाता है।

    1. जब द्वादश भाव या द्वितीय भाव में शुक्र हों।
    2. जब लग्न या केंद (4, 7, 10) में बृहस्पति हो।
    3. जब बुधादित्य हो।
    4. जब दशम मंगल हो।
    5. जब मालव्य योग अर्थात् केंद्र में स्वगृही या उच्च का शुक्र हो।
    6. जब केन्द्रस्थ स्वगृही मंगल -रुचक योग’ की सृष्टि करता हो।
    7. जब शनि उच्च राशिस्थ तुला में होकर लग्न या केन्द्र में होकर ‘शशक योग’ बना रहा हो।
    8. चंद्र$मंगल की युति केन्द्र में हो पर मंगल मेष, वृश्चिक या मकर का हो एवं चन्द्रमा उसके साथ होकर लक्ष्मी योग बनता हो।
    9. जब पंच महायोग में से कोई एक महायोग हो।
    10. जब चार ग्रहों की कहीं केन्द्र 1, 4, 7, 10 वें भाव में युति हो और उसके साथ एक ग्रह शुक्र, गुरु, शनि, मंगल, सूर्य, चंद्र में से स्वगृही अथवा उच्च राशिस्थ हो।

    यदि कालसर्प दोष की कुण्डली है एवं राहु निम्न भावों में बैठकर कालसर्प दोष की कुण्डली बनाता है, तो निम्न भावों से राहु इस प्रकार परिणाम देगा।

    राहु लग्नस्थ होने पर जातक पूर्णरूपेण दुष्ट, घोर स्वार्थी, राजद्वेषी, नीचकर्मरत, मनस्वी, कृशकाय, दुर्बल, क्षीण शरीर, कामान्ध, काम पिपासु, अल्पसन्तति युक्त, घोर साहसी, दम्भी, अपने कहे वचनों पर दृढ़ रहने वाला, स्व वचनपालक, स्वकार्य दक्ष, चतुर, बहु रोगी, धर्म रहित या अधर्मी, मित्रों से द्वेष एवं विरोध रखने वाला, वादापवाद में सदैव विजयी, स्वजनों से दूर या स्वजन वंचक, सन्तानहीन या सन्तानद्वेषी होता है तथा उसकी स्त्री को बार-बार गर्भ की क्षति होती है। वैद्य, डाॅक्टर, हकीम, देह विशेषज्ञ, संगीत प्रेमी, शरीर में वेदना का रोग, मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, मकर, राशिस्थ होने पर राज्य सेवा या नौकरी से यथोचित लाभ प्राप्त करता है। भोगी, भोगप्र्रिय, विलासी, अनुचित संबंध बनाने वाला तथा सहानुभूतिपूर्ण होता है। मेष, कर्क, सिंह राशिस्थ राहु विशेष स्वर्ण लाभ प्रदान करता है। राहु पर यदि चंद्र, बुध, गुरु, शुक्र की दृष्टि हो तो मुँह पर चिन्ह होता है तथा पांचवां वर्ष घातक होता है।

    यदि राहु धन भावस्थ है तो जातक परदेशवासी, परदेशगामी, विदेशाटन करने वाला, अति अल्प सन्तति युक्त, कुटुम्ब सुख से रहित, दुष्ट भाषा का प्रयोग करने वाला, दुष्टभाषी, अल्पधनी या निर्धन, आजीवन घोर संघर्ष करने वाला, निंदक, वंचक, निंदनीय भाषा का प्रयोग करने वाला, घुमक्कड़, भ्रमणशील जीवन यापन करने वाला, सन्तान और प्रधानतः पुत्र सन्तान से पीड़ित, चिन्तायुक्त, धन-धान्य-समृद्धि रहित, कठोर, मात्सर्ययुक्त, मांसभक्षी, मांस-मछली चर्म, नखादि क्रय-विक्रय द्वारा लाभान्वित, पाप ग्रहों के साथ राहु होने पर ओठ मे चिहृ तथा बारहवें वर्ष धन की विशेष हानि होती है, धननाश होता है। राज कोप का भाजन बनता हैै।

    तृतीय भावस्थ राहु होने पर वह जातक योगाभ्यासी, योग चर्चा में भाग लेने वाला, विवेकशील व दृढ़ विवेकी, अरिष्टनाशक, प्रवासी, परदेशगामी, धन-धान्य-ऐश्वर्य सम्पन्न, विद्वान एवं विद्वानों का संग करने वाला, अवसरवादी एवं अवसर का लाभ उठाने वाला, व्यवसाय प्रेमी, यशस्वी पराक्रमी, दृढ़ मतावलंबी, ऐश्वर्यशाली, सुख-सुविधा संपन्न, साहसी, बहुशत्रु युक्त या शत्रु पालक, पर सदैव शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। वह कान की पीड़ा से परेशान होता है। समय से पूर्व स्मरण-शक्ति क्षीण हो जाती है। याददास्त कमजोर हो जाती है। ऐसे जातक के भाइयों व शत्रुओं की मृत्यु होती है। प्रायः वह भ्रातु-सुखहीन होता है। शुभ ग्रह से युक्त होने पर कण्ठ मे चिन्ह होता हैै। 12-13 वर्ष मे भातृ-सुख विशेष होता हैै।

    सुख भावस्थ राहु होने पर जातक असन्तुष्ट रहता है। प्रायः दुखी होता है। माता के कष्ट या माँ को कष्ट होता है। जातक क्रूर, दंभी, पेट दर्द या उदर व्याधि युक्त होता है। झूठा, प्रपंची, आडम्बरी, मिथ्या भाषण करने वाला, मित्र, दोस्त, पुत्र एवं आत्मीय जनों के सुख से रहित होता है। ऐसे जातक के या तो माताएँ होती हैं अथवा दो स्त्रियाँ होती है। वस्त्राभूषण युक्त, नौकरी-चाकरों के सुविधा से वह सम्पन्न होता है। 1/2/4 अर्थात् मेष, वृष, कर्क राशिस्थ होने पर बंधुसुख होता है। ऐसा न होने पर वह बंधु जनों से पीड़ित होता है। पाप ग्रहों का साथ होने पर माता को कष्ट अवश्य पहुंचाता है। चतुर्थ राहु होने पर 8 वे वर्ष भाई को हानि पहुंचना अवश्यंभावी है।

    पंचम भावस्थ राहु होने पर जातक मंद बुद्धि, अल्पज्ञ, धन-धान्य संपत्ति रहित, निर्धन, अल्पायु में ही उसे सन्तान की प्राप्ति होती है। जातक संचित सम्पत्ति व पैतृक सम्पत्ति का नाश करता है तथा कुलनाशक होता है। सन्तान का या तो अभाव होता है अथवा सन्तान की बार-बार हानि होती है। जातक नीच कर्म करने वाला, कुमार्गी, महा आवेशी व क्रोधी, मित्ररहित होता है। वह कुटिल चाल चलने वाला षड़यन्त्रकारी, मतिभ्रम, दुर्बुद्धि? कुटिल, भ्र्रान्त चित्त, वायु रोग पीड़ित, उदर शूल रोग, राज कोप से बार-बार दण्डित होता है। वह अत्याचारी अपनों का अहित करने वाला, पर भाग्यशाली, श्रेष्ठ कार्यकर्ता, परिश्रमी, शास्त्रज्ञ व शास्त्रप्रेमी, नाग देव, नाग पूजा व विष्णु पूजा द्वारा इन्हें संतान विशेषकर पुत्र की प्राप्ति होती है। कर्क राशिस्थ राहु पंचम होने पर पुत्र प्राप्ति व सुख संभव है। ऐसा न होने पर दीन-हीन, निर्धन, मलिनपुत्र उत्पन्न कर पीड़ित होता है। सिंहस्थ राहु मंे यदा-कदा पुत्र देखने में आता है। पंचम भावस्थ राहु 5 वें वर्ष बंधु हानि देता है।

    रोग-शत्रु भावस्थ अर्थात् षष्ठ भाव में राहु विधर्मियों के द्वारा जातक को लाभ प्रदान करता है। जातक सबल, स्वथ्य निरोग होकर शत्रुहन्ता होता है। शत्रु इनके सामने टिक नहीं सकता। वह कमर के दर्द से प्रायः सदैव पीड़ित रहता है। अरिष्टों का नाश करने वाला, पराक्रमी, गंभीर, सर्वथा हर प्रकार से सुखी, ऐश्वर्य संपन्न, विद्वान् तथा बली नीच जन, म्लेच्छ, नीचकर्मी लोगों से प्रभुता प्राप्त करता है। जातक अपने जीवन में कई एक बड़े-बडे़ कार्य सम्पन्न करता है। राजवत् प्रतिष्ठित और शत्रु पर अनायास ही विजय प्राप्त करता है और धनार्जन करता है। ऐसा जातक स्त्री सुखरहित या स्त्रीहीन, पशु भय से ग्रस्त, चचेरे या फूफेरे भाइयों का सुख पाने वाला। चन्द्रमा से युक्त ऐसे राहु में राजरानी से भोग करने वाला, चोर धनहीन होता है। 21 व 37 वें वर्ष कलह व शत्रुभय से भारी पीड़ा प्राप्त करता है।

    सप्तम भावस्थ राहु करने पर जातक स्त्री नाशक तथा व्यापार में वह निरन्तर व बार-बार हानि उठाता है। जातक भ्रमणशील जीवन व्यतीत करता है। वह वात रोड़ पीड़ित, दुष्कर्मी स्वकार्य चतुर, लोभी, कृपण तथा जननेन्द्रिय रोग से पीड़ित होता है। प्रमेह, सुजाक, गुप्तरोग उसे पीड़ित करते है। अपने जीवन में वह विधवा स्त्री से संसर्ग जोड़ता है। विवाह के समय उसकी स्त्री रोगग्रसित, रोगपीड़ित होती है। द्विभार्या योग होता है तथा प्रथम स्त्री को रक्त संबंधित रोग पीड़ित करता है तथा दूसरी स्त्री से यकृत विकार होता है। स्त्री वंचक व कलहप्रिय होती है। क्रोधी, दंभी, मनमानी करनेवाली स्त्री सदैव विवादों में घिरी रहती है। वह प्रचण्ड रूपा, अपव्ययी, खर्चालु स्वभाववाली होती हैै तथा पति-पत्नी में सदैव वादापवाद होता ही रहता है। पापयुक्त राहु स्त्री कुटिला, पापिनी, दुःशीला, गण्डमाक रोग से पीड़ित द्विभार्या का संयोग होता है। परन्तु शुभ ग्रह युक्त होने पर पूर्वोक्त दोष नहीं होते है। द्विभार्या योग भी कम देखने में आता है। 30 वें वर्ष में स्त्री मे भारी दैहिक कष्ट होता है।

    अष्टम भावस्थ राहु शारीरिक दृष्टि से जातक को हृष्ट-पुष्ट, स्वस्थ, निरोग तथा पुष्ट देह रखता है। जातक गुप्त रोगी, क्रोधी, व्यर्थ भाषी, वाचाल पर मूर्ख उदर व्याधि युक्त, काम पीड़ित, झगडालू, पापी, गुदा, प्रमेह अण्डकोष वृद्धि, अर्श रोग से पीड़ित रहता है। 32 वां जीवन आशा क्षीण करता है। शुभ युक्त राहु होने पर 25 वें वर्ष जीवन आशा की आशंका रहता है। बलवान् ग्रह के साथ अष्टमेश होने पर 60वें वर्ष मृत्यु भय या मृत्युतुल्य कष्ट होता है।

    नवम अर्थात् भाग्य भाव में राहु होने पर जातक धर्मात्मा परन्तु दुर्बुद्धि, नीच, धर्मानुरानी, पवित्रता रहित, धर्म-कर्म से रहित, मंद-बुद्धि, दुर्बुद्धि, अल्प सुखभोगी होता है। भ्रमणशील, दरिद्र तथा बंधु जन रहित होकर जीवन-यापन करता है। इनकी स्त्री निःसन्तान होती है। अनुदार। अधार्मिक धर्म-कर्म रहित होती है। 19 व 29 वें वर्ष ऐसा राहु पिता के लिए भारी अरिष्टकारक होता है अर्थात् पिता को कष्ट पहंुचाता है। जातक प्रवासी, आंत्ररोगी, व्यर्थ का परिश्रम करने वाला होता है तथा भाग्यहीन होता है।

    दशम भावस्थ राहु होने पर जातक महा आलसी, कामचोर, बहुभाषी अर्थात् वाचाल, नियमित कार्य न करने वाला अर्थात् अनियमित कार्यकर्ता, विश्रृंखलित जीवन, लोभी, कृपण, मितव्ययी, अर्थ को प्रधानता देने वाला, संतान के लिए कष्टकारक होता है। जातक विद्वान, शुरवीर, धन-धान्य-ऐश्वर्य संपन्न, धनी पर रोगी, वात-पीड़ित, शत्रुओं का बल नष्ट करने वाला, मन्त्री या दण्डाधिकारी, न्यायाधीश, पुर या ग्राम समूह का नेता या नायक, काव्य-नाटक-छन्द शास्त्र का ज्ञाता, रसिक शिरोमणि, घुमक्कड़, भ्रमणशील, पर पितृ सुख से रहित, वस्त्र व्यवसाय में दक्ष, निर्माता होता है। ऐसा मीन राशिस्थ राहु गृहादि सुख युक्त, काव्य विनोदी, शास्त्रज्ञ होता है। 54 वें वर्ष में शस्त्र या शत्रु द्वारा उसके जीवन मंे भारी संकट उपस्थित होता है। 1/2/3/4/5/6/10/12 राशिस्थ अर्थात् मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, मकर, मीनस्थ राहु प्रायः शुभ फल प्रदान करता है। बलवान् शत्रु से कलह उत्पन्न होता है। चन्द्र-राहु मिलकर उत्तम राजयोग होता है।

    ग्यारहवें भाव में राहु थोड़ा-थोड़ा न्युनाधिक लाभ प्रदान करता है। स्वकार्य में उसे सफलता प्राप्त होती है कि वह स्वकार्य दक्ष होता है। धन-धान्य-सुख-सम्पन्नता युक्त एवं राजद्वार से धन एवं पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। वास्त्राभूषण, अन्न-धन-लक्ष्मी-भृत्यादि का जीवन में सुख प्राप्त करता है। पशु-वाहन सुख से युक्त एवं युद्ध में, विवाद में, कोर्ट-कचहरी के कार्यो में उन्हें प्रायः विजयश्री प्राप्त होती है। अच्छी-भली संतान से युक्त, म्लेच्छ शासक के द्वारा वह बार-बार सम्मानित होता है। 45 वे वर्ष में पुत्र तथा धन का अतुल सुख होता है। मन्दगति, लाभहीन, घोर परिश्रमी, अरष्टिनाशक, सन्तान के कष्ट तथा व्यवसाय में सफल होता है।

    द्वादश भावस्थ राहु जातक को नीच वृत्ति, कपटी, दुराचारी, कृतघ्न तथा घमण्डी, दम्भी, लोभी, कृपण, नेत्र पीड़ित, चर्मरोग पीड़ित, कोढ़ी, प्रवासी, घर-परिवार से दूर ले जाता है। उसके पैर में चोट लगती है तथा पत्नी सदैव चिन्तातुर रहती है। न्युनतम सन्तान तथा 45 वें वर्ष में स्त्री को भारी दैहिक पीड़ा होती है। जातक मति मंद, मूर्ख, मेहनती, परिश्रमी, सेवक निरन्तर चिन्ता करने वाला और काम पीड़ित होता है।

    राहु-राशि-फल

    मेष- पराक्रम हीन, आलसी, अविवेकी, अतिचारी, शिरपीड़ा युक्त, कामाग्नि पीड़ित विवाद में विजयी, दीर्घ रोगी।

    वृष- सुखी, चंचल, धन-धान्य संपन्न-कपट-शूरवीर, वाचाल, धन-नाशक, दरिद्र, मित्रों की बात न मानने वाला

    मिथुन- योगाभ्यासी, गायक, बलवान, दीर्घायु, बाहुबली, प्रतापी, विश्वबंधु, बुद्धि चातुर्य युक्त, विवेकी।

    कर्क- उदर रोगी, धनहीन, कपटी, पराजित, मित्रों से सुखी, स्त्री प्राप्ति, माता-पिता का क्लेश, शीत-वात-विकार।

    सिंह- चतुर, नीतिज्ञ, सत्पुरुष, विचारक, सन्तान की चिन्ता अधिक, राजदण्ड, भय भूख से मृत्यु, कुक्षि पीड़ा।

    कन्या- लोकप्रिय, मधुर भाषी, कवि, लेखक, गायक, कोई बुद्धि-बल से हीन शत्रु या रोग का विनाश।

    तुला- अल्पायु, दन्त रोगी, अल्प धनाधिकारी, कार्य कुशल, स्त्री की हानि, अग्नि या वायु से कष्ट, सन्तप्त।

    वृश्चिक- धूर्त, निर्धन, रोगी, धन नाशक, राज्य या विद्वानों से सम्मानित, धनी लोक विरोधी-ग्रन्थि रोग से पीड़ित।

    धनु- बाल्यावस्था में सुखी, दत्तक जाने वाला, मित्र द्रोही, दृढ़ संकल्पी, व्रतग्राही बंधुओं पर अति स्नेही।

    मकर- मित्र द्रोही, मितव्ययी, कृृपण कुटुम्ब रहित, धन-मान, प्रताप, सुखादि की क्षीणता, जलभय।

    कुंभ- मितव्ययी, कुटुम्ब रहित, दन्त रोगी, विद्वान, लेखक, उपदेश से कल्याण, परदेश में प्रतिष्ठा, शत्रु नाश।

    मीन- आस्तिक, कुलीन, शान्त, कला प्र्रेमी, दक्ष, धन संचय में विघ्न, उच्च स्थान से गिरने का भय, भ्रमण मंे असफलता।

    राहु-दृष्टि-फल

    यदि लग्न पर राहु की दृष्टि हो तो जातक शरीर सुख रहित, सदैव रोगी और चेचक आदि द्वारा मुंह पर चिन्ह होते है।

    द्वितीय भाव पर दृष्टि हो तो कौटुम्बिक कष्ट 8 या 14 वर्ष मे जलभय तथा पापावादी से मृत्यु तुल्य कष्ट होता है।

    तृतीय भाव पर राहु की दृष्टि होने पर पराक्रम द्वारा धन लाभ सफलता, धन से सुखी, पुत्र को कष्ट, चोर -अग्नि-सर्प-राज्यादि से भय होता है। भाई के द्वारा सुख हानि अथवा सहोदरों को कष्ट होता है।

    चतुर्थ भाव पर यदि दृष्टि हो तो माता को कष्ट, पुण्य भाव का उदय, म्लेच्छ जन द्वारा भाग्योदय, सर्वत्र विजय, कुक्षि या उदर मंे दारुण दुःख और भाई या मित्र को पीड़ा होती है।

    पंचम भाव पर राहु की दृष्टि का अर्थ है, सन्तान को कष्ट, अल्प भाग्य युक्त कभी राज्य पक्ष द्वारा विजयी, श्रम करने पर भी विद्या निष्फल या अल्प विद्या-मंदबुद्धि, स्मरण शक्ति रहित और जीवन भटकाव पूर्ण व्यतीत करता है।

    षष्ठ भाव पर राहु की दृष्टि का अर्थ है शत्रु का नाश, दुष्ट ग्रह के साथ होने पर धन का हानि, दुष्टों द्वारा धन की क्षति, गुणी, विनम्र बल और वीर्य की हानि होती है।

    सप्तम भाव पर राहु की दृष्टि होने से भोग में अधिक रूचि, कामदेव की जागृति अधिक, स्व वचनों का सिद्ध करने वाला, हठी, निडर, जिद्दी तथा इसकी दशा में स्त्री की मृत्यु अथवा स्वयं को दैहिक कष्ट होता है।

    नवम भाव पर दृष्टि होने से नव वधु का भोगी, भाइयों द्वारा कष्ट, पुत्र धन से सुखी होता है। मित्र पीड़ा, म्लेच्छ शासक द्वारा उन्नत्ति व विजय पाता है।

    दशम भाव पर राहु की दृष्टि होने पर कार्य में सफलता, बाल्यावस्था में पिता की मृत्यु, माता को थोड़ा-सा सुख प्राप्त होता है।, किसी-किसी की माता दीर्घायु पाने वाली और कार्य व्यवसाय में जातक हानि उठाता है।

    लाभ भाव पर राहु की दृष्टि पूर्णायु, धन-धान्य से संपन्नता, राज्य से लाभ व सुख और उन्नति के लिए सतत क्रियाशील रहता है।

    व्यय भाव पर राहु की दृष्टि जातक को कृपण, दान-पुण्य रहित, युद्ध में शत्रु का विनाशक, विफलता युक्त पर कोई-कोई सुखी भी होता है। कामी, वधिर तथा कुल का नाशक होता हैै।

    कालसर्प दोष की कुण्डलीयों में केतु का भाव अनुसार प्रभावः

    लग्न भाव में केतु होने पर जातक दुर्बल शरीर-कृश काय, कमर में पीड़ा रहती है। जातक वात रोग से पीड़ित, उद्विग्न चित्त, खिन्न, उदार, परेशान, स्त्री चिन्ता से पीड़ित, झूठा, प्रपंची, दम्भी, मिथ्याभाषी तथा चंचल एवं भीरु हृदय, दुराचारी, महामूर्ख, अनेक शत्रुओं से पीड़ित होता है। उसके हाथों-पांवों से पसीना खूब निकलता है। केतु पर किसी शुभ या पाप ग्रह की दृष्टि हो तो मुंह पर या मुँह में चिन्ह होता है। 5 वां वर्ष उसके जीवन में महा कष्टप्रद कष्टकारक होता है। कार्य में निरन्तर असफलता व हानि होती है। शरीर कष्ट एवं मध्यायु में मृत्यु तुल्य कष्ट होता है। परन्तु वृश्चिक राशि में केतु हो तो वह सुखकारक होता है।

    द्वितीय भाव में केतु होने पर जातक दुष्टात्मा, अशोभनीय-अशुभ कर्म में तत्पर, कुटुम्ब का विरोधी, मुख रोग से सर्वदा पीड़ित, नीच-दुष्ट दुर्बु़िद्ध लोगों का साथ करने वाला, जाति, धर्म, स्वजन, आत्मीय जनों या सभी लोगों का विरोधी, स्पष्ट वक्ता, राज पक्ष से सदैव भय खाने वाला, विरोधी लोगों का घृणापात्र, राजकोष से धन- ध्यान- ऐश्वर्य-संपत्ति की क्षति उठाने वाला होता है। यदि केतु स्वगृही सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु 5/6/8/9 राशि गत हो अथवा शुभ ग्रह की राशि में हो तो सुख-सम्पन्नता युक्त होता है। परन्तु 12 वें वर्ष में भारी धन की हानि उसे उठानी पड़ती है।

    केतु यदि तृतीय भाव में हो तो भातृभाव, पराक्रम भाव में हो तो महा तेजस्वी, उसे बहनोई की सदैव चिन्ता लगी रहती है। जातक भोगी धन-धान्य-ऐश्वर्य सम्पन्न बलवान्, स्थिर चित्त वृत्ति रहित, चपल, चंचल, वात रोगी, रूक-रूककर बोलने वाला, व्यर्थ के प्रपंचों व वादापवाद में उलझनेवाला, भूत-प्रेत से भय खाने वाला, सर्व जन प्रिय पर मानसिक रूप से चिन्तातुर होता है। उसे भाईयों के सुख का अभाव रहता है। बहिन का भरपूर सुख प्राप्त होता है। परन्तु परिस्थितिजन्य दोष के कारण सदैव उदासीन वृत्ति अपनाए रहता है। शुभ ग्रह या ग्रहों के साथ होने पर कण्ठ में चिन्ह होता है। 12-13 वर्ष में भाई का सुख होता है। चन्द्रमा के साथ होने पर दो भाइयों का सुख होता है। अन्य भाइयों की मृत्यु हो जाती है। 36 वें वर्ष में भाइयों को कष्ट होता है। लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

    केतु यदि चतुर्थ भाव में हो तो जातक को माँ का सुख प्राप्त नहीं होता हैं। उसका कोई मित्र नहीं होता। यदि मित्र हो तो भी मित्रों से दुखी होता है। पिता के लिए सर्वथा कष्टकारक, भातृरहित तथा चलायमान मनोवृत्ति रहती है। जातक वाचाल, बहुभाषी व कार्यहीन, कार्य के प्रति निरुत्साही बना रहता है। कलहप्रिय तथा ब्राह्मण वर्ग द्वारा कष्ट पहुंचता है। उसके भाई रोगी तथा क्षीण काय व दुर्बल होते है। सिंह और वृश्चिक राशिस्थ केतु हो तो माता-पिता और मित्रों से सुख प्राप्त होता है। परन्तु यह सुख अल्प अवधि तक रहता है। धनु राशि का केतु हो तो मिश्रित फल की प्राप्ति होती है। पाप ग्रहों से युक्त केतु माता के लिए कष्टप्रद रहता है। सुख देता है शुभ ग्रह युक्त केतु 1/8 वें वर्ष में भाई को कष्ट संभव है।

    पंचम भावस्थ केतु कुबुद्धि, कुचाली, वाचाल, धूर्त, चालबाज, षड्यन्त्रकारी, वातरोगी तथा विदेशगामी बनाता है। ऐसा जातक सुखी, बलवान, बन्धुजनों से पे्रम करने वाला होता है। वह वीर होकर भी दासवृत्ति को अपनाता है। अति अल्प सन्तान युक्त तथा ज्येष्ठ सन्तान अर्थात् प्रथम संतान कन्या होती है। जातक बुद्धि, ज्ञान, विद्या रहित होता है। ऊपर से गिरने या किसी पदार्थ के आघात से उदर पीड़ा जरूर होती है। केतु यदि पाप ग्रहों के साथ हो तो माँ को निश्यच ही कष्ट होता है। शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट होने पर माता का सुख भरपूर होता है। 5 वे वर्ष ऐसे जातक को भाई का वियोग सहन करना पड़ता है।

    केतु के षष्ठ रितु भाव होने पर वात रोगी, वात विकार, तथा जातक झगड़ालू, क्रोधी, आवेशी, भूत- प्रेत-पिशाचजनित कष्ट से पीड़ित व रोगी होता है। जातक कृपण, मितव्ययी, धन संग्रह करने वाला, सुखी अरिष्ट निवारक, निरोग, स्वस्थ, व्याधिरहित होता है। पशुपालक, पशु सुख युक्त, धन-धान्य-ऐश्वर्य संपन्न। स्वजाति में अगुवा व मुखिया, वाचाल, स्त्रीप्रिय, शत्रुनाशक, पर ननिहाल, मामा, मातृ पक्ष से अपमानित होता है। चंद्रमा से युक्त केतु होने पर राजपत्नी, कुलीन स्त्री से संसर्ग करता है। मानरहित व चोर वृत्ति उसकी अवश्य होती है। 21 व 36वें वर्ष मे कलह एवं शत्रु भय उसे अवश्य होता है।

    अष्टम भाव में केतु के रहने पर जातक मंदमति, दुर्बुद्धि युक्त, मूर्ख, शत्रु से भय खाने वाला, भीरु हृदय, सुख-शान्ति रहित तथा शत्रुओं के द्वारा उसके धन की हानि होती है। पत्नी को पीड़ा व नीच या विधवा या क्रोधी स्त्री के संसर्ग करता है। जलघात, जलभय व गुप्त रूप से वह पाप कर्म करता है। जातक निरन्तर भटकाव पूर्ण जीवन-यापन करता रहता है।

    वृश्चिक राशि में ऐसा केतु लाभान्वित करता है। स्त्री चिन्ता से पीड़ित, व्याकुलता व द्विभार्या योग घटित होता है। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरी स्त्री हो गुल्म रोग होता है। पाप ग्रहों के साथ होने पर स्त्री को गण्डगाल रोग व्याप्त होता है। शुभ ग्रह के साथ केतु होने पर एक ही स्त्री होती है। 38 वें वर्ष में स्त्री को कष्ट होता है। जातक मूत्राशय रोग पीड़ित तथा वीर्यनाश से शरीर क्षीण हो जाता है।

    अष्टम रन्ध्र भाव में केतु होने पर दुर्बुद्धि, तेजरहित और दुष्ट जनों का साथ करने वाला होता है। जातक स्त्री द्वेषी, चालाक, गुदा रोग, मस्सा जैसे अर्स रोग से दुखी होता है। नेत्र रोग पीड़ा देता है तथा बार-बार वाहन से चोट लगती है। धन-सम्पत्ति का नाश करता है। कारण-अकारण ही लोगों की नजर में धृणा का पात्र होता है। स्त्री व सन्तान रोगग्रस्त रहती है। अर्थात मेष, वृष, मिथुन, कन्या, वृश्चिक, धनु राशि में होने पर धन का लाभ होता है तथा शुभ ग्रह युक्त होने पर 25 वें वर्ष अरिष्ट फल की प्राप्ति होती है। रन्धे्रश अर्थात् उच्च राशिस्थ या बलवान् ग्रह युक्त होने पर 60 वर्ष की आयु होती है।

    नवम भावस्थ केतु जातक सुखाभिलाषी होता है। इतने पर भी वह व्यर्थ परिश्रम कर शक्ति का हनन करता है अपयश का भागी होता है। बचपन में पिता को व्याधि होती है। समाज में उपहार का पात्र बनकर जीता है। दान-पुण्य, धर्म-कर्म, धार्मिक-पुण्य कार्यों से रहित वह धर्म भ्रष्ट होता है। पुत्र एवं भाइयों की चिन्ता निरन्तर बनी रहती है। बाहु रोग परन्तु कष्ट रहित एवं साधारण कष्ट का भोग करता है। अच्छी मस्तिष्क शक्ति, म्लेच्छ जाति द्वारा जातक भाग्य वृद्धि को प्राप्त करता है। 37 वें वर्ष में पिता को क्लेश-कष्ट होता है।

    दशम भावस्थ केतु के रहने पर जातक पिता से द्वेेष रखने वाला, दुर्भाग्य को प्राप्त तथा मूर्ख, व्यर्थ परिश्रम कर शक्ति क्षीण करने वाला, घोर दर्प, अभिमानी परस्त्रीगामी, दुराचारी, नीच कर्म करने वाला, माता को कष्ट, नेत्र का रोगी तथा राजकोष से पीड़ित होता है। कफ प्रकृति युक्त, रोग तथा उन्हें पितृ सुख का सर्वथा अभाव रहता है। कन्या राशिस्थ केतु में अधिक कष्ट होता है। पिता के दुःख व दुर्भाग्य का कारक बनता है। 1/2/8 राशिस्थ केतु से शत्रुओें का नाश होता है। आशाएं पूर्ण होती है। जातक सुखी व ईश्वर भक्त तथा शुभ ग्रह युक्त होने से सुन्दर स्थान में वास करने वाला, काव्य प्रेमी 45 वें वर्ष शत्रु या शस्त्र का भय होता है।

    एकादश भावस्थ केतु जातक को बृद्धिहीन बनाता है। वह स्वयं अपनी आप हानि करता है वातरोगी, अरिष्टनाशक, मधुरभाषी, विद्वान, दर्शनीय, सुन्दर स्वरूप वाला, भोगी, महातेजस्वी, उत्तम वस्त्राभूषण, सुख युक्त धन-धान्य सम्पन्न, पुत्र सुख रहित, बुरे कुुटुम्ब वाला, गुह्य रोग पीड़ित होता है। ऐसा केतु प्रायः 45 वें वर्ष में धन-पुत्रादि का खूब सुख देता है।

    व्यय भावस्थ केतु अपव्ययी, खर्चीला स्वभाव, चिंतातुर, सनकी, परदेशवासी बनाता है। शत्रुओं पर सदैव विजय प्राप्त करता है । पैर, नेत्र, वस्तिभाग व गुदा रोग से पीड़ित होता है। जातक मोक्षाधिकारी होता है। 45 वें वर्ष स्त्री को पीड़ा होती है। चंचल बुद्धि, धूर्त, ठग, अविश्वासी तथा भूत-प्रेत कार्य द्वारा जनता को ठगने वाला होता है।

    केतु-राशि-फल

    मेष- चचंल, बहुभाषी, सुखी, कष्ट सहिष्णु, कठोर, रोगी, भोग-भीरु, व्याकुल, स्त्री चिन्ता ग्रसित, मामा को कष्ट

    वृष- दुखी, निरुद्यमी, आलसी, वाचाल, धन-संपत्ति की हानि, कुटूम्ब विरोध, राज्य लाभ में बाधक।

    मिथुन- वात विकारी रोग, अल्प सन्तोषी, दम्भी, अल्पायु, क्रोधी, शत्रुहन्ता, विवादी, वक्ता, भाषणकर्ता, भयभीत, व्याकुल।

    कर्क- वात रोग पीड़ित, भूत-प्रेत पीड़ित, माता को कष्ट, धार्मिक क्षति, मित्र या पिता को कष्ट, अस्थिर गति।

    सिंह- बहुभाषी, डरपोक, असहिष्णु, सर्पदश का भय, कलाविद्-कला विज्ञ, उदर में वायु विकार, चोट लगने का भय, विपरीत बुद्धि।

    कन्या- मन्दाग्नि, निरन्तर व सदैव रोगी, मूर्ख, व्यर्थवादी, शत्रुनाश, मातृ सुख से अपमान, गुदा व नेत्र रोग पीड़ित, पशु सुख।

    तुला- कुष्ठ रोगी, दाद-खाज-खुजली से पीड़ित, कामी, क्रोधी, दुखी, मार्ग में क्लेश, स्त्री संबंध में व्याकुलता, चोर भय।

    वृश्चिक- क्रोधी, कुष्ठ रोगी, वाचाल, राजप्रिय, धनोपार्जन में बाधक, कोई-कोई धनी, सन्तान से पूर्ण सुखी।

    धनु- मिथ्यावादी, चंचल, धूर्त, धर्मनाश तीर्थाटन प्रेमी, म्लेच्छ जन से लाभ, बाहु रोग, दान कार्य में निंदा।

    मकर- प्रवासी, घोर परिश्रमी, तेजस्वी, पराक्रमी, पिता को कष्ट, माता का नाश, वाहन से जंघा में चोट।

    कुंभ- कर्ण रोगी, दुखी, भ्रमणशील, अपव्ययी, धनी, भ्रमणकुशल, विद्वान, दर्शनीय, तेजस्वी, उदर रोगी।

    मीन- कर्ण रोगी, प्रवासी, चंचल, कार्यपरायण, संुदर नेत्र, शिक्षित, उत्तम कार्य में व्यय, शत्रुनाश, गुप्तांग रोगी।

    कालसर्प दोष शान्ति हेतु एवं राहु -केतु की शान्ति हेतु इन आदतों को अपने जीवन में अपनायें

    1. किसी भी रविवार को संध्या काल में भैरूजी के मन्दिर जाकर भैरूजी को शराब चढ़ायें।
    2. गरीबों, कुष्ठ रोगियों, रेलवे स्टेशन के आस-पास बैठे भिखारियों को रोटी, बिस्किट या आटे से बनी चीजें दान करें।
    3. दुर्गा के दर्शन कर लाल फूल चढ़ायें।
    4. ऊँ रा राहवे नमः का जाप करें।
    5. यदि आपको राहु की दशा चल रही है एवं आपकी कुण्डली में कालसर्प दोष है तो आपको तुला दान करना चाहिए।
    6. जिस भी शिव मन्दिर में शिवलिंग पर सर्प न चढ़ा हो, उस पर सर्प बनावाकर भेंट करे या चढ़ाये।

    तुला दान किस प्रकार होता है।

    अपने वजन के बराबर गेहूँ तोल कर कुष्ठ रोगियों को दान दे।

    केतु की शान्ति हेतु उपाय

    1. काले कुत्ते को रोटी दान दे।
    2. शिव मन्दिर की ध्वजा बदले।

    यदि आपको ऐसा आभास होता है कि आप किसी रोग से ग्रस्त है एवं विभिन्न जाँचों के बाद भी बीमारी पकड़ में नहीं आ रही हो, तो भैरव मन्दिर में शराब चढ़ा कर रोग मुक्ति हेतु या रोग कारण हेतु प्रार्थना करें। अवश्य लाभ होगा।

    कालसर्प दोष निवारण के उपाय

    मानव की जन्मकुंडली में कालसर्प योग (राहु-केतु अन्तर्गत सब ग्रहों का आना) के कारण उसके जीवन में कई बाधाएं उत्पन्न होती है, जैसे कि शादी, संतान में विलंब, विद्याभ्यास मे विक्षेप, दाम्पत्य जीवन में असंतोष, मानसिक अंशांति, स्वास्थ्य हानि, धनाभाव एवं प्रगति में रुकावट आदि।

    इन सबके निवारण हेतु ‘कालसर्प योग’ की श्रद्धा-भक्ति के साथ विधिवत् शांति करनी अति आवश्यक है। इस शांति द्वारा सम्पूर्ण फल-प्राप्ति के साथ जातक कई सुखों का उपभोग कर सकता है।

    ऐसे तो इस शांतिकर्म में किसी भी एक ही धातु से निर्मित ग्यारह नागमूर्तियों की आवश्यकता होती है, पर इन ग्यारह मूर्तियों में नौ मूर्तियां तांबे से बनी हुई हों और अन्य दो मूर्तियां स्वर्ण या चांदी और सीसे या लोहे की बनी हुई हो तो काम चल सकता है।

    यदि ग्यारह मूर्तिया एक ही धातु से बनी हुई उपलब्ध न हों तो सिर्फ तीन मूर्तियां ही बनवा लें (तांबा, चांदी, सुवर्ण सीसा या लोहा) बाकी की आठ मूर्तियों के स्थान पर प्रतीकात्मकरूप सुपारी कर भी शांति विधानकर्म किया जा सकता है।

    यह कालसर्प योग-शांतिकर्म जहां पर उल्लिखित विधि-विधान के अतिरिक्त भी अन्य कई प्रकारों से किया जा सकता है। जैसेः

    1. मोर या गरुड़ का चित्र बनाकर उस चित्र पर नाग विषहरण मंत्र लिखें और उस मंत्र के दस हजार जप कर दशांश होम के साथ ब्राह्मणांे को खीर का भोजन कराएं।
    2. पत्थर की नाग की प्रतिमा बनवा कर उसकी मंदिर हेतु प्रतिष्ठा कर नागमंदिर बनावें।
    3. कार्तिक या चैत्रमास में सर्पबलि कराने से भी कालसर्प योग-दोष निवारण होता है।
    4. अपने नाप का कहीं पर मरा हुआ सर्प मिल जाय तो उसका शुद्ध घी के द्वारा अग्नि संस्कार कर तीन दिन तक सूतक पालें और उसके बाद सर्प बनवा कर दान करें।
    5. एक साल तक गेहूं या उड़द के आटे की सर्पमूर्ति बनाकर पूजन करने के बाद नदी में छोड़ दें और एक साल बाद नाग बना कर दान करें।

    6़. नागपंचमी के दिन सर्पाकार सब्जियां खुद न खाकर, न काट कर बल्कि उनका दान दें और अपने वजन के हिसाब से गायों को घास खिलाकर शिवलिंग की पूजा करें और अपने घर में दीवार पर नौ नाग का सचित्र नागमंडल बनाकर नित्य धूप-दीप के साथ अनंत चतुर्दशी से लेकर पितृश्राद्ध पर्यन्त खीर-नैवेद्य के साथ पूजा के बाद अपनी अनुकूलता के अनुसार कालसर्प दोष की पूजा कराएं।

    इस शांतिकर्म में गौमुख-प्रसव के बाद प्रधान संकल्पानुसार पंचांग कर्म, विशेष देव-मंडल क्रमानुसार देवस्थान, प्रतिष्ठा पूजन आदि कर्म का प्रारंभ करें।

    1. मध्य में मृत्युजंय (महारुद्र्र) स्थापन हेतु लिंगताभद्र।
    2. शेषादि नौ नाग स्थापन हेतु चावलों का अष्टदलात्मक नागमंडल।
    3. ईशान कोण में मनसादेवी की स्थापना।
    4. शेषनाग के दक्षिण (वायु कोना) में काले वस्त्र पर कृष्णपात्र (काली मटकी) समन्वित काले तिलों का राहु स्थापना।
    5. शेषनाग के वामभाग (नैर्ऋत्य कोना) में केतु-स्थापना।

    अब यहाँ पर उल्लखित क्रमानुसार प्रथम महारुद्र की षोडशोपचारी विधिवत् पूजा कर उस शांतिकर्म संलग्न शेषादि नौ नाग, दक्षिणवाम राहु-केतु एवं मनसादेवी की स्थापन, प्रतिष्ठा पूजन आदि कर्म करें। तक्षकादि सहित शेषराज की निम्न क्रमानुसार स्थापना करें।

    नागमंडल (अष्टदल) के मध्य में तीन नाग मूर्तियां शेष के रूप में।

    1. पूर्व-तक्षक, 2. अग्नि-वासुकी, 3. दक्षिण-कर्कोटक, 4. नैर्ऋत्यअनन्त, 5. पश्चिम-शंखपाल, 6. वायु-महापद्य, 7. उत्तर-नील एवं ईशान में, 8. कम्बल। उक्त नागदेवताओं की स्थापना के बाद पंचभूः संस्कारपूर्वक वहिस्थापन, ग्रहस्थापन तदन्तर ग्रहहोम एवं स्थापन क्रमानुसारेण स्थापित देवताओं का प्रधान होम कर शेषकार्य विधिवत् सम्पन्न कर पूर्णाहुति के बाद स्थापित कलशों के जल से यजमान दम्पति पर सर्पो के साथ (पुत्र या पुत्री की शांति हो तो उसके साथ भी) अभिषेक करें।

    नैवेद्य में नौ खण्डा

    कालसर्प दोष भ्रांतियाँ और वास्तविकता निवारण के मार्ग

    आलेख: राजेश श्रीमाली

     

    आप जब भी किसी ज्योतिषी से मिलते हो और आपकों यह पता चलता है, कि आपकी कुण्डली में कालसर्प दोष है और ज्योतिषी आपको कहता है कि इस कालसर्प दोष की वजह से ही आपके जीवन में ये कठिनाईयां, ये अवरोध, ये चिन्ताएं एवं कष्ट आ रहे है। आप सफलताओं के करीब पहुँच कर भी अन्तिम समय असफल हो जाते हंै, तो शायद ऐसा हो सकता हैै कि उस ज्योतिषी की बात आंशिक सत्य ही हो। कालसर्प दोष सदैव कष्ट कारक नहीं होता। आपको जानकर हैरानी होगी की स्वतन्त्र भारत की कुण्डली, पण्डित जवाहरलाल नेहरु की, सन्त मुरारी बापू की कुण्डली, सम्राट अकबर की कुण्डलियों में भी कालसर्प दोष है। कालसर्प दोष कुछ न कुछ अवरोध जातक के जीवन में अवश्य पैदा करता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है की केवल और केवल कालसर्प दोष ही एक मात्र कारण हो।

    कालसर्प दोष क्या है ?

    यदि मैं आपको सरलतम भाषा में समझाऊँ, तो जब राहु और केतु के बीच में सारे ग्रह आ जाये, तो यह कालसर्प दोष कहलाता है। राहु को सर्प का मुख व केतु को पूँछ माना गया है।

    राहु मुख्य रूप से दो प्रकार का माना गया है।

    1. पूवार्द्ध
    2. उत्तरार्द्ध

    पूवार्द्ध के कालसर्प दोष में जातक को जीवन के पहले 46 साल में कष्ट, परेशानियाँ मिलती है।

    पूवार्द्ध के कालसर्प दोष के कुछ उदाहरणः

    उत्तरार्द्ध के कालसर्प दोष मे जातक को जीवन के 46 साल बाद कष्ट, परेशानियाँ मिलती है।

    उत्तरार्द्ध के कालसर्प दोष के कुछ  उदाहरणः

    नोटः विश्वविख्यात ज्योतिषविद्ध डाॅ. नारायणदत्त श्रीमाली ने अपनी विभिन्न पुस्तकों में उत्तरार्द्ध के कालसर्प दोष पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया है या उत्तरार्द्ध के कालसर्प दोष को अस्वीकार किया है।

    इसके पीछे उनका तर्क ये था कि एक लगड़ा व्यक्ति लगड़ेपन के साथ एक समय पश्चात् लगडे़पन का अभयस्थ हो जाता है। उसके जीवन में लगड़ेपन का प्रभाव समाप्त हो जाता है। इसलिए एक आयु पश्चात् उसे यह महसूस होना ही बन्द हो जाता है, कि वह लगड़ा है परन्तु जब कोई व्यक्ति उसे देखता है तो उसके सामने सबसे पहले उस व्यक्ति का लगड़ापन ही आता है।

    ज्योतिष में मुख्य रूप कुल 12 कालसर्प दोष बताये गये है एवं विस्तृत रूप में 12ग12 त्र 144 प्रकार के कालसर्प दोष माने गये है।

    मुख्य रूप से 12 कालसर्प दोष के नाम इस प्रकार है।

    1. वासुकी कालसर्प योग

    तृतीय भाव अर्थात् पराक्रम भाव में नवम भाव के मध्य राहु-केतु के मध्य अन्यान्य सभी ग्रह आने पर ‘वासुकी कालसर्प योग’ घटित होता है।

    इस कुण्डली में देखेंगे राहु वृश्चिक राशि का है जिसका स्वामी मंगल लग्न में नीच के शुक्र के साथ है तथा धनेश नीचस्थ है, भाग्येश होकर एवं अष्टमेश का षडाष्टक है। लाभ भाव पर शनि की दृष्टि है। स्वयं लग्नेश-दशमेश द्वादश भाव में है। गुरु सप्तमेश होकर शत्रु राशिस्थ है एवं जन्म लग्न व चंद्र लग्न से जातक मंगली भी है।

    परिणाम

    1. भाई-बहिन व परिवारजनों से निरन्तर कष्ट उठानें पड़ेंगे ।
    2. तृतीय भाव मित्र का होने के कारण जातक मित्रों से धोखा उठायेगा।
    3. गृहस्थ जीवन विशृंखलित रहेगा तथा पति-पत्नी में परस्पर कटुता, अविश्वास, वैमनस्यता, विरोध, भोग से असंतुष्टि रहेगी।
    4. भाग्य कदम-कदम पर आपके साथ चाल चलेगा। भाग्य में निरंतर उठा-पटक तथा भाग्योदय में अनेकानेक बाधाएं आयेंगी।
    5. नौकरी में बाधाएं, उन्नति में रुकावट। राज्य पक्ष से प्रतिकूलता व जातक अनेक बार सस्पेंड होता है।
    6. जातक को विदेश प्रवास में भारी कष्ट उठाने पड़ते है।
    7. कानूनी दस्तावेजों में भावुकतावश हस्ताक्षर कर पछताता है।
    8. जातक में नास्तिक भाव की प्रधानता रहती है।
    9. पद्म कालसर्प योग

    पंचम स्थान से एकादश स्थान तक राहु-केतु के मध्य सभी ग्रह होने पर पद्म काल सर्प योग होता है।

    पंचम भाव सन्तान एवं शिक्षा का तथा एकादश भाव लाभ का है। गुरु यद्यपि उच्च राशिस्थ है तथा स्वगृही चंद्र के साथ है, पर वह शनि से दृष्ट है तथा द्वादश भाव में है।

    सूर्य स्वगृही है पर लग्न पर सूर्य-मंगल दो-दो अग्नि तत्व प्रधान ग्रहों का बल है। शुक्र अपनी नीच राशि में दशमेश होकर तथा अपनी द्वितीय राशि तुला से द्वादश है।

    शनि यद्यपि उच्च राशिस्थ है पर राहु पर दृष्टि तथा भाग्य भाव को नीच दृष्टि से देख रहा है इतना ही नहीं सुख भाव पाप कर्तरी योग के मध्य है। स्वयं दशमेश शुक्र, सूर्य-मंगल व शनि के मध्य पाप कर्तरी योग में है।

    इतना ही नहीं उच्च का गुरु-स्वगृही चंद्र भी केतु-सूर्य-मंगल के मध्य पाप कर्तरी योग कारक है। सप्तम भाव पर पाप दृष्टि है तथा सूर्य-मंगल की शत्रु राशि पर दृष्टि है।

    परिणाम

    1. जातक को गृहस्थ सुख में निरन्तर बाधाएं आयेंगी।
    2. जातक को सन्तान सुख का अभाव रहता है। सन्तान होती ही नहीं और यदि होती भी है तो जी जलाने वाली होती है।
    3. वृद्धावस्था कष्टप्रद व्यतीत होती है-सन्तान दूर चली जाती है या माता-पिता से अलग हो जाती है।
    4. शत्रु कदम-कदम पर अहित करने का सतत प्रयास करता है अथवा शत्रु गोपनीय रूप से इनके मध्य षड्यन्त्र रचता रहता है।
    5. जेल या कारावास भोगना पड़ता है।
    6. गुप्त रोग, गुप्तांग संबंधी रोग जातक को पीड़ा पहुँचाते रहते है। रोग ठीक होना कठिन रहता है। आय का यथेष्ट भाग दवाइयों पर खर्च होता है।
    7. पत्नी चरित्रवान् मिल जाये, इसमें संशय है। स्त्री का चरित्र संदेहस्पद ही बना रहता है।
    8. सच्चे मित्रों का अभाव रहता है। गुप्त शत्रु पीड़ित करते हैं, विश्वासघात होता है।
    9. सट्टे में , जुए में , रेस में, अशुभ कार्यो में भारी हानि उठानी पड़ती है।
    10. कर्कोटक कालसर्प योग

    जब केतु द्वितीय व राहु अष्टम अथवा राहु द्वितीय व केतु अष्टम भाव में हो तो ‘कर्कोटल काल सर्प योग’ होता हैै।।

    यहां देखें द्वादश भाव का स्वामी अपने से द्वादश तथा मंगल के साथ गुरु सुखेश होकर षडाष्टक कर रहा है। चंद्रमा राशि स्वामी अष्टम भावस्थ केतु के साथ ग्रहणयोग कर रहा है। वहीं भाग्य राशि भाव का स्वामी अपनी नीच राशि में है तथा मंगल से दृष्ट है। शनि-शुक्र-बुध अस्त हैं, सूर्य के साथ गुरु, मंगल शनि से दुष्ट हैं। षष्ठेश मारक भाव में है। सप्तमेश बुध का भी षडाष्टक योग है। नौ में से सात ग्रहों का बल अष्टम भाव पर है। शनि अपनी कारक राशि से द्वादश हैं।

    परिणाम

    1. जातक का अपने जीवन में भाग्योदय होता ही नहीं। यदि होता भी है तो बहुत देर से। ‘का वर्षा जब कृषि सुखाने’ भाग्य उदय होता भी है तो भाग्योदय में बार-बार रोड़े अटकते हैै।
    2. नौकरी प्रायः नहीं मिलती। मिलती भी है तो सामान्य तथा नौकरी मंे पदोन्नति नहीं होती है या नौकरी से निकाला जाता है।
    3. अथक प्रयास करने पर भी व्यापार जमता नहीं है तथा व्यापार में निरन्तर घाटा होता हैै, जिससे वह पीड़ित हो जाता है।
    4. चाह कर भी जातक को पैतृक संपत्ति नहीं मिलती, यदि पैतृक संपत्ति मिलती भी है तो नहीं के बराबर।
    5. लम्बी-असाध्य-दुरूह बीमारी भोगनी पड़ती है।
    6. आॅपरेशन-चीर-फाड़-शल्य क्रिया होती है व घाव शीघ्र नहीं भरता है
    7. ऐसे जातक की अकाल मृत्यु हो जाये तो आश्चर्य नहीं मानना चाहिए।
    8. सच्चे मित्रांे का अभाव पाता है। मित्र धन हड़प जाते हैं या धोखा देते हैं अथवा कुमार्गगामी बनाते है।
    9. कुलिक कालसर्प योग

    केतु द्वितीय व राहु अष्टम भाव में हो तो ‘कुलिक कालसर्प योग’ होता है-

    देखें सप्तमेश अष्टम भाव में है। मंगल उच्चस्थ पर मंगल की राशि में चन्द्रमा नीच का है। लाभेश शनि नीच के हैं। सूर्य अपनी नीच राशि में है। भोग कारक शुक्र अस्त है। सुखेश -सप्तमेश बुध अस्त है। अष्टम भाव सूर्य- बुध -राहु- शुक्र- शनि के छः ग्रहों से पीड़ित है। शनि-मंगल परस्पर स्थान-परिवर्तन व परस्पर दृष्टि डाल रहे है। व्ययेश की दृष्टि अष्टम पर व अष्टमेश की दृष्टि मारक भाव द्वितीय पर है। स्वयं षष्ठेश सूर्य अष्टम भाव में नीच राशिस्थ है। गुरु की दृष्टि नीचस्थ चंद्रमा पर है।

    परिणाम-

    1. जातक की स्त्री कुरूप- निर्मोही- अल्पज्ञ – अनपढ़- अतिभोगी- अविश्वासी व वहमी है।
    2. सन्तान सुख में न्युनता रहेगी। पुत्र होकर भी क्रूर-दुष्ट अवज्ञा करने वाले, मन की करने वाले हांेगे अर्थात् जातक का सन्तान-सुख नहीं के समान है।
    3. स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट एवं जातक अपने भविष्य -वृद्धावस्था को लेकर सदैव चिन्तित रहता है। मूत्र रोग, धातु क्षीणता, गुर्दे की बीमारी, मस्से की बीमारी पीड़ा देती है।
    4. जातक अपने जीवन में अनेक स्त्रियों से संसर्ग कर अपमानित होता है।
    5. मित्र कदम-कदम पर धोखा देते हैं। मित्र-पिता-कुटुम्बी जनों का सहयोग नहीं पाता है।
    6. पिता की मृत्यु अल्पायु मंे हो जाती है।
    7. आर्थिक विषमता, अभाव, धन की न्यूनता पिंड नहीं छोड़ती। अथक परिश्रम निरन्तर संघर्ष करके भी जातक आर्थिक पक्ष नहीं सुधार पाता है। आय की अपेक्षा व्यय अधिक होता हैै।
    8. अपशय-निरादा, अपमान-उपेक्षा -आलोचना से जातक घिरा रहता है।
    9. कौटुम्बिक कलह से जातक पीड़ित रहता है।
    10. महापद्म कालसर्प योग

    जब राहु षष्ठ भाव में व केतु द्वादश भाव में हो तो उक्त ‘महापद्म कालसर्प योग’ की सृष्टि होती है।

    इस कुण्डली में द्वितीय धनभाव मंगल-शनि व सूर्य के मध्य होकर पाप कर्तरी योग बना रहा है। सूर्य पर शनि की दृष्टि है। शुक्र पर मंगल की दृष्टि है। दशमेश अपने से अष्टम है। सप्तम भाव पर शनि की नीच दृष्टि है। बुध का भाग्य भाव से षडाष्टक है तथा धनेश भी मंगल अपने से द्वादश है। गुरु स्वयं अपनी नीच राशि में है तथा गुरु राशिस्थ राहु है।

    परिणाम-

    1. जातक प्रेम-प्रकरण में सर्वथा असफल रहता है तथा गृहस्थ सुख न्युनतम रहता है।
    2. पत्नी का विरह योग सहन करना पड़ता है तथा पत्नी मनोनूकुल नहीं मिलती।
    3. जातक आयु पर्यन्त रोग-शोक-कष्ट-शत्रुओं से घिरा रहता है।
    4. जातक के चरित्र पर बार-बार छींटे लगते है। जातक का चरित्र विशुद्ध नहीं रह सकता।
    5. निराशा की भावना से वह ग्रसित रहता है।
    6. वृद्धावस्था कष्टप्रद रहती है एवं रोगपीड़ित रहता है।
    7. आय में न्यूनता, धर्म क्षति एवं खर्च की बहुलता रहती है।
    8. शंखनाद कालसर्प योग

    जब राहु नवम भाव में और केतु तृतीय भाव में हो और शेष ग्रह इनके मध्य हो तो ‘शंखनाद काल सर्पयोग’ बनता है।

    यहाँ हम देखते हैं कि पंचमेश राहु के साथ भाग्य स्थान पर ग्रहण योग बना रहा है, वहीं भाग्येश षष्ठ भाव में शनि दृष्ट है। जातक का जन्म ही साढे़साती में हुआ है। जहां राहु पर गुरु की दृष्टि तथा लाभ भाव पर गुरु की नीच दृष्टि है, वहीं धन-धान्य-ऐश्वर्य का कारक ग्रह शुक्र अपनी नीच राशि में है तथा अष्टमेश अष्टम से द्वादश है। दशमेश का दशम भाव से षडाष्टक है। लग्न पर बुध की नीच दृष्टि है, शनि-राहु-चंद्र मंगल से दृष्ट है।

    परिणाम-

    1. जातक को भाग्यहीन, दुर्भाग्यशाली, हीन भाग्य कहा जा सकता है।
    2. राज्य पक्ष से प्रतिकूलता, मानहानि, अपमान, अवनति होना संभव है।
    3. पितृ-सुख में न्युनता तथा कार्य व्यापार-व्यवसाय में न्युनता, कम लाभ एवं बार-बार हानि होती रहती है। अथक परिश्रम करके भी व्यवसाय की स्थिति को नहीं संभाल पाता है।
    4. गृहस्थ सुख में बाधा एवं भोग से अतृप्ति रहती है।
    5. तक्षक कालसर्प योग

    जब राहु सप्तम और केतु लग्न में हो तथा सप्तम से लग्न के मध्य सूर्य-चंद्र-मंगल-बुध-बृहस्पति-शुक्र-शनि शेष सभी ग्रह हो तो ‘तक्षक कालसर्प योग’ होता है।

    गुरु-राहु युति चाण्डाल योग बना रहे हैं तथा दशमेश गुरु राशि से षडाष्टक योग बना रहा है। सूर्य का स्व राशि सिंह से द्वि-द्वादश योग है तथा लाभेश मंगल का लाभभाव से षडाष्टक है। स्वयं लग्नेश बुध का अपनी कारक राशि कन्या से द्वि-द्वादश योग है। शनि अपने प्रबल शत्रु सूर्य की सिंह राशि में है तथा अष्टमेश षडाष्टक योग बना रहा है। पंचम भावस्थ स्त्री ग्रह बुध व शुक्र है। सप्तम भाव पर मंगल की दृष्टि है। शुक्र अपनी राशि से षडाष्टक कर रहे है। सप्तम भाव पर राहु-केतु-गुरु-मंगल का दुष्प्रभाव है।

    परिणाम-

    1. जातक को पुुत्र सन्तान का सर्वथा अभाव रहता है तथा कन्या से मानसिकता नहीं जुड़ती है।
    2. स्त्रीसुख में न्युनता तथा जातक परस्त्रीगामी हो जाये तो कोई आश्चर्य नहीं।
    3. जीवन में भारी उथल-पुथल एवं संघर्षरत रहना पड़ता है।
    4. पैतृक संपत्ति या तो दान दे देता है अथवा नष्ट हो जाती है।
    5. जीवन मे कई बार जेल-यात्रा करनी पड़ती है।
    6. गुप्तांग संबंधी रोग जीवन भर परेशान करते है।
    7. शत्रु पक्ष की प्रबलता पीड़ित करती है।
    8. अनन्त कालसर्प योग

    जब लग्न में राहु एवं सप्तम भाव में केतु हो ओर शेष ग्रह उनके मध्य अवस्थित हो तो ‘अनन्त कालसर्प योग’ होता है।

    जातक की कुण्डली में देखे, मंगल लग्नस्थ राहुयुक्त एवं चंद्र केतुयुक्त है। चंद्र व मंगल दोनों का अपनी राशि से द्वि-द्वादश है। धन भाव पर गुरु की नीच दृष्टि है एवं द्वादश भाव पर गुरु दृष्टि है। चंद्र -केतु ग्रहण योग बनाते हैं सूर्य का स्वराशि से द्वि-द्वादश योग है, वहीं शुक्र षडाष्टक करता है। पंचम भाव पर शनि की दृष्टि अपनी नीच राशि पर है। जातक प्राकृतिक लग्न, सूर्य लग्न व चंद्र्र लग्न तीनों से मंगली है। मंगल पर शनि की दृष्टि भी है। गुरु भी शनि से दृष्ट है।

    परिणाम-

    1. जातक को जीवन में मानसिक शान्ति नहीं मिल सकती है। सदैव ही अशान्त, क्षुब्ध, परेशान, अस्थिर रहेगा।
    2. जातक नीच बुद्धि, दुर्बुद्धि, कपटी, चालबाज, लुच्चा, असत्य भाषणकर्ता, प्रपंची, झूठबोला, षड्यन्त्रों में फंसने वाला होगा।
    3. जातक जीवन भर थानों, कोर्ट-कचहरियों के चक्कर काटता रहेगा।
    4. बार-बार पलट-पलट कर व्यवसाय करेगा एवं बार-बार हानि उठायेगा।
    5. जातक को अपनी पद-प्रतिष्ठा संभालने के लिए आवश्यकता से अधिक संघर्ष करना पड़ता है।
    6. गृहस्थ जीवन इनका शून्यवत् रहता है।
    7. शंखपाल काल सर्प योग

    जब राहु सुखस्थ व केतु कर्मभाव में हो और अन्यान्य ग्रह इनके मध्य हों तो ‘शंखपाल काल सर्प योग’ होता है।

    आप देखेंगे कि इसमे लग्नेश गुरु द्वादश भाव के स्वामी मंगल व केतु के साथ दशम भाव में है तथा राहु-भाग्येश सूर्य-द्वितीयेश शनि से दृष्ट है। सप्तमेश बुध द्वादश भाव में है तथा भाग्येश का अपनी राशि से षडाष्टक है। राहु-शनि अपनी शत्रु राशिस्थ है। चंद्र्र्रमा भी षडाष्टक में एवं शनि-मंगल से दृष्ट है।

    परिणाम-

    1. धन-धान्य-समृद्धि तथा चल-अचल संपत्ति में न्युनता आती है तथा पैतृक संपत्ति प्राप्ति में व्यवसाय उपस्थित होते है।
    2. भाई-बहिन-माता तथा नौकर-चाकरों से व्यवधान-परेशानी व बाधाएं आती रहती है।
    3. नौकरी एवं व्यवसाय में उतार-चढ़ाव, उत्थान-पतन का सामना करना पड़ता है।
    4. स्वास्थ्य प्रायः बिगड़ा रहता है।
    5. शिक्षा प्राप्ति में बाधाएँ आती है एवं शिक्षा पूर्ण नहीं होती है।
    6. पातक कालसर्प योग

    जब राहु दशम व केतु चतुर्थ भाव में हो एवं अन्य ग्रह इनके मध्य हों तो ‘पातक कालसर्प योग’ होता है।

    आप देखेंगे कि इनमें लाभेश शुक्र नीचाभिलाषी है तथा षष्ठेश है। धन भाव पर गुरु अर्थात् लग्नेश सुखेश की नीच दृष्टि है। शनि अपने प्रबल शत्रु अपने प्रबल शत्रु सूर्य भाग्येश के साथ सप्तम भाव में है। द्वादशेश मंगल शत्रु के साथ शनि दृष्ट है तथा बुध का दशम् भावाधिपति होकर षडाष्टक है। गुरु पाप कर्तरी योग के अन्तर्गत सूर्य-शनि-मंगल के मध्य है। चंद्रमा अष्टमेश होकर षष्ठ भाव में है।

    परिणाम-

    1. जातक का सम्पूर्ण जीवन विघ्न-बाधाग्रसित रहता है तथा नौकरी व व्यवसाय संबंधी अथक प्रयास करने पर भी सफलता नहीं मिलती है एवं भटकावपूर्ण जीवन यापन करता है।
    2. व्यापार में कदम-कदम पर मित्र धोखा देते हैं एवं जातक हानि उठाता है।
    3. सन्तान होकर भी निरन्तर रोग-ग्रस्त पीड़ित रहती है।
    4. नाना-नानी अथवा दादा-दादी का वियोग सहना पड़ता है।
    5. माता-पिता का विरहजन्य कष्ट सहन करना पड़ता है।
    6. शेषनाग कालसर्प योग

    जब राहु बारहवें एवं केतु षष्ट भाव में हो एवं अन्य सभी ग्रह इनके मध्य हो तो ‘शेष नाग फल सर्प योग’ होता है।

    देखें, राहु-चन्द्र ग्रहण योग द्वादश भाव में बना रहे हैं तथा जातक का जन्म ही साढ़े-साती मे हुआ है। शनि-चंद्र्र-राहु पर मंगल की दृष्टि है। लाभेश अपनी नीच राशि में है तथा लग्नेश गुरु का लग्न से षडाष्टक है।

    परिणाम-

    1. जातक गुप्त शत्रुओं से सदैव पीड़ित रहेगा।
    2. शरीर सुख न्युनतम रहता है तथा स्वास्थ्य प्रायः बिगड़ा रहता है।
    3. लड़ाई-झगड़े-कोर्ट-कचहरी में प्रायः जातक की हार होती है।
    4. जातक कदम-कदम पर अपनों से बदनाम होता है। पर मृत्युपरान्त इनका नाम होता है।
    5. जातक के बायीं आँख का जीवन में आॅपरेशन होता है।
    6. विषाक्त कालसर्प योग

    जब राहु एकादश भाव में व केतु पंचम भाव में हो व शेष ग्रह इनके मध्य हों तो ‘विषाक्त कालसर्प योग’ होता है।

    इस योग में देखें लग्नेश उच्च राशिस्थ होकर भी द्वादश भाव पर नीच दृष्टि है तथा लाभ भावस्थ राहु पर लाभेश अष्टम भाव में शनि के साथ है। धनेश मंगल अपनी नीचराशि में सप्तमेश होकर दशम् भाव में शनि दृष्ट है। दशमेश का सप्तमेश से परस्पर परिवर्तन है। पराक्रमेश गुरु का पराक्रम भाव से दृष्ट है।

    परिणाम-

    1. जातक अपनी आजीविका के लिए घर-परिवार से दूर रहता है।
    2. भाइयों से भरपूर विवाद, कोर्ट-कचहरी का सामना करना पड़ता है और विशेष रूप से बड़े भाई से।
    3. नेत्र रोग, हृदय रोग जैसे रोग से पीड़ित रहता है।
    4. जातक अनिद्रा जैसे रोग से पीड़ित रहता है। सब मिलाकर जातक का शरीर रोग से जर्जर हो जाता है।
    5. जीवन की इहलीला रहस्ममय तरीके से समाप्त होती है।

    कालसर्प दोष होते हुए भी किन कारणों से कालसर्प दोष का प्रभाव कम हो जाता है।

    1. जब द्वादश भाव या द्वितीय भाव में शुक्र हों।
    2. जब लग्न या केंद (4, 7, 10) में बृहस्पति हो।
    3. जब बुधादित्य हो।
    4. जब दशम मंगल हो।
    5. जब मालव्य योग अर्थात् केंद्र में स्वगृही या उच्च का शुक्र हो।
    6. जब केन्द्रस्थ स्वगृही मंगल -रुचक योग’ की सृष्टि करता हो।
    7. जब शनि उच्च राशिस्थ तुला में होकर लग्न या केन्द्र में होकर ‘शशक योग’ बना रहा हो।
    8. चंद्र$मंगल की युति केन्द्र में हो पर मंगल मेष, वृश्चिक या मकर का हो एवं चन्द्रमा उसके साथ होकर लक्ष्मी योग बनता हो।
    9. जब पंच महायोग में से कोई एक महायोग हो।
    10. जब चार ग्रहों की कहीं केन्द्र 1, 4, 7, 10 वें भाव में युति हो और उसके साथ एक ग्रह शुक्र, गुरु, शनि, मंगल, सूर्य, चंद्र में से स्वगृही अथवा उच्च राशिस्थ हो।

    यदि कालसर्प दोष की कुण्डली है एवं राहु निम्न भावों में बैठकर कालसर्प दोष की कुण्डली बनाता है, तो निम्न भावों से राहु इस प्रकार परिणाम देगा।

    राहु लग्नस्थ होने पर जातक पूर्णरूपेण दुष्ट, घोर स्वार्थी, राजद्वेषी, नीचकर्मरत, मनस्वी, कृशकाय, दुर्बल, क्षीण शरीर, कामान्ध, काम पिपासु, अल्पसन्तति युक्त, घोर साहसी, दम्भी, अपने कहे वचनों पर दृढ़ रहने वाला, स्व वचनपालक, स्वकार्य दक्ष, चतुर, बहु रोगी, धर्म रहित या अधर्मी, मित्रों से द्वेष एवं विरोध रखने वाला, वादापवाद में सदैव विजयी, स्वजनों से दूर या स्वजन वंचक, सन्तानहीन या सन्तानद्वेषी होता है तथा उसकी स्त्री को बार-बार गर्भ की क्षति होती है। वैद्य, डाॅक्टर, हकीम, देह विशेषज्ञ, संगीत प्रेमी, शरीर में वेदना का रोग, मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, मकर, राशिस्थ होने पर राज्य सेवा या नौकरी से यथोचित लाभ प्राप्त करता है। भोगी, भोगप्र्रिय, विलासी, अनुचित संबंध बनाने वाला तथा सहानुभूतिपूर्ण होता है। मेष, कर्क, सिंह राशिस्थ राहु विशेष स्वर्ण लाभ प्रदान करता है। राहु पर यदि चंद्र, बुध, गुरु, शुक्र की दृष्टि हो तो मुँह पर चिन्ह होता है तथा पांचवां वर्ष घातक होता है।

    यदि राहु धन भावस्थ है तो जातक परदेशवासी, परदेशगामी, विदेशाटन करने वाला, अति अल्प सन्तति युक्त, कुटुम्ब सुख से रहित, दुष्ट भाषा का प्रयोग करने वाला, दुष्टभाषी, अल्पधनी या निर्धन, आजीवन घोर संघर्ष करने वाला, निंदक, वंचक, निंदनीय भाषा का प्रयोग करने वाला, घुमक्कड़, भ्रमणशील जीवन यापन करने वाला, सन्तान और प्रधानतः पुत्र सन्तान से पीड़ित, चिन्तायुक्त, धन-धान्य-समृद्धि रहित, कठोर, मात्सर्ययुक्त, मांसभक्षी, मांस-मछली चर्म, नखादि क्रय-विक्रय द्वारा लाभान्वित, पाप ग्रहों के साथ राहु होने पर ओठ मे चिहृ तथा बारहवें वर्ष धन की विशेष हानि होती है, धननाश होता है। राज कोप का भाजन बनता हैै।

    तृतीय भावस्थ राहु होने पर वह जातक योगाभ्यासी, योग चर्चा में भाग लेने वाला, विवेकशील व दृढ़ विवेकी, अरिष्टनाशक, प्रवासी, परदेशगामी, धन-धान्य-ऐश्वर्य सम्पन्न, विद्वान एवं विद्वानों का संग करने वाला, अवसरवादी एवं अवसर का लाभ उठाने वाला, व्यवसाय प्रेमी, यशस्वी पराक्रमी, दृढ़ मतावलंबी, ऐश्वर्यशाली, सुख-सुविधा संपन्न, साहसी, बहुशत्रु युक्त या शत्रु पालक, पर सदैव शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। वह कान की पीड़ा से परेशान होता है। समय से पूर्व स्मरण-शक्ति क्षीण हो जाती है। याददास्त कमजोर हो जाती है। ऐसे जातक के भाइयों व शत्रुओं की मृत्यु होती है। प्रायः वह भ्रातु-सुखहीन होता है। शुभ ग्रह से युक्त होने पर कण्ठ मे चिन्ह होता हैै। 12-13 वर्ष मे भातृ-सुख विशेष होता हैै।

    सुख भावस्थ राहु होने पर जातक असन्तुष्ट रहता है। प्रायः दुखी होता है। माता के कष्ट या माँ को कष्ट होता है। जातक क्रूर, दंभी, पेट दर्द या उदर व्याधि युक्त होता है। झूठा, प्रपंची, आडम्बरी, मिथ्या भाषण करने वाला, मित्र, दोस्त, पुत्र एवं आत्मीय जनों के सुख से रहित होता है। ऐसे जातक के या तो माताएँ होती हैं अथवा दो स्त्रियाँ होती है। वस्त्राभूषण युक्त, नौकरी-चाकरों के सुविधा से वह सम्पन्न होता है। 1/2/4 अर्थात् मेष, वृष, कर्क राशिस्थ होने पर बंधुसुख होता है। ऐसा न होने पर वह बंधु जनों से पीड़ित होता है। पाप ग्रहों का साथ होने पर माता को कष्ट अवश्य पहुंचाता है। चतुर्थ राहु होने पर 8 वे वर्ष भाई को हानि पहुंचना अवश्यंभावी है।

    पंचम भावस्थ राहु होने पर जातक मंद बुद्धि, अल्पज्ञ, धन-धान्य संपत्ति रहित, निर्धन, अल्पायु में ही उसे सन्तान की प्राप्ति होती है। जातक संचित सम्पत्ति व पैतृक सम्पत्ति का नाश करता है तथा कुलनाशक होता है। सन्तान का या तो अभाव होता है अथवा सन्तान की बार-बार हानि होती है। जातक नीच कर्म करने वाला, कुमार्गी, महा आवेशी व क्रोधी, मित्ररहित होता है। वह कुटिल चाल चलने वाला षड़यन्त्रकारी, मतिभ्रम, दुर्बुद्धि? कुटिल, भ्र्रान्त चित्त, वायु रोग पीड़ित, उदर शूल रोग, राज कोप से बार-बार दण्डित होता है। वह अत्याचारी अपनों का अहित करने वाला, पर भाग्यशाली, श्रेष्ठ कार्यकर्ता, परिश्रमी, शास्त्रज्ञ व शास्त्रप्रेमी, नाग देव, नाग पूजा व विष्णु पूजा द्वारा इन्हें संतान विशेषकर पुत्र की प्राप्ति होती है। कर्क राशिस्थ राहु पंचम होने पर पुत्र प्राप्ति व सुख संभव है। ऐसा न होने पर दीन-हीन, निर्धन, मलिनपुत्र उत्पन्न कर पीड़ित होता है। सिंहस्थ राहु मंे यदा-कदा पुत्र देखने में आता है। पंचम भावस्थ राहु 5 वें वर्ष बंधु हानि देता है।

    रोग-शत्रु भावस्थ अर्थात् षष्ठ भाव में राहु विधर्मियों के द्वारा जातक को लाभ प्रदान करता है। जातक सबल, स्वथ्य निरोग होकर शत्रुहन्ता होता है। शत्रु इनके सामने टिक नहीं सकता। वह कमर के दर्द से प्रायः सदैव पीड़ित रहता है। अरिष्टों का नाश करने वाला, पराक्रमी, गंभीर, सर्वथा हर प्रकार से सुखी, ऐश्वर्य संपन्न, विद्वान् तथा बली नीच जन, म्लेच्छ, नीचकर्मी लोगों से प्रभुता प्राप्त करता है। जातक अपने जीवन में कई एक बड़े-बडे़ कार्य सम्पन्न करता है। राजवत् प्रतिष्ठित और शत्रु पर अनायास ही विजय प्राप्त करता है और धनार्जन करता है। ऐसा जातक स्त्री सुखरहित या स्त्रीहीन, पशु भय से ग्रस्त, चचेरे या फूफेरे भाइयों का सुख पाने वाला। चन्द्रमा से युक्त ऐसे राहु में राजरानी से भोग करने वाला, चोर धनहीन होता है। 21 व 37 वें वर्ष कलह व शत्रुभय से भारी पीड़ा प्राप्त करता है।

    सप्तम भावस्थ राहु करने पर जातक स्त्री नाशक तथा व्यापार में वह निरन्तर व बार-बार हानि उठाता है। जातक भ्रमणशील जीवन व्यतीत करता है। वह वात रोड़ पीड़ित, दुष्कर्मी स्वकार्य चतुर, लोभी, कृपण तथा जननेन्द्रिय रोग से पीड़ित होता है। प्रमेह, सुजाक, गुप्तरोग उसे पीड़ित करते है। अपने जीवन में वह विधवा स्त्री से संसर्ग जोड़ता है। विवाह के समय उसकी स्त्री रोगग्रसित, रोगपीड़ित होती है। द्विभार्या योग होता है तथा प्रथम स्त्री को रक्त संबंधित रोग पीड़ित करता है तथा दूसरी स्त्री से यकृत विकार होता है। स्त्री वंचक व कलहप्रिय होती है। क्रोधी, दंभी, मनमानी करनेवाली स्त्री सदैव विवादों में घिरी रहती है। वह प्रचण्ड रूपा, अपव्ययी, खर्चालु स्वभाववाली होती हैै तथा पति-पत्नी में सदैव वादापवाद होता ही रहता है। पापयुक्त राहु स्त्री कुटिला, पापिनी, दुःशीला, गण्डमाक रोग से पीड़ित द्विभार्या का संयोग होता है। परन्तु शुभ ग्रह युक्त होने पर पूर्वोक्त दोष नहीं होते है। द्विभार्या योग भी कम देखने में आता है। 30 वें वर्ष में स्त्री मे भारी दैहिक कष्ट होता है।

    अष्टम भावस्थ राहु शारीरिक दृष्टि से जातक को हृष्ट-पुष्ट, स्वस्थ, निरोग तथा पुष्ट देह रखता है। जातक गुप्त रोगी, क्रोधी, व्यर्थ भाषी, वाचाल पर मूर्ख उदर व्याधि युक्त, काम पीड़ित, झगडालू, पापी, गुदा, प्रमेह अण्डकोष वृद्धि, अर्श रोग से पीड़ित रहता है। 32 वां जीवन आशा क्षीण करता है। शुभ युक्त राहु होने पर 25 वें वर्ष जीवन आशा की आशंका रहता है। बलवान् ग्रह के साथ अष्टमेश होने पर 60वें वर्ष मृत्यु भय या मृत्युतुल्य कष्ट होता है।

    नवम अर्थात् भाग्य भाव में राहु होने पर जातक धर्मात्मा परन्तु दुर्बुद्धि, नीच, धर्मानुरानी, पवित्रता रहित, धर्म-कर्म से रहित, मंद-बुद्धि, दुर्बुद्धि, अल्प सुखभोगी होता है। भ्रमणशील, दरिद्र तथा बंधु जन रहित होकर जीवन-यापन करता है। इनकी स्त्री निःसन्तान होती है। अनुदार। अधार्मिक धर्म-कर्म रहित होती है। 19 व 29 वें वर्ष ऐसा राहु पिता के लिए भारी अरिष्टकारक होता है अर्थात् पिता को कष्ट पहंुचाता है। जातक प्रवासी, आंत्ररोगी, व्यर्थ का परिश्रम करने वाला होता है तथा भाग्यहीन होता है।

    दशम भावस्थ राहु होने पर जातक महा आलसी, कामचोर, बहुभाषी अर्थात् वाचाल, नियमित कार्य न करने वाला अर्थात् अनियमित कार्यकर्ता, विश्रृंखलित जीवन, लोभी, कृपण, मितव्ययी, अर्थ को प्रधानता देने वाला, संतान के लिए कष्टकारक होता है। जातक विद्वान, शुरवीर, धन-धान्य-ऐश्वर्य संपन्न, धनी पर रोगी, वात-पीड़ित, शत्रुओं का बल नष्ट करने वाला, मन्त्री या दण्डाधिकारी, न्यायाधीश, पुर या ग्राम समूह का नेता या नायक, काव्य-नाटक-छन्द शास्त्र का ज्ञाता, रसिक शिरोमणि, घुमक्कड़, भ्रमणशील, पर पितृ सुख से रहित, वस्त्र व्यवसाय में दक्ष, निर्माता होता है। ऐसा मीन राशिस्थ राहु गृहादि सुख युक्त, काव्य विनोदी, शास्त्रज्ञ होता है। 54 वें वर्ष में शस्त्र या शत्रु द्वारा उसके जीवन मंे भारी संकट उपस्थित होता है। 1/2/3/4/5/6/10/12 राशिस्थ अर्थात् मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, मकर, मीनस्थ राहु प्रायः शुभ फल प्रदान करता है। बलवान् शत्रु से कलह उत्पन्न होता है। चन्द्र-राहु मिलकर उत्तम राजयोग होता है।

    ग्यारहवें भाव में राहु थोड़ा-थोड़ा न्युनाधिक लाभ प्रदान करता है। स्वकार्य में उसे सफलता प्राप्त होती है कि वह स्वकार्य दक्ष होता है। धन-धान्य-सुख-सम्पन्नता युक्त एवं राजद्वार से धन एवं पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। वास्त्राभूषण, अन्न-धन-लक्ष्मी-भृत्यादि का जीवन में सुख प्राप्त करता है। पशु-वाहन सुख से युक्त एवं युद्ध में, विवाद में, कोर्ट-कचहरी के कार्यो में उन्हें प्रायः विजयश्री प्राप्त होती है। अच्छी-भली संतान से युक्त, म्लेच्छ शासक के द्वारा वह बार-बार सम्मानित होता है। 45 वे वर्ष में पुत्र तथा धन का अतुल सुख होता है। मन्दगति, लाभहीन, घोर परिश्रमी, अरष्टिनाशक, सन्तान के कष्ट तथा व्यवसाय में सफल होता है।

    द्वादश भावस्थ राहु जातक को नीच वृत्ति, कपटी, दुराचारी, कृतघ्न तथा घमण्डी, दम्भी, लोभी, कृपण, नेत्र पीड़ित, चर्मरोग पीड़ित, कोढ़ी, प्रवासी, घर-परिवार से दूर ले जाता है। उसके पैर में चोट लगती है तथा पत्नी सदैव चिन्तातुर रहती है। न्युनतम सन्तान तथा 45 वें वर्ष में स्त्री को भारी दैहिक पीड़ा होती है। जातक मति मंद, मूर्ख, मेहनती, परिश्रमी, सेवक निरन्तर चिन्ता करने वाला और काम पीड़ित होता है।

    राहु-राशि-फल

    मेष- पराक्रम हीन, आलसी, अविवेकी, अतिचारी, शिरपीड़ा युक्त, कामाग्नि पीड़ित विवाद में विजयी, दीर्घ रोगी।

    वृष- सुखी, चंचल, धन-धान्य संपन्न-कपट-शूरवीर, वाचाल, धन-नाशक, दरिद्र, मित्रों की बात न मानने वाला

    मिथुन- योगाभ्यासी, गायक, बलवान, दीर्घायु, बाहुबली, प्रतापी, विश्वबंधु, बुद्धि चातुर्य युक्त, विवेकी।

    कर्क- उदर रोगी, धनहीन, कपटी, पराजित, मित्रों से सुखी, स्त्री प्राप्ति, माता-पिता का क्लेश, शीत-वात-विकार।

    सिंह- चतुर, नीतिज्ञ, सत्पुरुष, विचारक, सन्तान की चिन्ता अधिक, राजदण्ड, भय भूख से मृत्यु, कुक्षि पीड़ा।

    कन्या- लोकप्रिय, मधुर भाषी, कवि, लेखक, गायक, कोई बुद्धि-बल से हीन शत्रु या रोग का विनाश।

    तुला- अल्पायु, दन्त रोगी, अल्प धनाधिकारी, कार्य कुशल, स्त्री की हानि, अग्नि या वायु से कष्ट, सन्तप्त।

    वृश्चिक- धूर्त, निर्धन, रोगी, धन नाशक, राज्य या विद्वानों से सम्मानित, धनी लोक विरोधी-ग्रन्थि रोग से पीड़ित।

    धनु- बाल्यावस्था में सुखी, दत्तक जाने वाला, मित्र द्रोही, दृढ़ संकल्पी, व्रतग्राही बंधुओं पर अति स्नेही।

    मकर- मित्र द्रोही, मितव्ययी, कृृपण कुटुम्ब रहित, धन-मान, प्रताप, सुखादि की क्षीणता, जलभय।

    कुंभ- मितव्ययी, कुटुम्ब रहित, दन्त रोगी, विद्वान, लेखक, उपदेश से कल्याण, परदेश में प्रतिष्ठा, शत्रु नाश।

    मीन- आस्तिक, कुलीन, शान्त, कला प्र्रेमी, दक्ष, धन संचय में विघ्न, उच्च स्थान से गिरने का भय, भ्रमण मंे असफलता।

    राहु-दृष्टि-फल

    यदि लग्न पर राहु की दृष्टि हो तो जातक शरीर सुख रहित, सदैव रोगी और चेचक आदि द्वारा मुंह पर चिन्ह होते है।

    द्वितीय भाव पर दृष्टि हो तो कौटुम्बिक कष्ट 8 या 14 वर्ष मे जलभय तथा पापावादी से मृत्यु तुल्य कष्ट होता है।

    तृतीय भाव पर राहु की दृष्टि होने पर पराक्रम द्वारा धन लाभ सफलता, धन से सुखी, पुत्र को कष्ट, चोर -अग्नि-सर्प-राज्यादि से भय होता है। भाई के द्वारा सुख हानि अथवा सहोदरों को कष्ट होता है।

    चतुर्थ भाव पर यदि दृष्टि हो तो माता को कष्ट, पुण्य भाव का उदय, म्लेच्छ जन द्वारा भाग्योदय, सर्वत्र विजय, कुक्षि या उदर मंे दारुण दुःख और भाई या मित्र को पीड़ा होती है।

    पंचम भाव पर राहु की दृष्टि का अर्थ है, सन्तान को कष्ट, अल्प भाग्य युक्त कभी राज्य पक्ष द्वारा विजयी, श्रम करने पर भी विद्या निष्फल या अल्प विद्या-मंदबुद्धि, स्मरण शक्ति रहित और जीवन भटकाव पूर्ण व्यतीत करता है।

    षष्ठ भाव पर राहु की दृष्टि का अर्थ है शत्रु का नाश, दुष्ट ग्रह के साथ होने पर धन का हानि, दुष्टों द्वारा धन की क्षति, गुणी, विनम्र बल और वीर्य की हानि होती है।

    सप्तम भाव पर राहु की दृष्टि होने से भोग में अधिक रूचि, कामदेव की जागृति अधिक, स्व वचनों का सिद्ध करने वाला, हठी, निडर, जिद्दी तथा इसकी दशा में स्त्री की मृत्यु अथवा स्वयं को दैहिक कष्ट होता है।

    नवम भाव पर दृष्टि होने से नव वधु का भोगी, भाइयों द्वारा कष्ट, पुत्र धन से सुखी होता है। मित्र पीड़ा, म्लेच्छ शासक द्वारा उन्नत्ति व विजय पाता है।

    दशम भाव पर राहु की दृष्टि होने पर कार्य में सफलता, बाल्यावस्था में पिता की मृत्यु, माता को थोड़ा-सा सुख प्राप्त होता है।, किसी-किसी की माता दीर्घायु पाने वाली और कार्य व्यवसाय में जातक हानि उठाता है।

    लाभ भाव पर राहु की दृष्टि पूर्णायु, धन-धान्य से संपन्नता, राज्य से लाभ व सुख और उन्नति के लिए सतत क्रियाशील रहता है।

    व्यय भाव पर राहु की दृष्टि जातक को कृपण, दान-पुण्य रहित, युद्ध में शत्रु का विनाशक, विफलता युक्त पर कोई-कोई सुखी भी होता है। कामी, वधिर तथा कुल का नाशक होता हैै।

    कालसर्प दोष की कुण्डलीयों में केतु का भाव अनुसार प्रभावः

    लग्न भाव में केतु होने पर जातक दुर्बल शरीर-कृश काय, कमर में पीड़ा रहती है। जातक वात रोग से पीड़ित, उद्विग्न चित्त, खिन्न, उदार, परेशान, स्त्री चिन्ता से पीड़ित, झूठा, प्रपंची, दम्भी, मिथ्याभाषी तथा चंचल एवं भीरु हृदय, दुराचारी, महामूर्ख, अनेक शत्रुओं से पीड़ित होता है। उसके हाथों-पांवों से पसीना खूब निकलता है। केतु पर किसी शुभ या पाप ग्रह की दृष्टि हो तो मुंह पर या मंुह मंे चिन्ह होता है। 5 वां वर्ष उसके जीवन में महा कष्टप्रद कष्टकारक होता है। कार्य में निरन्तर असफलता व हानि होती है। शरीर कष्ट एवं मध्यायु में मृत्यु तुल्य कष्ट होता है। परन्तु वृश्चिक राशि में केतु हो तो वह सुखकारक होता है।

    द्वितीय भाव में केतु होने पर जातक दुष्टात्मा, अशोभनीय-अशुभ कर्म में तत्पर, कुटुम्ब का विरोधी, मुख रोग से सर्वदा पीड़ित, नीच-दुष्ट दुर्बु़िद्ध लोगों का साथ करने वाला, जाति, धर्म, स्वजन, आत्मीय जनों या सभी लोगों का विरोधी, स्पष्ट वक्ता, राज पक्ष से सदैव भय खाने वाला, विरोधी लोगों का घृणापात्र, राजकोष से धन- ध्यान- ऐश्वर्य-संपत्ति की क्षति उठाने वाला होता है। यदि केतु स्वगृही सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु 5/6/8/9 राशि गत हो अथवा शुभ ग्रह की राशि में हो तो सुख-सम्पन्नता युक्त होता है। परन्तु 12 वें वर्ष में भारी धन की हानि उसे उठानी पड़ती है।

    केतु यदि तृतीय भाव में हो तो भातृभाव, पराक्रम भाव में हो तो महा तेजस्वी, उसे बहनोई की सदैव चिन्ता लगी रहती है। जातक भोगी धन-धान्य-ऐश्वर्य सम्पन्न बलवान्, स्थिर चित्त वृत्ति रहित, चपल, चंचल, वात रोगी, रूक-रूककर बोलने वाला, व्यर्थ के प्रपंचों व वादापवाद में उलझनेवाला, भूत-प्रेत से भय खाने वाला, सर्व जन प्रिय पर मानसिक रूप से चिन्तातुर होता है। उसे भाईयों के सुख का अभाव रहता है। बहिन का भरपूर सुख प्राप्त होता है। परन्तु परिस्थितिजन्य दोष के कारण सदैव उदासीन वृत्ति अपनाए रहता है। शुभ ग्रह या ग्रहों के साथ होने पर कण्ठ में चिन्ह होता है। 12-13 वर्ष में भाई का सुख होता है। चन्द्रमा के साथ होने पर दो भाइयों का सुख होता है। अन्य भाइयों की मृत्यु हो जाती है। 36 वें वर्ष में भाइयों को कष्ट होता है। लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

    केतु यदि चतुर्थ भाव में हो तो जातक को माँ का सुख प्राप्त नहीं होता हैं। उसका कोई मित्र नहीं होता। यदि मित्र हो तो भी मित्रों से दुखी होता है। पिता के लिए सर्वथा कष्टकारक, भातृरहित तथा चलायमान मनोवृत्ति रहती है। जातक वाचाल, बहुभाषी व कार्यहीन, कार्य के प्रति निरुत्साही बना रहता है। कलहप्रिय तथा ब्राह्मण वर्ग द्वारा कष्ट पहुंचता है। उसके भाई रोगी तथा क्षीण काय व दुर्बल होते है। सिंह और वृश्चिक राशिस्थ केतु हो तो माता-पिता और मित्रों से सुख प्राप्त होता है। परन्तु यह सुख अल्प अवधि तक रहता है। धनु राशि का केतु हो तो मिश्रित फल की प्राप्ति होती है। पाप ग्रहों से युक्त केतु माता के लिए कष्टप्रद रहता है। सुख देता है शुभ ग्रह युक्त केतु 1/8 वें वर्ष में भाई को कष्ट संभव है।

    पंचम भावस्थ केतु कुबुद्धि, कुचाली, वाचाल, धूर्त, चालबाज, षड्यन्त्रकारी, वातरोगी तथा विदेशगामी बनाता है। ऐसा जातक सुखी, बलवान, बन्धुजनों से पे्रम करने वाला होता है। वह वीर होकर भी दासवृत्ति को अपनाता है। अति अल्प सन्तान युक्त तथा ज्येष्ठ सन्तान अर्थात् प्रथम संतान कन्या होती है। जातक बुद्धि, ज्ञान, विद्या रहित होता है। ऊपर से गिरने या किसी पदार्थ के आघात से उदर पीड़ा जरूर होती है। केतु यदि पाप ग्रहों के साथ हो तो माँ को निश्यच ही कष्ट होता है। शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट होने पर माता का सुख भरपूर होता है। 5 वे वर्ष ऐसे जातक को भाई का वियोग सहन करना पड़ता है।

    केतु के षष्ठ रितु भाव होने पर वात रोगी, वात विकार, तथा जातक झगड़ालू, क्रोधी, आवेशी, भूत- प्रेत-पिशाचजनित कष्ट से पीड़ित व रोगी होता है। जातक कृपण, मितव्ययी, धन संग्रह करने वाला, सुखी अरिष्ट निवारक, निरोग, स्वस्थ, व्याधिरहित होता है। पशुपालक, पशु सुख युक्त, धन-धान्य-ऐश्वर्य संपन्न। स्वजाति में अगुवा व मुखिया, वाचाल, स्त्रीप्रिय, शत्रुनाशक, पर ननिहाल, मामा, मातृ पक्ष से अपमानित होता है। चंद्रमा से युक्त केतु होने पर राजपत्नी, कुलीन स्त्री से संसर्ग करता है। मानरहित व चोर वृत्ति उसकी अवश्य होती है। 21 व 36वें वर्ष मे कलह एवं शत्रु भय उसे अवश्य होता है।

    अष्टम भाव में केतु के रहने पर जातक मंदमति, दुर्बुद्धि युक्त, मूर्ख, शत्रु से भय खाने वाला, भीरु हृदय, सुख-शान्ति रहित तथा शत्रुओं के द्वारा उसके धन की हानि होती है। पत्नी को पीड़ा व नीच या विधवा या क्रोधी स्त्री के संसर्ग करता है। जलघात, जलभय व गुप्त रूप से वह पाप कर्म करता है। जातक निरन्तर भटकाव पूर्ण जीवन-यापन करता रहता है।

    वृश्चिक राशि में ऐसा केतु लाभान्वित करता है। स्त्री चिन्ता से पीड़ित, व्याकुलता व द्विभार्या योग घटित होता है। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरी स्त्री हो गुल्म रोग होता है। पाप ग्रहों के साथ होने पर स्त्री को गण्डगाल रोग व्याप्त होता है। शुभ ग्रह के साथ केतु होने पर एक ही स्त्री होती है। 38 वें वर्ष में स्त्री को कष्ट होता है। जातक मूत्राशय रोग पीड़ित तथा वीर्यनाश से शरीर क्षीण हो जाता है।

    अष्टम रन्ध्र भाव में केतु होने पर दुर्बुद्धि, तेजरहित और दुष्ट जनों का साथ करने वाला होता है। जातक स्त्री द्वेषी, चालाक, गुदा रोग, मस्सा जैसे अर्स रोग से दुखी होता है। नेत्र रोग पीड़ा देता है तथा बार-बार वाहन से चोट लगती है। धन-सम्पत्ति का नाश करता है। कारण-अकारण ही लोगों की नजर में धृणा का पात्र होता है। स्त्री व सन्तान रोगग्रस्त रहती है। अर्थात मेष, वृष, मिथुन, कन्या, वृश्चिक, धनु राशि में होने पर धन का लाभ होता है तथा शुभ ग्रह युक्त होने पर 25 वें वर्ष अरिष्ट फल की प्राप्ति होती है। रन्धे्रश अर्थात् उच्च राशिस्थ या बलवान् ग्रह युक्त होने पर 60 वर्ष की आयु होती है।

    नवम भावस्थ केतु जातक सुखाभिलाषी होता है। इतने पर भी वह व्यर्थ परिश्रम कर शक्ति का हनन करता है अपयश का भागी होता है। बचपन में पिता को व्याधि होती है। समाज में उपहार का पात्र बनकर जीता है। दान-पुण्य, धर्म-कर्म, धार्मिक-पुण्य कार्यों से रहित वह धर्म भ्रष्ट होता है। पुत्र एवं भाइयों की चिन्ता निरन्तर बनी रहती है। बाहु रोग परन्तु कष्ट रहित एवं साधारण कष्ट का भोग करता है। अच्छी मस्तिष्क शक्ति, म्लेच्छ जाति द्वारा जातक भाग्य वृद्धि को प्राप्त करता है। 37 वें वर्ष में पिता को क्लेश-कष्ट होता है।

    दशम भावस्थ केतु के रहने पर जातक पिता से द्वेेष रखने वाला, दुर्भाग्य को प्राप्त तथा मूर्ख, व्यर्थ परिश्रम कर शक्ति क्षीण करने वाला, घोर दर्प, अभिमानी परस्त्रीगामी, दुराचारी, नीच कर्म करने वाला, माता को कष्ट, नेत्र का रोगी तथा राजकोष से पीड़ित होता है। कफ प्रकृति युक्त, रोग तथा उन्हें पितृ सुख का सर्वथा अभाव रहता है। कन्या राशिस्थ केतु में अधिक कष्ट होता है। पिता के दुःख व दुर्भाग्य का कारक बनता है। 1/2/8 राशिस्थ केतु से शत्रुओें का नाश होता है। आशाएं पूर्ण होती है। जातक सुखी व ईश्वर भक्त तथा शुभ ग्रह युक्त होने से सुन्दर स्थान में वास करने वाला, काव्य प्रेमी 45 वें वर्ष शत्रु या शस्त्र का भय होता है।

    एकादश भावस्थ केतु जातक को बृद्धिहीन बनाता है। वह स्वयं अपनी आप हानि करता है वातरोगी, अरिष्टनाशक, मधुरभाषी, विद्वान, दर्शनीय, सुन्दर स्वरूप वाला, भोगी, महातेजस्वी, उत्तम वस्त्राभूषण, सुख युक्त धन-धान्य सम्पन्न, पुत्र सुख रहित, बुरे कुुटुम्ब वाला, गुह्य रोग पीड़ित होता है। ऐसा केतु प्रायः 45 वें वर्ष में धन-पुत्रादि का खूब सुख देता है।

    व्यय भावस्थ केतु अपव्ययी, खर्चीला स्वभाव, चिंतातुर, सनकी, परदेशवासी बनाता है। शत्रुओं पर सदैव विजय प्राप्त करता है । पैर, नेत्र, वस्तिभाग व गुदा रोग से पीड़ित होता है। जातक मोक्षाधिकारी होता है। 45 वें वर्ष स्त्री को पीड़ा होती है। चंचल बुद्धि, धूर्त, ठग, अविश्वासी तथा भूत-प्रेत कार्य द्वारा जनता को ठगने वाला होता है।

    केतु-राशि-फल

    मेष- चचंल, बहुभाषी, सुखी, कष्ट सहिष्णु, कठोर, रोगी, भोग-भीरु, व्याकुल, स्त्री चिन्ता ग्रसित, मामा को कष्ट

    वृष- दुखी, निरुद्यमी, आलसी, वाचाल, धन-संपत्ति की हानि, कुटूम्ब विरोध, राज्य लाभ में बाधक।

    मिथुन- वात विकारी रोग, अल्प सन्तोषी, दम्भी, अल्पायु, क्रोधी, शत्रुहन्ता, विवादी, वक्ता, भाषणकर्ता, भयभीत, व्याकुल।

    कर्क- वात रोग पीड़ित, भूत-प्रेत पीड़ित, माता को कष्ट, धार्मिक क्षति, मित्र या पिता को कष्ट, अस्थिर गति।

    सिंह- बहुभाषी, डरपोक, असहिष्णु, सर्पदश का भय, कलाविद्-कला विज्ञ, उदर में वायु विकार, चोट लगने का भय, विपरीत बुद्धि।

    कन्या- मन्दाग्नि, निरन्तर व सदैव रोगी, मूर्ख, व्यर्थवादी, शत्रुनाश, मातृ सुख से अपमान, गुदा व नेत्र रोग पीड़ित, पशु सुख।

    तुला- कुष्ठ रोगी, दाद-खाज-खुजली से पीड़ित, कामी, क्रोधी, दुखी, मार्ग में क्लेश, स्त्री संबंध में व्याकुलता, चोर भय।

    वृश्चिक- क्रोधी, कुष्ठ रोगी, वाचाल, राजप्रिय, धनोपार्जन में बाधक, कोई-कोई धनी, सन्तान से पूर्ण सुखी।

    धनु- मिथ्यावादी, चंचल, धूर्त, धर्मनाश तीर्थाटन प्रेमी, म्लेच्छ जन से लाभ, बाहु रोग, दान कार्य में निंदा।

    मकर- प्रवासी, घोर परिश्रमी, तेजस्वी, पराक्रमी, पिता को कष्ट, माता का नाश, वाहन से जंघा में चोट।

    कुंभ- कर्ण रोगी, दुखी, भ्रमणशील, अपव्ययी, धनी, भ्रमणकुशल, विद्वान, दर्शनीय, तेजस्वी, उदर रोगी।

    मीन- कर्ण रोगी, प्रवासी, चंचल, कार्यपरायण, संुदर नेत्र, शिक्षित, उत्तम कार्य में व्यय, शत्रुनाश, गुप्तांग रोगी।

    कालसर्प दोष शान्ति हेतु एवं राहु -केतु की शान्ति हेतु इन आदतों को अपने जीवन में अपनायें

    1. किसी भी रविवार को संध्या काल में भैरूजी के मन्दिर जाकर भैरूजी को शराब चढ़ायें।
    2. गरीबों, कुष्ठ रोगियों, रेलवे स्टेशन के आस-पास बैठे भिखारियों को रोटी, बिस्किट या आटे से बनी चीजें दान करें।
    3. दुर्गा के दर्शन कर लाल फूल चढ़ायें।
    4. ऊँ रा राहवे नमः का जाप करें।
    5. यदि आपको राहु की दशा चल रही है एवं आपकी कुण्डली में कालसर्प दोष है तो आपको तुला दान करना चाहिए।
    6. जिस भी शिव मन्दिर में शिवलिंग पर सर्प न चढ़ा हो, उस पर सर्प बनावाकर भेंट करे या चढ़ाये।

    तुला दान किस प्रकार होता है।

    अपने वजन के बराबर गेहूँ तोल कर कुष्ठ रोगियों को दान दे।

    केतु की शान्ति हेतु उपाय

    1. काले कुत्ते को रोटी दान दे।
    2. शिव मन्दिर की ध्वजा बदले।

    यदि आपको ऐसा आभास होता है कि आप किसी रोग से ग्रस्त है एवं विभिन्न जाँचों के बाद भी बीमारी पकड़ में नहीं आ रही हो, तो भैरव मन्दिर में शराब चढ़ा कर रोग मुक्ति हेतु या रोग कारण हेतु प्रार्थना करें। अवश्य लाभ होगा।

    कालसर्प दोष निवारण के उपाय

    मानव की जन्मकंुण्डली में कालसर्प योग (राहु-केतु अन्तर्गत सब ग्रहों का आना) के कारण उसके जीवन में कई बाधाएं उत्पन्न होती है, जैसे कि शादी, संतान में विलंब, विद्याभ्यास मे विक्षेप, दाम्पत्य जीवन में असंतोष, मानसिक अंशांति, स्वास्थ्य हानि, धनाभाव एवं प्रगति में रुकावट आदि।

    इन सबके निवारण हेतु ‘कालसर्प योग’ की श्रद्धा-भक्ति के साथ विधिवत् शांति करनी अति आवश्यक है। इस शांति द्वारा सम्पूर्ण फल-प्राप्ति के साथ जातक कई सुखों का उपभोग कर सकता है।

    ऐसे तो इस शांतिकर्म में किसी भी एक ही धातु से निर्मित ग्यारह नागमूर्तियों की आवश्यकता होती है, पर इन ग्यारह मूर्तियों में नौ मूर्तियां तांबे से बनी हुई हों और अन्य दो मूर्तियां स्वर्ण या चांदी और सीसे या लोहे की बनी हुई हो तो काम चल सकता है।

    यदि ग्यारह मूर्तिया एक ही धातु से बनी हुई उपलब्ध न हों तो सिर्फ तीन मूर्तियां ही बनवा लें (तांबा, चांदी, सुवर्ण सीसा या लोहा) बाकी की आठ मूर्तियों के स्थान पर प्रतीकात्मकरूप सुपारी कर भी शांति विधानकर्म किया जा सकता है।

    यह कालसर्प योग-शांतिकर्म जहां पर उल्लिखित विधि-विधान के अतिरिक्त भी अन्य कई प्रकारों से किया जा सकता है। जैसेः

    1. मोर या गरुड़ का चित्र बनाकर उस चित्र पर नाग विषहरण मंत्र लिखें और उस मंत्र के दस हजार जप कर दशांश होम के साथ ब्राह्मणांे को खीर का भोजन कराएं।
    2. पत्थर की नाग की प्रतिमा बनवा कर उसकी मंदिर हेतु प्रतिष्ठा कर नागमंदिर बनावें।
    3. कार्तिक या चैत्रमास में सर्पबलि कराने से भी कालसर्प योग-दोष निवारण होता है।
    4. अपने नाप का कहीं पर मरा हुआ सर्प मिल जाय तो उसका शुद्ध घी के द्वारा अग्नि संस्कार कर तीन दिन तक सूतक पालें और उसके बाद सर्प बनवा कर दान करें।
    5. एक साल तक गेहूं या उड़द के आटे की सर्पमूर्ति बनाकर पूजन करने के बाद नदी में छोड़ दें और एक साल बाद नाग बना कर दान करें।

    6़. नागपंचमी के दिन सर्पाकार सब्जियां खुद न खाकर, न काट कर बल्कि उनका दान दें और अपने वजन के हिसाब से गायों को घास खिलाकर शिवलिंग की पूजा करें और अपने घर में दीवार पर नौ नाग का सचित्र नागमंडल बनाकर नित्य धूप-दीप के साथ अनंत चतुर्दशी से लेकर पितृश्राद्ध पर्यन्त खीर-नैवेद्य के साथ पूजा के बाद अपनी अनुकूलता के अनुसार कालसर्प दोष की पूजा कराएं।

    इस शांतिकर्म में गौमुख-प्रसव के बाद प्रधान संकल्पानुसार पंचांग कर्म, विशेष देव-मंडल क्रमानुसार देवस्थान, प्रतिष्ठा पूजन आदि कर्म का प्रारंभ करें।

    1. मध्य में मृत्युजंय (महारुद्र्र) स्थापन हेतु लिंगताभद्र।
    2. शेषादि नौ नाग स्थापन हेतु चावलों का अष्टदलात्मक नागमंडल।
    3. ईशान कोण में मनसादेवी की स्थापना।
    4. शेषनाग के दक्षिण (वायु कोना) में काले वस्त्र पर कृष्णपात्र (काली मटकी) समन्वित काले तिलों का राहु स्थापना।
    5. शेषनाग के वामभाग (नैर्ऋत्य कोना) में केतु-स्थापना।

    अब यहाँ पर उल्लखित क्रमानुसार प्रथम महारुद्र की षोडशोपचारी विधिवत् पूजा कर उस शांतिकर्म संलग्न शेषादि नौ नाग, दक्षिणवाम राहु-केतु एवं मनसादेवी की स्थापन, प्रतिष्ठा पूजन आदि कर्म करें। तक्षकादि सहित शेषराज की निम्न क्रमानुसार स्थापना करें।

    नागमंडल (अष्टदल) के मध्य में तीन नाग मूर्तियां शेष के रूप में।

    1. पूर्व-तक्षक, 2. अग्नि-वासुकी, 3. दक्षिण-कर्कोटक, 4. नैर्ऋत्यअनन्त, 5. पश्चिम-शंखपाल, 6. वायु-महापद्य, 7. उत्तर-नील एवं ईशान में, 8. कम्बल। उक्त नागदेवताओं की स्थापना के बाद पंचभूः संस्कारपूर्वक वहिस्थापन, ग्रहस्थापन तदन्तर ग्रहहोम एवं स्थापन क्रमानुसारेण स्थापित देवताओं का प्रधान होम कर शेषकार्य विधिवत् सम्पन्न कर पूर्णाहुति के बाद स्थापित कलशों के जल से यजमान दम्पति पर सर्पो के साथ (पुत्र या पुत्री की शांति हो तो उसके साथ भी) अभिषेक करें।

    नैवेद्य में नौ खण्डात्क नैवेद्य अर्पण करें। आरती में राहु-केतु को परावादी में नौ बत्तियों से आरती उतारें। सब नौ-नौ के हिसाब से सौभाग्यवती स्त्रियां,(शक्य हो तो जोड़ें) कन्याएं, बटुक एवं ब्राह्मणादि को भोजन कराकर वस्त्र-पात्रादि दान के साथ दक्षिणा दें।

    कर्मान्त एक नाग आचार्य को,  दूसरा शिवालय में एवं तीसरा नाग बहते हुए गहरे पानी में छोड़ दें।

    कालसर्प दोष भ्रांतियाँ और वास्तविकता निवारण के मार्ग

    आलेख: राजेश श्रीमाली

     

    आप जब भी किसी ज्योतिषी से मिलते हो और आपकों यह पता चलता है, कि आपकी कुण्डली में कालसर्प दोष है और ज्योतिषी आपको कहता है कि इस कालसर्प दोष की वजह से ही आपके जीवन में ये कठिनाईयां, ये अवरोध, ये चिन्ताएं एवं कष्ट आ रहे है। आप सफलताओं के करीब पहुँच कर भी अन्तिम समय असफल हो जाते हो, तो शायद ऐसा हो सकता हैै कि उस ज्योतिषी की बात आंशिक सत्य ही हो। कालसर्प दोष सदैव कष्ट कारक नहीं होता। आपको जानकर हैरानी होगी की स्वतन्त्र भारत की कुण्डली, पण्डित जवाहरलाल नेहरु की, सन्त मुरारी बापू की कुण्डली, सम्राट अकबर की कुण्डलियों में भी कालसर्प दोष है। कालसर्प दोष कुछ न कुछ अवरोध जातक के जीवन में अवश्य पैदा करता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है की केवल और केवल कालसर्प दोष ही एक मात्र कारण हो।

    कालसर्प दोष क्या है ?

    यदि मैं आपको सरलतम भाषा में समझाऊँ, तो जब राहु और केतु के बीच में सारे ग्रह आ जाये, तो यह कालसर्प दोष कहलाता है। राहु को सर्प का मुख व केतु को पूँछ माना गया है।

    राहु मुख्य रूप से दो प्रकार का माना गया है।

    1. पूवार्द्ध
    2. उत्तरार्द्ध

    पूवार्द्ध के कालसर्प दोष में जातक को जीवन के पहले 46 साल में कष्ट, परेशानियाँ मिलती है।

    पूवार्द्ध के कालसर्प दोष के कुछ उदाहरणः

    उत्तरार्द्ध के कालसर्प दोष मे जातक को जीवन के 46 साल बाद कष्ट, परेशानियाँ मिलती है।

    उत्तरार्द्ध के कालसर्प दोष के कुछ  उदाहरणः

    नोटः विश्वविख्यात ज्योतिषविद्ध डाॅ. नारायणदत्त श्रीमाली ने अपनी विभिन्न पुस्तकों में उत्तरार्द्ध के कालसर्प दोष पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया है या उत्तरार्द्ध के कालसर्प दोष को अस्वीकार किया है।

    इसके पीछे उनका तर्क ये था कि एक लगड़ा व्यक्ति लगड़ेपन के साथ एक समय पश्चात् लगडे़पन का अभयस्थ हो जाता है। उसके जीवन में लगड़ेपन का प्रभाव समाप्त हो जाता है। इसलिए एक आयु पश्चात् उसे यह महसूस होना ही बन्द हो जाता है, कि वह लगड़ा है परन्तु जब कोई व्यक्ति उसे देखता है तो उसके सामने सबसे पहले उस व्यक्ति का लगड़ापन ही आता है।

    ज्योतिष में मुख्य रूप कुल 12 कालसर्प दोष बताये गये है एवं विस्तृत रूप में 12ग12 त्र 144 प्रकार के कालसर्प दोष माने गये है।

    मुख्य रूप से 12 कालसर्प दोष के नाम इस प्रकार है।

    1. वासुकी कालसर्प योग

    तृतीय भाव अर्थात् पराक्रम भाव में नवम भाव के मध्य राहु-केतु के मध्य अन्यान्य सभी ग्रह आने पर ‘वासुकी कालसर्प योग’ घटित होता है।

    इस कुण्डली में देखेंगे राहु वृश्चिक राशि का है जिसका स्वामी मंगल लग्न में नीच के शुक्र के साथ है तथा धनेश नीचस्थ है, भाग्येश होकर एवं अष्टमेश का षडाष्टक है। लाभ भाव पर शनि की दृष्टि है। स्वयं लग्नेश-दशमेश द्वादश भाव में है। गुरु सप्तमेश होकर शत्रु राशिस्थ है एवं जन्म लग्न व चंद्र लग्न से जातक मंगली भी है।

    परिणाम

    1. भाई-बहिन व परिवारजनों से निरन्तर कष्ट उठानें पड़ेंगे।
    2. तृतीय भाव मित्र का होने के कारण जातक मित्रों से धोखा उठायेगा।
    3. गृहस्थ जीवन विशृंखलित रहेगा तथा पति-पत्नी में परस्पर कटुता, अविश्वास, वैमनस्यता, विरोध, भोग से असंतुष्टि रहेगी।
    4. भाग्य कदम-कदम पर आपके साथ चाल चलेगा। भाग्य में निरंतर उठा-पटक तथा भाग्योदय में अनेकानेक बाधाएं आयेंगी।
    5. नौकरी में बाधाएं, उन्नति में रुकावट। राज्य पक्ष से प्रतिकूलता व जातक अनेक बार सस्पेंड होता है।
    6. जातक को विदेश प्रवास में भारी कष्ट उठाने पड़ते है।
    7. कानूनी दस्तावेजों में भावुकतावश हस्ताक्षर कर पछताता है।
    8. जातक में नास्तिक भाव की प्रधानता रहती है।
    9. पद्म कालसर्प योग

    पंचम स्थान से एकादश स्थान तक राहु-केतु के मध्य सभी ग्रह होने पर पद्म काल सर्प योग होता है।

    पंचम भाव सन्तान एवं शिक्षा का तथा एकादश भाव लाभ का है। गुरु यद्यपि उच्च राशिस्थ है तथा स्वगृही चंद्र के साथ है, पर वह शनि से दृष्ट है तथा द्वादश भाव में है।

    सूर्य स्वगृही है पर लग्न पर सूर्य-मंगल दो-दो अग्नि तत्व प्रधान ग्रहों का बल है। शुक्र अपनी नीच राशि में दशमेश होकर तथा अपनी द्वितीय राशि तुला से द्वादश है।

    शनि यद्यपि उच्च राशिस्थ है पर राहु पर दृष्टि तथा भाग्य भाव को नीच दृष्टि से देख रहा है इतना ही नहीं सुख भाव पाप कर्तरी योग के मध्य है। स्वयं दशमेश शुक्र, सूर्य-मंगल व शनि के मध्य पाप कर्तरी योग में है।

    इतना ही नहीं उच्च का गुरु-स्वगृही चंद्र भी केतु-सूर्य-मंगल के मध्य पाप कर्तरी योग कारक है। सप्तम भाव पर पाप दृष्टि है तथा सूर्य-मंगल की शत्रु राशि पर दृष्टि है।

    परिणाम

    1. जातक को गृहस्थ सुख में निरन्तर बाधाएं आयेंगी।
    2. जातक को सन्तान सुख का अभाव रहता है। सन्तान होती ही नहीं और यदि होती भी है तो जी जलाने वाली होती है।
    3. वृद्धावस्था कष्टप्रद व्यतीत होती है-सन्तान दूर चली जाती है या माता-पिता से अलग हो जाती है।
    4. शत्रु कदम-कदम पर अहित करने का सतत प्रयास करता है अथवा शत्रु गोपनीय रूप से इनके मध्य षड्यन्त्र रचता रहता है।
    5. जेल या कारावास भोगना पड़ता है।
    6. गुप्त रोग, गुप्तांग संबंधी रोग जातक को पीड़ा पहुँचाते रहते है। रोग ठीक होना कठिन रहता है। आय का यथेष्ट भाग दवाइयों पर खर्च होता है।
    7. पत्नी चरित्रवान् मिल जाये, इसमें संशय है। स्त्री का चरित्र संदेहस्पद ही बना रहता है।
    8. सच्चे मित्रों का अभाव रहता है। गुप्त शत्रु पीड़ित करते हैं, विश्वासघात होता है।
    9. सट्टे में , जुए में , रेस में, अशुभ कार्यो में भारी हानि उठानी पड़ती है।
    10. कर्कोटक कालसर्प योग

    जब केतु द्वितीय व राहु अष्टम अथवा राहु द्वितीय व केतु अष्टम भाव में हो तो ‘कर्कोटल काल सर्प योग’ होता हैै।।

    यहां देखें द्वादश भाव का स्वामी अपने से द्वादश तथा मंगल के साथ गुरु सुखेश होकर षडाष्टक कर रहा है। चंद्रमा राशि स्वामी अष्टम भावस्थ केतु के साथ ग्रहणयोग कर रहा है। वहीं भाग्य राशि भाव का स्वामी अपनी नीच राशि में है तथा मंगल से दृष्ट है। शनि-शुक्र-बुध अस्त हैं, सूर्य के साथ गुरु, मंगल शनि से दुष्ट हैं। षष्ठेश मारक भाव में है। सप्तमेश बुध का भी षडाष्टक योग है। नौ में से सात ग्रहों का बल अष्टम भाव पर है। शनि अपनी कारक राशि से द्वादश हैं।

    परिणाम

    1. जातक का अपने जीवन में भाग्योदय होता ही नहीं। यदि होता भी है तो बहुत देर से। ‘का वर्षा जब कृषि सुखाने’ भाग्य उदय होता भी है तो भाग्योदय में बार-बार रोड़े अटकते हैै।
    2. नौकरी प्रायः नहीं मिलती। मिलती भी है तो सामान्य तथा नौकरी मंे पदोन्नति नहीं होती है या नौकरी से निकाला जाता है।
    3. अथक प्रयास करने पर भी व्यापार जमता नहीं है तथा व्यापार में निरन्तर घाटा होता हैै, जिससे वह पीड़ित हो जाता है।
    4. चाह कर भी जातक को पैतृक संपत्ति नहीं मिलती, यदि पैतृक संपत्ति मिलती भी है तो नहीं के बराबर।
    5. लम्बी-असाध्य-दुरूह बीमारी भोगनी पड़ती है।
    6. आॅपरेशन-चीर-फाड़-शल्य क्रिया होती है व घाव शीघ्र नहीं भरता है
    7. ऐसे जातक की अकाल मृत्यु हो जाये तो आश्चर्य नहीं मानना चाहिए।
    8. सच्चे मित्रांे का अभाव पाता है। मित्र धन हड़प जाते हैं या धोखा देते हैं अथवा कुमार्गगामी बनाते है।
    9. कुलिक कालसर्प योग

    केतु द्वितीय व राहु अष्टम भाव में हो तो ‘कुलिक कालसर्प योग’ होता है-

    देखें सप्तमेश अष्टम भाव में है। मंगल उच्चस्थ पर मंगल की राशि में चन्द्रमा नीच का है। लाभेश शनि नीच के हैं। सूर्य अपनी नीच राशि में है। भोग कारक शुक्र अस्त है। सुखेश -सप्तमेश बुध अस्त है। अष्टम भाव सूर्य- बुध -राहु- शुक्र- शनि के छः ग्रहों से पीड़ित है। शनि-मंगल परस्पर स्थान-परिवर्तन व परस्पर दृष्टि डाल रहे है। व्ययेश की दृष्टि अष्टम पर व अष्टमेश की दृष्टि मारक भाव द्वितीय पर है। स्वयं षष्ठेश सूर्य अष्टम भाव में नीच राशिस्थ है। गुरु की दृष्टि नीचस्थ चंद्रमा पर है।

    परिणाम-

    1. जातक की स्त्री कुरूप- निर्मोही- अल्पज्ञ – अनपढ़- अतिभोगी- अविश्वासी व वहमी है।
    2. सन्तान सुख में न्युनता रहेगी। पुत्र होकर भी क्रूर-दुष्ट अवज्ञा करने वाले, मन की करने वाले हांेगे अर्थात् जातक का सन्तान-सुख नहीं के समान है।
    3. स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट एवं जातक अपने भविष्य -वृद्धावस्था को लेकर सदैव चिन्तित रहता है। मूत्र रोग, धातु क्षीणता, गुर्दे की बीमारी, मस्से की बीमारी पीड़ा देती है।
    4. जातक अपने जीवन में अनेक स्त्रियों से संसर्ग कर अपमानित होता है।
    5. मित्र कदम-कदम पर धोखा देते हैं। मित्र-पिता-कुटुम्बी जनों का सहयोग नहीं पाता है।
    6. पिता की मृत्यु अल्पायु में हो जाती है।
    7. आर्थिक विषमता, अभाव, धन की न्यूनता पिंड नहीं छोड़ती। अथक परिश्रम निरन्तर संघर्ष करके भी जातक आर्थिक पक्ष नहीं सुधार पाता है। आय की अपेक्षा व्यय अधिक होता हैै।
    8. अपशय-निरादा, अपमान-उपेक्षा -आलोचना से जातक घिरा रहता है।
    9. कौटुम्बिक कलह से जातक पीड़ित रहता है।
    10. महापद्म कालसर्प योग

    जब राहु षष्ठ भाव में व केतु द्वादश भाव में हो तो उक्त ‘महापद्म कालसर्प योग’ की सृष्टि होती है।

    इस कुण्डली में द्वितीय धनभाव मंगल-शनि व सूर्य के मध्य होकर पाप कर्तरी योग बना रहा है। सूर्य पर शनि की दृष्टि है। शुक्र पर मंगल की दृष्टि है। दशमेश अपने से अष्टम है। सप्तम भाव पर शनि की नीच दृष्टि है। बुध का भाग्य भाव से षडाष्टक है तथा धनेश भी मंगल अपने से द्वादश है। गुरु स्वयं अपनी नीच राशि में है तथा गुरु राशिस्थ राहु है।

    परिणाम-

    1. जातक प्रेम-प्रकरण में सर्वथा असफल रहता है तथा गृहस्थ सुख न्युनतम रहता है।
    2. पत्नी का विरह योग सहन करना पड़ता है तथा पत्नी मनोनूकुल नहीं मिलती।
    3. जातक आयु पर्यन्त रोग-शोक-कष्ट-शत्रुओं से घिरा रहता है।
    4. जातक के चरित्र पर बार-बार छींटे लगते है। जातक का चरित्र विशुद्ध नहीं रह सकता।
    5. निराशा की भावना से वह ग्रसित रहता है।
    6. वृद्धावस्था कष्टप्रद रहती है एवं रोगपीड़ित रहता है।
    7. आय में न्यूनता, धर्म क्षति एवं खर्च की बहुलता रहती है।
    8. शंखनाद कालसर्प योग

    जब राहु नवम भाव में और केतु तृतीय भाव में हो और शेष ग्रह इनके मध्य हो तो ‘शंखनाद काल सर्पयोग’ बनता है।

    यहाँ हम देखते हैं कि पंचमेश राहु के साथ भाग्य स्थान पर ग्रहण योग बना रहा है, वहीं भाग्येश षष्ठ भाव में शनि दृष्ट है। जातक का जन्म ही साढे़साती में हुआ है। जहां राहु पर गुरु की दृष्टि तथा लाभ भाव पर गुरु की नीच दृष्टि है, वहीं धन-धान्य-ऐश्वर्य का कारक ग्रह शुक्र अपनी नीच राशि में है तथा अष्टमेश अष्टम से द्वादश है। दशमेश का दशम भाव से षडाष्टक है। लग्न पर बुध की नीच दृष्टि है, शनि-राहु-चंद्र मंगल से दृष्ट है।

    परिणाम-

    1. जातक को भाग्यहीन, दुर्भाग्यशाली, हीन भाग्य कहा जा सकता है।
    2. राज्य पक्ष से प्रतिकूलता, मानहानि, अपमान, अवनति होना संभव है।
    3. पितृ-सुख में न्युनता तथा कार्य व्यापार-व्यवसाय में न्युनता, कम लाभ एवं बार-बार हानि होती रहती है। अथक परिश्रम करके भी व्यवसाय की स्थिति को नहीं संभाल पाता है।
    4. गृहस्थ सुख में बाधा एवं भोग से अतृप्ति रहती है।
    5. तक्षक कालसर्प योग

    जब राहु सप्तम और केतु लग्न में हो तथा सप्तम से लग्न के मध्य सूर्य-चंद्र-मंगल-बुध-बृहस्पति-शुक्र-शनि शेष सभी ग्रह हांे तो ‘तक्षक कालसर्प योग’ होता है।

    गुरु-राहु युति चाण्डाल योग बना रहे हैं तथा दशमेश गुरु राशि से षडाष्टक योग बना रहा है। सूर्य का स्व राशि सिंह से द्वि-द्वादश योग है तथा लाभेश मंगल का लाभभाव से षडाष्टक है। स्वयं लग्नेश बुध का अपनी कारक राशि कन्या से द्वि-द्वादश योग है। शनि अपने प्रबल शत्रु सूर्य की सिंह राशि में है तथा अष्टमेश षडाष्टक योग बना रहा है। पंचम भावस्थ स्त्री ग्रह बुध व शुक्र है। सप्तम भाव पर मंगल की दृष्टि है। शुक्र अपनी राशि से षडाष्टक कर रहे है। सप्तम भाव पर राहु-केतु-गुरु-मंगल का दुष्प्रभाव है।

    परिणाम-

    1. जातक को पुुत्र सन्तान का सर्वथा अभाव रहता है तथा कन्या से मानसिकता नहीं जुड़ती है।
    2. स्त्रीसुख में न्युनता तथा जातक परस्त्रीगामी हो जाये तो कोई आश्चर्य नहीं।
    3. जीवन में भारी उथल-पुथल एवं संघर्षरत रहना पड़ता है।
    4. पैतृक संपत्ति या तो दान दे देता है अथवा नष्ट हो जाती है।
    5. जीवन मे कई बार जेल-यात्रा करनी पड़ती है।
    6. गुप्तांग संबंधी रोग जीवन भर परेशान करते है।
    7. शत्रु पक्ष की प्रबलता पीड़ित करती है।
    8. अनन्त कालसर्प योग

    जब लग्न में राहु एवं सप्तम भाव में केतु हो ओर शेष ग्रह उनके मध्य अवस्थित हो तो ‘अनन्त कालसर्प योग’ होता है।

    जातक की कुण्डली में देखे, मंगल लग्नस्थ राहुयुक्त एवं चंद्र केतुयुक्त है। चंद्र व मंगल दोनों का अपनी राशि से द्वि-द्वादश है। धन भाव पर गुरु की नीच दृष्टि है एवं द्वादश भाव पर गुरु दृष्टि है। चंद्र -केतु ग्रहण योग बनाते हैं सूर्य का स्वराशि से द्वि-द्वादश योग है, वहीं शुक्र षडाष्टक करता है। पंचम भाव पर शनि की दृष्टि अपनी नीच राशि पर है। जातक प्राकृतिक लग्न, सूर्य लग्न व चंद्र्र लग्न तीनों से मंगली है। मंगल पर शनि की दृष्टि भी है। गुरु भी शनि से दृष्ट है।

    परिणाम-

    1. जातक को जीवन में मानसिक शान्ति नहीं मिल सकती है। सदैव ही अशान्त, क्षुब्ध, परेशान, अस्थिर रहेगा।
    2. जातक नीच बुद्धि, दुर्बुद्धि, कपटी, चालबाज, लुच्चा, असत्य भाषणकर्ता, प्रपंची, झूठबोला, षड्यन्त्रों में फंसने वाला होगा।
    3. जातक जीवन भर थानों, कोर्ट-कचहरियों के चक्कर काटता रहेगा।
    4. बार-बार पलट-पलट कर व्यवसाय करेगा एवं बार-बार हानि उठायेगा।
    5. जातक को अपनी पद-प्रतिष्ठा संभालने के लिए आवश्यकता से अधिक संघर्ष करना पड़ता है।
    6. गृहस्थ जीवन इनका शून्यवत् रहता है।
    7. शंखपाल काल सर्प योग

    जब राहु सुखस्थ व केतु कर्मभाव में हो और अन्यान्य ग्रह इनके मध्य हों तो ‘शंखपाल काल सर्प योग’ होता है।

    आप देखेंगे कि इसमे लग्नेश गुरु द्वादश भाव के स्वामी मंगल व केतु के साथ दशम भाव में है तथा राहु-भाग्येश सूर्य-द्वितीयेश शनि से दृष्ट है। सप्तमेश बुध द्वादश भाव में है तथा भाग्येश का अपनी राशि से षडाष्टक है। राहु-शनि अपनी शत्रु राशिस्थ है। चंद्र्र्रमा भी षडाष्टक में एवं शनि-मंगल से दृष्ट है।

    परिणाम-

    1. धन-धान्य-समृद्धि तथा चल-अचल संपत्ति में न्युनता आती है तथा पैतृक संपत्ति प्राप्ति में व्यवसाय उपस्थित होते है।
    2. भाई-बहिन-माता तथा नौकर-चाकरों से व्यवधान-परेशानी व बाधाएं आती रहती है।
    3. नौकरी एवं व्यवसाय में उतार-चढ़ाव, उत्थान-पतन का सामना करना पड़ता है।
    4. स्वास्थ्य प्रायः बिगड़ा रहता है।
    5. शिक्षा प्राप्ति में बाधाएँ आती है एवं शिक्षा पूर्ण नहीं होती है।
    6. पातक कालसर्प योग

    जब राहु दशम व केतु चतुर्थ भाव में हो एवं अन्य ग्रह इनके मध्य हों तो ‘पातक कालसर्प योग’ होता है।

    आप देखेंगे कि इनमें लाभेश शुक्र नीचाभिलाषी है तथा षष्ठेश है। धन भाव पर गुरु अर्थात् लग्नेश सुखेश की नीच दृष्टि है। शनि अपने प्रबल शत्रु अपने प्रबल शत्रु सूर्य भाग्येश के साथ सप्तम भाव में है। द्वादशेश मंगल शत्रु के साथ शनि दृष्ट है तथा बुध का दशम् भावाधिपति होकर षडाष्टक है। गुरु पाप कर्तरी योग के अन्तर्गत सूर्य-शनि-मंगल के मध्य है। चंद्रमा अष्टमेश होकर षष्ठ भाव में है।

    परिणाम-

    1. जातक का सम्पूर्ण जीवन विघ्न-बाधाग्रसित रहता है तथा नौकरी व व्यवसाय संबंधी अथक प्रयास करने पर भी सफलता नहीं मिलती है एवं भटकावपूर्ण जीवन यापन करता है।
    2. व्यापार में कदम-कदम पर मित्र धोखा देते हैं एवं जातक हानि उठाता है।
    3. सन्तान होकर भी निरन्तर रोग-ग्रस्त पीड़ित रहती है।
    4. नाना-नानी अथवा दादा-दादी का वियोग सहना पड़ता है।
    5. माता-पिता का विरहजन्य कष्ट सहन करना पड़ता है।
    6. शेषनाग कालसर्प योग

    जब राहु बारहवें एवं केतु षष्ट भाव में हो एवं अन्य सभी ग्रह इनके मध्य हो तो ‘शेष नाग फल सर्प योग’ होता है।

    देखें, राहु-चन्द्र ग्रहण योग द्वादश भाव में बना रहे हैं तथा जातक का जन्म ही साढ़े-साती मे हुआ है। शनि-चंद्र्र-राहु पर मंगल की दृष्टि है। लाभेश अपनी नीच राशि में है तथा लग्नेश गुरु का लग्न से षडाष्टक है।

    परिणाम-

    1. जातक गुप्त शत्रुओं से सदैव पीड़ित रहेगा।
    2. शरीर सुख न्युनतम रहता है तथा स्वास्थ्य प्रायः बिगड़ा रहता है।
    3. लड़ाई-झगड़े-कोर्ट-कचहरी में प्रायः जातक की हार होती है।
    4. जातक कदम-कदम पर अपनों से बदनाम होता है। पर मृत्युपरान्त इनका नाम होता है।
    5. जातक के बायीं आँख का जीवन में आॅपरेशन होता है।
    6. विषाक्त कालसर्प योग

    जब राहु एकादश भाव में व केतु पंचम भाव में हो व शेष ग्रह इनके मध्य हों तो ‘विषाक्त कालसर्प योग’ होता है।

    इस योग में देखें लग्नेश उच्च राशिस्थ होकर भी द्वादश भाव पर नीच दृष्टि है तथा लाभ भावस्थ राहु पर लाभेश अष्टम भाव में शनि के साथ है। धनेश मंगल अपनी नीचराशि में सप्तमेश होकर दशम् भाव में शनि दृष्ट है। दशमेश का सप्तमेश से परस्पर परिवर्तन है। पराक्रमेश गुरु का पराक्रम भाव से दृष्ट है।

    परिणाम-

    1. जातक अपनी आजीविका के लिए घर-परिवार से दूर रहता है।
    2. भाइयों से भरपूर विवाद, कोर्ट-कचहरी का सामना करना पड़ता है और विशेष रूप से बड़े भाई से।
    3. नेत्र रोग, हृदय रोग जैसे रोग से पीड़ित रहता है।
    4. जातक अनिद्रा जैसे रोग से पीड़ित रहता है। सब मिलाकर जातक का शरीर रोग से जर्जर हो जाता है।
    5. जीवन की इहलीला रहस्ममय तरीके से समाप्त होती है।

    कालसर्प दोष होते हुए भी किन कारणों से कालसर्प दोष का प्रभाव कम हो जाता है।

    1. जब द्वादश भाव या द्वितीय भाव में शुक्र हों।
    2. जब लग्न या केंद (4, 7, 10) में बृहस्पति हो।
    3. जब बुधादित्य हो।
    4. जब दशम मंगल हो।
    5. जब मालव्य योग अर्थात् केंद्र में स्वगृही या उच्च का शुक्र हो।
    6. जब केन्द्रस्थ स्वगृही मंगल -रुचक योग’ की सृष्टि करता हो।
    7. जब शनि उच्च राशिस्थ तुला में होकर लग्न या केन्द्र में होकर ‘शशक योग’ बना रहा हो।
    8. चंद्र$मंगल की युति केन्द्र में हो पर मंगल मेष, वृश्चिक या मकर का हो एवं चन्द्रमा उसके साथ होकर लक्ष्मी योग बनता हो।
    9. जब पंच महायोग में से कोई एक महायोग हो।
    10. जब चार ग्रहों की कहीं केन्द्र 1, 4, 7, 10 वें भाव में युति हो और उसके साथ एक ग्रह शुक्र, गुरु, शनि, मंगल, सूर्य, चंद्र में से स्वगृही अथवा उच्च राशिस्थ हो।

    यदि कालसर्प दोष की कुण्डली है एवं राहु निम्न भावों में बैठकर कालसर्प दोष की कुण्डली बनाता है, तो निम्न भावों से राहु इस प्रकार परिणाम देगा।

    राहु लग्नस्थ होने पर जातक पूर्णरूपेण दुष्ट, घोर स्वार्थी, राजद्वेषी, नीचकर्मरत, मनस्वी, कृशकाय, दुर्बल, क्षीण शरीर, कामान्ध, काम पिपासु, अल्पसन्तति युक्त, घोर साहसी, दम्भी, अपने कहे वचनों पर दृढ़ रहने वाला, स्व वचनपालक, स्वकार्य दक्ष, चतुर, बहु रोगी, धर्म रहित या अधर्मी, मित्रों से द्वेष एवं विरोध रखने वाला, वादापवाद में सदैव विजयी, स्वजनों से दूर या स्वजन वंचक, सन्तानहीन या सन्तानद्वेषी होता है तथा उसकी स्त्री को बार-बार गर्भ की क्षति होती है। वैद्य, डाॅक्टर, हकीम, देह विशेषज्ञ, संगीत प्रेमी, शरीर में वेदना का रोग, मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, मकर, राशिस्थ होने पर राज्य सेवा या नौकरी से यथोचित लाभ प्राप्त करता है। भोगी, भोगप्र्रिय, विलासी, अनुचित संबंध बनाने वाला तथा सहानुभूतिपूर्ण होता है। मेष, कर्क, सिंह राशिस्थ राहु विशेष स्वर्ण लाभ प्रदान करता है। राहु पर यदि चंद्र, बुध, गुरु, शुक्र की दृष्टि हो तो मुँह पर चिन्ह होता है तथा पांचवां वर्ष घातक होता है।

    यदि राहु धन भावस्थ है तो जातक परदेशवासी, परदेशगामी, विदेशाटन करने वाला, अति अल्प सन्तति युक्त, कुटुम्ब सुख से रहित, दुष्ट भाषा का प्रयोग करने वाला, दुष्टभाषी, अल्पधनी या निर्धन, आजीवन घोर संघर्ष करने वाला, निंदक, वंचक, निंदनीय भाषा का प्रयोग करने वाला, घुमक्कड़, भ्रमणशील जीवन यापन करने वाला, सन्तान और प्रधानतः पुत्र सन्तान से पीड़ित, चिन्तायुक्त, धन-धान्य-समृद्धि रहित, कठोर, मात्सर्ययुक्त, मांसभक्षी, मांस-मछली चर्म, नखादि क्रय-विक्रय द्वारा लाभान्वित, पाप ग्रहों के साथ राहु होने पर ओठ मे चिहृ तथा बारहवें वर्ष धन की विशेष हानि होती है, धननाश होता है। राज कोप का भाजन बनता हैै।

    तृतीय भावस्थ राहु होने पर वह जातक योगाभ्यासी, योग चर्चा में भाग लेने वाला, विवेकशील व दृढ़ विवेकी, अरिष्टनाशक, प्रवासी, परदेशगामी, धन-धान्य-ऐश्वर्य सम्पन्न, विद्वान एवं विद्वानों का संग करने वाला, अवसरवादी एवं अवसर का लाभ उठाने वाला, व्यवसाय प्रेमी, यशस्वी पराक्रमी, दृढ़ मतावलंबी, ऐश्वर्यशाली, सुख-सुविधा संपन्न, साहसी, बहुशत्रु युक्त या शत्रु पालक, पर सदैव शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। वह कान की पीड़ा से परेशान होता है। समय से पूर्व स्मरण-शक्ति क्षीण हो जाती है। याददास्त कमजोर हो जाती है। ऐसे जातक के भाइयों व शत्रुओं की मृत्यु होती है। प्रायः वह भ्रातु-सुखहीन होता है। शुभ ग्रह से युक्त होने पर कण्ठ मे चिन्ह होता हैै। 12-13 वर्ष मे भातृ-सुख विशेष होता हैै।

    सुख भावस्थ राहु होने पर जातक असन्तुष्ट रहता है। प्रायः दुखी होता है। माता के कष्ट या माँ को कष्ट होता है। जातक क्रूर, दंभी, पेट दर्द या उदर व्याधि युक्त होता है। झूठा, प्रपंची, आडम्बरी, मिथ्या भाषण करने वाला, मित्र, दोस्त, पुत्र एवं आत्मीय जनों के सुख से रहित होता है। ऐसे जातक के या तो माताएँ होती हैं अथवा दो स्त्रियाँ होती है। वस्त्राभूषण युक्त, नौकरी-चाकरों के सुविधा से वह सम्पन्न होता है। 1/2/4 अर्थात् मेष, वृष, कर्क राशिस्थ होने पर बंधुसुख होता है। ऐसा न होने पर वह बंधु जनों से पीड़ित होता है। पाप ग्रहों का साथ होने पर माता को कष्ट अवश्य पहुंचाता है। चतुर्थ राहु होने पर 8 वे वर्ष भाई को हानि पहुंचना अवश्यंभावी है।

    पंचम भावस्थ राहु होने पर जातक मंद बुद्धि, अल्पज्ञ, धन-धान्य संपत्ति रहित, निर्धन, अल्पायु में ही उसे सन्तान की प्राप्ति होती है। जातक संचित सम्पत्ति व पैतृक सम्पत्ति का नाश करता है तथा कुलनाशक होता है। सन्तान का या तो अभाव होता है अथवा सन्तान की बार-बार हानि होती है। जातक नीच कर्म करने वाला, कुमार्गी, महा आवेशी व क्रोधी, मित्ररहित होता है। वह कुटिल चाल चलने वाला षड़यन्त्रकारी, मतिभ्रम, दुर्बुद्धि? कुटिल, भ्र्रान्त चित्त, वायु रोग पीड़ित, उदर शूल रोग, राज कोप से बार-बार दण्डित होता है। वह अत्याचारी अपनों का अहित करने वाला, पर भाग्यशाली, श्रेष्ठ कार्यकर्ता, परिश्रमी, शास्त्रज्ञ व शास्त्रप्रेमी, नाग देव, नाग पूजा व विष्णु पूजा द्वारा इन्हें संतान विशेषकर पुत्र की प्राप्ति होती है। कर्क राशिस्थ राहु पंचम होने पर पुत्र प्राप्ति व सुख संभव है। ऐसा न होने पर दीन-हीन, निर्धन, मलिनपुत्र उत्पन्न कर पीड़ित होता है। सिंहस्थ राहु मंे यदा-कदा पुत्र देखने में आता है। पंचम भावस्थ राहु 5 वें वर्ष बंधु हानि देता है।

    रोग-शत्रु भावस्थ अर्थात् षष्ठ भाव में राहु विधर्मियों के द्वारा जातक को लाभ प्रदान करता है। जातक सबल, स्वथ्य निरोग होकर शत्रुहन्ता होता है। शत्रु इनके सामने टिक नहीं सकता। वह कमर के दर्द से प्रायः सदैव पीड़ित रहता है। अरिष्टों का नाश करने वाला, पराक्रमी, गंभीर, सर्वथा हर प्रकार से सुखी, ऐश्वर्य संपन्न, विद्वान् तथा बली नीच जन, म्लेच्छ, नीचकर्मी लोगों से प्रभुता प्राप्त करता है। जातक अपने जीवन में कई एक बड़े-बडे़ कार्य सम्पन्न करता है। राजवत् प्रतिष्ठित और शत्रु पर अनायास ही विजय प्राप्त करता है और धनार्जन करता है। ऐसा जातक स्त्री सुखरहित या स्त्रीहीन, पशु भय से ग्रस्त, चचेरे या फूफेरे भाइयों का सुख पाने वाला। चन्द्रमा से युक्त ऐसे राहु में राजरानी से भोग करने वाला, चोर धनहीन होता है। 21 व 37 वें वर्ष कलह व शत्रुभय से भारी पीड़ा प्राप्त करता है।

    सप्तम भावस्थ राहु करने पर जातक स्त्री नाशक तथा व्यापार में वह निरन्तर व बार-बार हानि उठाता है। जातक भ्रमणशील जीवन व्यतीत करता है। वह वात रोड़ पीड़ित, दुष्कर्मी स्वकार्य चतुर, लोभी, कृपण तथा जननेन्द्रिय रोग से पीड़ित होता है। प्रमेह, सुजाक, गुप्तरोग उसे पीड़ित करते है। अपने जीवन में वह विधवा स्त्री से संसर्ग जोड़ता है। विवाह के समय उसकी स्त्री रोगग्रसित, रोगपीड़ित होती है। द्विभार्या योग होता है तथा प्रथम स्त्री को रक्त संबंधित रोग पीड़ित करता है तथा दूसरी स्त्री से यकृत विकार होता है। स्त्री वंचक व कलहप्रिय होती है। क्रोधी, दंभी, मनमानी करनेवाली स्त्री सदैव विवादों में घिरी रहती है। वह प्रचण्ड रूपा, अपव्ययी, खर्चालु स्वभाववाली होती हैै तथा पति-पत्नी में सदैव वादापवाद होता ही रहता है। पापयुक्त राहु स्त्री कुटिला, पापिनी, दुःशीला, गण्डमाक रोग से पीड़ित द्विभार्या का संयोग होता है। परन्तु शुभ ग्रह युक्त होने पर पूर्वोक्त दोष नहीं होते है। द्विभार्या योग भी कम देखने में आता है। 30 वें वर्ष में स्त्री मे भारी दैहिक कष्ट होता है।

    अष्टम भावस्थ राहु शारीरिक दृष्टि से जातक को हृष्ट-पुष्ट, स्वस्थ, निरोग तथा पुष्ट देह रखता है। जातक गुप्त रोगी, क्रोधी, व्यर्थ भाषी, वाचाल पर मूर्ख उदर व्याधि युक्त, काम पीड़ित, झगडालू, पापी, गुदा, प्रमेह अण्डकोष वृद्धि, अर्श रोग से पीड़ित रहता है। 32 वां जीवन आशा क्षीण करता है। शुभ युक्त राहु होने पर 25 वें वर्ष जीवन आशा की आशंका रहता है। बलवान् ग्रह के साथ अष्टमेश होने पर 60वें वर्ष मृत्यु भय या मृत्युतुल्य कष्ट होता है।

    नवम अर्थात् भाग्य भाव में राहु होने पर जातक धर्मात्मा परन्तु दुर्बुद्धि, नीच, धर्मानुरानी, पवित्रता रहित, धर्म-कर्म से रहित, मंद-बुद्धि, दुर्बुद्धि, अल्प सुखभोगी होता है। भ्रमणशील, दरिद्र तथा बंधु जन रहित होकर जीवन-यापन करता है। इनकी स्त्री निःसन्तान होती है। अनुदार। अधार्मिक धर्म-कर्म रहित होती है। 19 व 29 वें वर्ष ऐसा राहु पिता के लिए भारी अरिष्टकारक होता है अर्थात् पिता को कष्ट पहंुचाता है। जातक प्रवासी, आंत्ररोगी, व्यर्थ का परिश्रम करने वाला होता है तथा भाग्यहीन होता है।

    दशम भावस्थ राहु होने पर जातक महा आलसी, कामचोर, बहुभाषी अर्थात् वाचाल, नियमित कार्य न करने वाला अर्थात् अनियमित कार्यकर्ता, विश्रृंखलित जीवन, लोभी, कृपण, मितव्ययी, अर्थ को प्रधानता देने वाला, संतान के लिए कष्टकारक होता है। जातक विद्वान, शुरवीर, धन-धान्य-ऐश्वर्य संपन्न, धनी पर रोगी, वात-पीड़ित, शत्रुओं का बल नष्ट करने वाला, मन्त्री या दण्डाधिकारी, न्यायाधीश, पुर या ग्राम समूह का नेता या नायक, काव्य-नाटक-छन्द शास्त्र का ज्ञाता, रसिक शिरोमणि, घुमक्कड़, भ्रमणशील, पर पितृ सुख से रहित, वस्त्र व्यवसाय में दक्ष, निर्माता होता है। ऐसा मीन राशिस्थ राहु गृहादि सुख युक्त, काव्य विनोदी, शास्त्रज्ञ होता है। 54 वें वर्ष में शस्त्र या शत्रु द्वारा उसके जीवन मंे भारी संकट उपस्थित होता है। 1/2/3/4/5/6/10/12 राशिस्थ अर्थात् मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, मकर, मीनस्थ राहु प्रायः शुभ फल प्रदान करता है। बलवान् शत्रु से कलह उत्पन्न होता है। चन्द्र-राहु मिलकर उत्तम राजयोग होता है।

    ग्यारहवें भाव में राहु थोड़ा-थोड़ा न्युनाधिक लाभ प्रदान करता है। स्वकार्य में उसे सफलता प्राप्त होती है कि वह स्वकार्य दक्ष होता है। धन-धान्य-सुख-सम्पन्नता युक्त एवं राजद्वार से धन एवं पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। वास्त्राभूषण, अन्न-धन-लक्ष्मी-भृत्यादि का जीवन में सुख प्राप्त करता है। पशु-वाहन सुख से युक्त एवं युद्ध में, विवाद में, कोर्ट-कचहरी के कार्यो में उन्हें प्रायः विजयश्री प्राप्त होती है। अच्छी-भली संतान से युक्त, म्लेच्छ शासक के द्वारा वह बार-बार सम्मानित होता है। 45 वे वर्ष में पुत्र तथा धन का अतुल सुख होता है। मन्दगति, लाभहीन, घोर परिश्रमी, अरष्टिनाशक, सन्तान के कष्ट तथा व्यवसाय में सफल होता है।

    द्वादश भावस्थ राहु जातक को नीच वृत्ति, कपटी, दुराचारी, कृतघ्न तथा घमण्डी, दम्भी, लोभी, कृपण, नेत्र पीड़ित, चर्मरोग पीड़ित, कोढ़ी, प्रवासी, घर-परिवार से दूर ले जाता है। उसके पैर में चोट लगती है तथा पत्नी सदैव चिन्तातुर रहती है। न्युनतम सन्तान तथा 45 वें वर्ष में स्त्री को भारी दैहिक पीड़ा होती है। जातक मति मंद, मूर्ख, मेहनती, परिश्रमी, सेवक निरन्तर चिन्ता करने वाला और काम पीड़ित होता है।

    राहु-राशि-फल

    मेष- पराक्रम हीन, आलसी, अविवेकी, अतिचारी, शिरपीड़ा युक्त, कामाग्नि पीड़ित विवाद मंे विजयी, दीर्घ रोगी।

    वृष- सुखी, चंचल, धन-धान्य संपन्न-कपट-शूरवीर, वाचाल, धन-नाशक, दरिद्र, मित्रों की बात न मानने वाला

    मिथुन- योगाभ्यासी, गायक, बलवान, दीर्घायु, बाहुबली, प्रतापी, विश्वबंधु, बुद्धि चातुर्य युक्त, विवेकी।

    कर्क- उदर रोगी, धनहीन, कपटी, पराजित, मित्रों से सुखी, स्त्री प्राप्ति, माता-पिता का क्लेश, शीत-वात-विकार।

    सिंह- चतुर, नीतिज्ञ, सत्पुरुष, विचारक, सन्तान की चिन्ता अधिक, राजदण्ड, भय भूख से मृत्यु, कुक्षि पीड़ा।

    कन्या- लोकप्रिय, मधुर भाषी, कवि, लेखक, गायक, कोई बुद्धि-बल से हीन शत्रु या रोग का विनाश।

    तुला- अल्पायु, दन्त रोगी, अल्प धनाधिकारी, कार्य कुशल, स्त्री की हानि, अग्नि या वायु से कष्ट, सन्तप्त।

    वृश्चिक- धूर्त, निर्धन, रोगी, धन नाशक, राज्य या विद्वानों से सम्मानित, धनी लोक विरोधी-ग्रन्थि रोग से पीड़ित।

    धनु- बाल्यावस्था में सुखी, दत्तक जाने वाला, मित्र द्रोही, दृढ़ संकल्पी, व्रतग्राही बंधुओं पर अति स्नेही।

    मकर- मित्र द्रोही, मितव्ययी, कृृपण कुटुम्ब रहित, धन-मान, प्रताप, सुखादि की क्षीणता, जलभय।

    कुंभ- मितव्ययी, कुटुम्ब रहित, दन्त रोगी, विद्वान, लेखक, उपदेश से कल्याण, परदेश में प्रतिष्ठा, शत्रु नाश।

    मीन- आस्तिक, कुलीन, शान्त, कला प्र्रेमी, दक्ष, धन संचय में विघ्न, उच्च स्थान से गिरने का भय, भ्रमण मंे असफलता।

    राहु-दृष्टि-फल

    यदि लग्न पर राहु की दृष्टि हो तो जातक शरीर सुख रहित, सदैव रोगी और चेचक आदि द्वारा मुंह पर चिन्ह होते है।

    द्वितीय भाव पर दृष्टि हो तो कौटुम्बिक कष्ट 8 या 14 वर्ष मे जलभय तथा पापावादी से मृत्यु तुल्य कष्ट होता है।

    तृतीय भाव पर राहु की दृष्टि होने पर पराक्रम द्वारा धन लाभ सफलता, धन से सुखी, पुत्र को कष्ट, चोर -अग्नि-सर्प-राज्यादि से भय होता है। भाई के द्वारा सुख हानि अथवा सहोदरों को कष्ट होता है।

    चतुर्थ भाव पर यदि दृष्टि हो तो माता को कष्ट, पुण्य भाव का उदय, म्लेच्छ जन द्वारा भाग्योदय, सर्वत्र विजय, कुक्षि या उदर मंे दारुण दुःख और भाई या मित्र को पीड़ा होती है।

    पंचम भाव पर राहु की दृष्टि का अर्थ है, सन्तान को कष्ट, अल्प भाग्य युक्त कभी राज्य पक्ष द्वारा विजयी, श्रम करने पर भी विद्या निष्फल या अल्प विद्या-मंदबुद्धि, स्मरण शक्ति रहित और जीवन भटकाव पूर्ण व्यतीत करता है।

    षष्ठ भाव पर राहु की दृष्टि का अर्थ है शत्रु का नाश, दुष्ट ग्रह के साथ होने पर धन का हानि, दुष्टों द्वारा धन की क्षति, गुणी, विनम्र बल और वीर्य की हानि होती है।

    सप्तम भाव पर राहु की दृष्टि होने से भोग में अधिक रूचि, कामदेव की जागृति अधिक, स्व वचनों का सिद्ध करने वाला, हठी, निडर, जिद्दी तथा इसकी दशा में स्त्री की मृत्यु अथवा स्वयं को दैहिक कष्ट होता है।

    नवम भाव पर दृष्टि होने से नव वधु का भोगी, भाइयों द्वारा कष्ट, पुत्र धन से सुखी होता है। मित्र पीड़ा, म्लेच्छ शासक द्वारा उन्नत्ति व विजय पाता है।

    दशम भाव पर राहु की दृष्टि होने पर कार्य में सफलता, बाल्यावस्था में पिता की मृत्यु, माता को थोड़ा-सा सुख प्राप्त होता है।, किसी-किसी की माता दीर्घायु पाने वाली और कार्य व्यवसाय में जातक हानि उठाता है।

    लाभ भाव पर राहु की दृष्टि पूर्णायु, धन-धान्य से संपन्नता, राज्य से लाभ व सुख और उन्नति के लिए सतत क्रियाशील रहता है।

    व्यय भाव पर राहु की दृष्टि जातक को कृपण, दान-पुण्य रहित, युद्ध में शत्रु का विनाशक, विफलता युक्त पर कोई-कोई सुखी भी होता है। कामी, वधिर तथा कुल का नाशक होता हैै।

    कालसर्प दोष की कुण्डलीयों में केतु का भाव अनुसार प्रभावः

    लग्न भाव में केतु होने पर जातक दुर्बल शरीर-कृश काय, कमर में पीड़ा रहती है। जातक वात रोग से पीड़ित, उद्विग्न चित्त, खिन्न, उदार, परेशान, स्त्री चिन्ता से पीड़ित, झूठा, प्रपंची, दम्भी, मिथ्याभाषी तथा चंचल एवं भीरु हृदय, दुराचारी, महामूर्ख, अनेक शत्रुओं से पीड़ित होता है। उसके हाथों-पांवों से पसीना खूब निकलता है। केतु पर किसी शुभ या पाप ग्रह की दृष्टि हो तो मुंह पर या मुंह में चिन्ह होता है। 5 वां वर्ष उसके जीवन में महा कष्टप्रद कष्टकारक होता है। कार्य में निरन्तर असफलता व हानि होती है। शरीर कष्ट एवं मध्यायु में मृत्यु तुल्य कष्ट होता है। परन्तु वृश्चिक राशि में केतु हो तो वह सुखकारक होता है।

    द्वितीय भाव में केतु होने पर जातक दुष्टात्मा, अशोभनीय-अशुभ कर्म में तत्पर, कुटुम्ब का विरोधी, मुख रोग से सर्वदा पीड़ित, नीच-दुष्ट दुर्बु़िद्ध लोगों का साथ करने वाला, जाति, धर्म, स्वजन, आत्मीय जनों या सभी लोगों का विरोधी, स्पष्ट वक्ता, राज पक्ष से सदैव भय खाने वाला, विरोधी लोगों का घृणापात्र, राजकोष से धन- ध्यान- ऐश्वर्य-संपत्ति की क्षति उठाने वाला होता है। यदि केतु स्वगृही सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु 5/6/8/9 राशि गत हो अथवा शुभ ग्रह की राशि में हो तो सुख-सम्पन्नता युक्त होता है। परन्तु 12 वें वर्ष में भारी धन की हानि उसे उठानी पड़ती है।

    केतु यदि तृतीय भाव में हो तो भातृभाव, पराक्रम भाव में हो तो महा तेजस्वी, उसे बहनोई की सदैव चिन्ता लगी रहती है। जातक भोगी धन-धान्य-ऐश्वर्य सम्पन्न बलवान्, स्थिर चित्त वृत्ति रहित, चपल, चंचल, वात रोगी, रूक-रूककर बोलने वाला, व्यर्थ के प्रपंचों व वादापवाद में उलझनेवाला, भूत-प्रेत से भय खाने वाला, सर्व जन प्रिय पर मानसिक रूप से चिन्तातुर होता है। उसे भाईयों के सुख का अभाव रहता है। बहिन का भरपूर सुख प्राप्त होता है। परन्तु परिस्थितिजन्य दोष के कारण सदैव उदासीन वृत्ति अपनाए रहता है। शुभ ग्रह या ग्रहों के साथ होने पर कण्ठ में चिन्ह होता है। 12-13 वर्ष में भाई का सुख होता है। चन्द्रमा के साथ होने पर दो भाइयों का सुख होता है। अन्य भाइयों की मृत्यु हो जाती है। 36 वें वर्ष में भाइयों को कष्ट होता है। लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

    केतु यदि चतुर्थ भाव में हो तो जातक को माँ का सुख प्राप्त नहीं होता हैं। उसका कोई मित्र नहीं होता। यदि मित्र हो तो भी मित्रों से दुखी होता है। पिता के लिए सर्वथा कष्टकारक, भातृरहित तथा चलायमान मनोवृत्ति रहती है। जातक वाचाल, बहुभाषी व कार्यहीन, कार्य के प्रति निरुत्साही बना रहता है। कलहप्रिय तथा ब्राह्मण वर्ग द्वारा कष्ट पहुंचता है। उसके भाई रोगी तथा क्षीण काय व दुर्बल होते है। सिंह और वृश्चिक राशिस्थ केतु हो तो माता-पिता और मित्रों से सुख प्राप्त होता है। परन्तु यह सुख अल्प अवधि तक रहता है। धनु राशि का केतु हो तो मिश्रित फल की प्राप्ति होती है। पाप ग्रहों से युक्त केतु माता के लिए कष्टप्रद रहता है। सुख देता है शुभ ग्रह युक्त केतु 1/8 वें वर्ष में भाई को कष्ट संभव है।

    पंचम भावस्थ केतु कुबुद्धि, कुचाली, वाचाल, धूर्त, चालबाज, षड्यन्त्रकारी, वातरोगी तथा विदेशगामी बनाता है। ऐसा जातक सुखी, बलवान, बन्धुजनों से पे्रम करने वाला होता है। वह वीर होकर भी दासवृत्ति को अपनाता है। अति अल्प सन्तान युक्त तथा ज्येष्ठ सन्तान अर्थात् प्रथम संतान कन्या होती है। जातक बुद्धि, ज्ञान, विद्या रहित होता है। ऊपर से गिरने या किसी पदार्थ के आघात से उदर पीड़ा जरूर होती है। केतु यदि पाप ग्रहों के साथ हो तो माँ को निश्यच ही कष्ट होता है। शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट होने पर माता का सुख भरपूर होता है। 5 वे वर्ष ऐसे जातक को भाई का वियोग सहन करना पड़ता है।

    केतु के षष्ठ रितु भाव होने पर वात रोगी, वात विकार, तथा जातक झगड़ालू, क्रोधी, आवेशी, भूत- प्रेत-पिशाचजनित कष्ट से पीड़ित व रोगी होता है। जातक कृपण, मितव्ययी, धन संग्रह करने वाला, सुखी अरिष्ट निवारक, निरोग, स्वस्थ, व्याधिरहित होता है। पशुपालक, पशु सुख युक्त, धन-धान्य-ऐश्वर्य संपन्न। स्वजाति में अगुवा व मुखिया, वाचाल, स्त्रीप्रिय, शत्रुनाशक, पर ननिहाल, मामा, मातृ पक्ष से अपमानित होता है। चंद्रमा से युक्त केतु होने पर राजपत्नी, कुलीन स्त्री से संसर्ग करता है। मानरहित व चोर वृत्ति उसकी अवश्य होती है। 21 व 36वें वर्ष मे कलह एवं शत्रु भय उसे अवश्य होता है।

    अष्टम भाव में केतु के रहने पर जातक मंदमति, दुर्बुद्धि युक्त, मूर्ख, शत्रु से भय खाने वाला, भीरु हृदय, सुख-शान्ति रहित तथा शत्रुओं के द्वारा उसके धन की हानि होती है। पत्नी को पीड़ा व नीच या विधवा या क्रोधी स्त्री के संसर्ग करता है। जलघात, जलभय व गुप्त रूप से वह पाप कर्म करता है। जातक निरन्तर भटकाव पूर्ण जीवन-यापन करता रहता है।

    वृश्चिक राशि में ऐसा केतु लाभान्वित करता है। स्त्री चिन्ता से पीड़ित, व्याकुलता व द्विभार्या योग घटित होता है। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरी स्त्री हो गुल्म रोग होता है। पाप ग्रहों के साथ होने पर स्त्री को गण्डगाल रोग व्याप्त होता है। शुभ ग्रह के साथ केतु होने पर एक ही स्त्री होती है। 38 वें वर्ष में स्त्री को कष्ट होता है। जातक मूत्राशय रोग पीड़ित तथा वीर्यनाश से शरीर क्षीण हो जाता है।

    अष्टम रन्ध्र भाव में केतु होने पर दुर्बुद्धि, तेजरहित और दुष्ट जनों का साथ करने वाला होता है। जातक स्त्री द्वेषी, चालाक, गुदा रोग, मस्सा जैसे अर्स रोग से दुखी होता है। नेत्र रोग पीड़ा देता है तथा बार-बार वाहन से चोट लगती है। धन-सम्पत्ति का नाश करता है। कारण-अकारण ही लोगों की नजर में धृणा का पात्र होता है। स्त्री व सन्तान रोगग्रस्त रहती है। अर्थात मेष, वृष, मिथुन, कन्या, वृश्चिक, धनु राशि में होने पर धन का लाभ होता है तथा शुभ ग्रह युक्त होने पर 25 वें वर्ष अरिष्ट फल की प्राप्ति होती है। रन्धे्रश अर्थात् उच्च राशिस्थ या बलवान् ग्रह युक्त होने पर 60 वर्ष की आयु होती है।

    नवम भावस्थ केतु जातक सुखाभिलाषी होता है। इतने पर भी वह व्यर्थ परिश्रम कर शक्ति का हनन करता है अपयश का भागी होता है। बचपन में पिता को व्याधि होती है। समाज में उपहार का पात्र बनकर जीता है। दान-पुण्य, धर्म-कर्म, धार्मिक-पुण्य कार्यों से रहित वह धर्म भ्रष्ट होता है। पुत्र एवं भाइयों की चिन्ता निरन्तर बनी रहती है। बाहु रोग परन्तु कष्ट रहित एवं साधारण कष्ट का भोग करता है। अच्छी मस्तिष्क शक्ति, म्लेच्छ जाति द्वारा जातक भाग्य वृद्धि को प्राप्त करता है। 37 वें वर्ष में पिता को क्लेश-कष्ट होता है।

    दशम भावस्थ केतु के रहने पर जातक पिता से द्वेेष रखने वाला, दुर्भाग्य को प्राप्त तथा मूर्ख, व्यर्थ परिश्रम कर शक्ति क्षीण करने वाला, घोर दर्प, अभिमानी परस्त्रीगामी, दुराचारी, नीच कर्म करने वाला, माता को कष्ट, नेत्र का रोगी तथा राजकोष से पीड़ित होता है। कफ प्रकृति युक्त, रोग तथा उन्हें पितृ सुख का सर्वथा अभाव रहता है। कन्या राशिस्थ केतु में अधिक कष्ट होता है। पिता के दुःख व दुर्भाग्य का कारक बनता है। 1/2/8 राशिस्थ केतु से शत्रुओें का नाश होता है। आशाएं पूर्ण होती है। जातक सुखी व ईश्वर भक्त तथा शुभ ग्रह युक्त होने से सुन्दर स्थान में वास करने वाला, काव्य प्रेमी 45 वें वर्ष शत्रु या शस्त्र का भय होता है।

    एकादश भावस्थ केतु जातक को बृद्धिहीन बनाता है। वह स्वयं अपनी आप हानि करता है वातरोगी, अरिष्टनाशक, मधुरभाषी, विद्वान, दर्शनीय, सुन्दर स्वरूप वाला, भोगी, महातेजस्वी, उत्तम वस्त्राभूषण, सुख युक्त धन-धान्य सम्पन्न, पुत्र सुख रहित, बुरे कुुटुम्ब वाला, गुह्य रोग पीड़ित होता है। ऐसा केतु प्रायः 45 वें वर्ष में धन-पुत्रादि का खूब सुख देता है।

    व्यय भावस्थ केतु अपव्ययी, खर्चीला स्वभाव, चिंतातुर, सनकी, परदेशवासी बनाता है। शत्रुओं पर सदैव विजय प्राप्त करता है । पैर, नेत्र, वस्तिभाग व गुदा रोग से पीड़ित होता है। जातक मोक्षाधिकारी होता है। 45 वें वर्ष स्त्री को पीड़ा होती है। चंचल बुद्धि, धूर्त, ठग, अविश्वासी तथा भूत-प्रेत कार्य द्वारा जनता को ठगने वाला होता है।

    केतु-राशि-फल

    मेष- चचंल, बहुभाषी, सुखी, कष्ट सहिष्णु, कठोर, रोगी, भोग-भीरु, व्याकुल, स्त्री चिन्ता ग्रसित, मामा को कष्ट

    वृष- दुखी, निरुद्यमी, आलसी, वाचाल, धन-संपत्ति की हानि, कुटूम्ब विरोध, राज्य लाभ में बाधक।

    मिथुन- वात विकारी रोग, अल्प सन्तोषी, दम्भी, अल्पायु, क्रोधी, शत्रुहन्ता, विवादी, वक्ता, भाषणकर्ता, भयभीत, व्याकुल।

    कर्क- वात रोग पीड़ित, भूत-प्रेत पीड़ित, माता को कष्ट, धार्मिक क्षति, मित्र या पिता को कष्ट, अस्थिर गति।

    सिंह- बहुभाषी, डरपोक, असहिष्णु, सर्पदश का भय, कलाविद्-कला विज्ञ, उदर में वायु विकार, चोट लगने का भय, विपरीत बुद्धि।

    कन्या- मन्दाग्नि, निरन्तर व सदैव रोगी, मूर्ख, व्यर्थवादी, शत्रुनाश, मातृ सुख से अपमान, गुदा व नेत्र रोग पीड़ित, पशु सुख।

    तुला- कुष्ठ रोगी, दाद-खाज-खुजली से पीड़ित, कामी, क्रोधी, दुखी, मार्ग में क्लेश, स्त्री संबंध में व्याकुलता, चोर भय।

    वृश्चिक- क्रोधी, कुष्ठ रोगी, वाचाल, राजप्रिय, धनोपार्जन में बाधक, कोई-कोई धनी, सन्तान से पूर्ण सुखी।

    धनु- मिथ्यावादी, चंचल, धूर्त, धर्मनाश तीर्थाटन प्रेमी, म्लेच्छ जन से लाभ, बाहु रोग, दान कार्य में निंदा।

    मकर- प्रवासी, घोर परिश्रमी, तेजस्वी, पराक्रमी, पिता को कष्ट, माता का नाश, वाहन से जंघा में चोट।

    कुंभ- कर्ण रोगी, दुखी, भ्रमणशील, अपव्ययी, धनी, भ्रमणकुशल, विद्वान, दर्शनीय, तेजस्वी, उदर रोगी।

    मीन- कर्ण रोगी, प्रवासी, चंचल, कार्यपरायण, संुदर नेत्र, शिक्षित, उत्तम कार्य में व्यय, शत्रुनाश, गुप्तांग रोगी।

    कालसर्प दोष शान्ति हेतु एवं राहु -केतु की शान्ति हेतु इन आदतों को अपने जीवन में अपनायें

    1. किसी भी रविवार को संध्या काल में भैरूजी के मन्दिर जाकर भैरूजी को शराब चढ़ायें।
    2. गरीबों, कुष्ठ रोगियों, रेलवे स्टेशन के आस-पास बैठे भिखारियों को रोटी, बिस्किट या आटे से बनी चीजें दान करें।
    3. दुर्गा के दर्शन कर लाल फूल चढ़ायें।
    4. ऊँ रा राहवे नमः का जाप करें।
    5. यदि आपको राहु की दशा चल रही है एवं आपकी कुण्डली में कालसर्प दोष है तो आपको तुला दान करना चाहिए।
    6. जिस भी शिव मन्दिर में शिवलिंग पर सर्प न चढ़ा हो, उस पर सर्प बनावाकर भेंट करे या चढ़ाये।

    तुला दान किस प्रकार होता है।

    अपने वजन के बराबर गेहूँ तोल कर कुष्ठ रोगियों को दान दे।

    केतु की शान्ति हेतु उपाय

    1. काले कुत्ते को रोटी दान दे।
    2. शिव मन्दिर की ध्वजा बदले।

    यदि आपको ऐसा आभास होता है कि आप किसी रोग से ग्रस्त है एवं विभिन्न जाँचों के बाद भी बीमारी पकड़ में नहीं आ रही हो, तो भैरव मन्दिर में शराब चढ़ा कर रोग मुक्ति हेतु या रोग कारण हेतु प्रार्थना करें। अवश्य लाभ होगा।

    कालसर्प दोष निवारण के उपाय

    मानव की जन्मकंुण्डली में कालसर्प योग (राहु-केतु अन्तर्गत सब ग्रहों का आना) के कारण उसके जीवन में कई बाधाएं उत्पन्न होती है, जैसे कि शादी, संतान मंे विलंब, विद्याभ्यास मे विक्षेप, दाम्पत्य जीवन में असंतोष, मानसिक अंशांति, स्वास्थ्य हानि, धनाभाव एवं प्रगति में रुकावट आदि।

    इन सबके निवारण हेतु ‘कालसर्प योग’ की श्रद्धा-भक्ति के साथ विधिवत् शांति करनी अति आवश्यक है। इस शांति द्वारा सम्पूर्ण फल-प्राप्ति के साथ जातक कई सुखों का उपभोग कर सकता है।

    ऐसे तो इस शांतिकर्म में किसी भी एक ही धातु से निर्मित ग्यारह नागमूर्तियों की आवश्यकता होती है, पर इन ग्यारह मूर्तियों में नौ मूर्तियां तांबे से बनी हुई हों और अन्य दो मूर्तियां स्वर्ण या चांदी और सीसे या लोहे की बनी हुई हो तो काम चल सकता है।

    यदि ग्यारह मूर्तिया एक ही धातु से बनी हुई उपलब्ध न हों तो सिर्फ तीन मूर्तियां ही बनवा लें (तांबा, चांदी, सुवर्ण सीसा या लोहा) बाकी की आठ मूर्तियों के स्थान पर प्रतीकात्मकरूप सुपारी कर भी शांति विधानकर्म किया जा सकता है।

    यह कालसर्प योग-शांतिकर्म जहां पर उल्लिखित विधि-विधान के अतिरिक्त भी अन्य कई प्रकारों से किया जा सकता है। जैसेः

    1. मोर या गरुड़ का चित्र बनाकर उस चित्र पर नाग विषहरण मंत्र लिखें और उस मंत्र के दस हजार जप कर दशांश होम के साथ ब्राह्मणांे को खीर का भोजन कराएं।
    2. पत्थर की नाग की प्रतिमा बनवा कर उसकी मंदिर हेतु प्रतिष्ठा कर नागमंदिर बनावें।
    3. कार्तिक या चैत्रमास में सर्पबलि कराने से भी कालसर्प योग-दोष निवारण होता है।
    4. अपने नाप का कहीं पर मरा हुआ सर्प मिल जाय तो उसका शुद्ध घी के द्वारा अग्नि संस्कार कर तीन दिन तक सूतक पालें और उसके बाद सर्प बनवा कर दान करें।
    5. एक साल तक गेहूं या उड़द के आटे की सर्पमूर्ति बनाकर पूजन करने के बाद नदी में छोड़ दें और एक साल बाद नाग बना कर दान करें।

    6़. नागपंचमी के दिन सर्पाकार सब्जियां खुद न खाकर, न काट कर बल्कि उनका दान दें और अपने वजन के हिसाब से गायों को घास खिलाकर शिवलिंग की पूजा करें और अपने घर में दीवार पर नौ नाग का सचित्र नागमंडल बनाकर नित्य धूप-दीप के साथ अनंत चतुर्दशी से लेकर पितृश्राद्ध पर्यन्त खीर-नैवेद्य के साथ पूजा के बाद अपनी अनुकूलता के अनुसार कालसर्प दोष की पूजा कराएं।

    इस शांतिकर्म में गौमुख-प्रसव के बाद प्रधान संकल्पानुसार पंचांग कर्म, विशेष देव-मंडल क्रमानुसार देवस्थान, प्रतिष्ठा पूजन आदि कर्म का प्रारंभ करें।

    1. मध्य में मृत्युजंय (महारुद्र्र) स्थापन हेतु लिंगताभद्र।
    2. शेषादि नौ नाग स्थापन हेतु चावलों का अष्टदलात्मक नागमंडल।
    3. ईशान कोण में मनसादेवी की स्थापना।
    4. शेषनाग के दक्षिण (वायु कोना) में काले वस्त्र पर कृष्णपात्र (काली मटकी) समन्वित काले तिलों का राहु स्थापना।
    5. शेषनाग के वामभाग (नैर्ऋत्य कोना) में केतु-स्थापना।

    अब यहाँ पर उल्लखित क्रमानुसार प्रथम महारुद्र की षोडशोपचारी विधिवत् पूजा कर उस शांतिकर्म संलग्न शेषादि नौ नाग, दक्षिणवाम राहु-केतु एवं मनसादेवी की स्थापन, प्रतिष्ठा पूजन आदि कर्म करें। तक्षकादि सहित शेषराज की निम्न क्रमानुसार स्थापना करें।

    नागमंडल (अष्टदल) के मध्य में तीन नाग मूर्तियां शेष के रूप में।

    1. पूर्व-तक्षक, 2. अग्नि-वासुकी, 3. दक्षिण-कर्कोटक, 4. नैर्ऋत्यअनन्त, 5. पश्चिम-शंखपाल, 6. वायु-महापद्य, 7. उत्तर-नील एवं ईशान में, 8. कम्बल। उक्त नागदेवताओं की स्थापना के बाद पंचभूः संस्कारपूर्वक वहिस्थापन, ग्रहस्थापन तदन्तर ग्रहहोम एवं स्थापन क्रमानुसारेण स्थापित देवताओं का प्रधान होम कर शेषकार्य विधिवत् सम्पन्न कर पूर्णाहुति के बाद स्थापित कलशों के जल से यजमान दम्पति पर सर्पो के साथ (पुत्र या पुत्री की शांति हो तो उसके साथ भी) अभिषेक करें।

    नैवेद्य में नौ खण्डात्क नैवेद्य अर्पण करें। आरती में राहु-केतु को परावादी में नौ बत्तियों से आरती उतारें। सब नौ-नौ के हिसाब से सौभाग्यवती स्त्रियां,(शक्य हो तो जोडें़) कन्याएं, बटुक एवं ब्राह्मणादि को भोजन कराकर वस्त्र-पात्रादि दान के साथ दक्षिणा दें।

    कर्मान्त एक नाग आचार्य को,  दूसरा शिवालय में एवं तीसरा नाग बहते हुए गहरे पानी में छोड़ दें।

    त्क नैवेद्य अर्पण करें। आरती में राहु-केतु को परावादी में नौ बत्तियों से आरती उतारें। सब नौ-नौ के हिसाब से सौभाग्यवती स्त्रियां,(शक्य हो तो जोडें) कन्याएं, बटुक एवं ब्राह्मणादि को भोजन कराकर वस्त्र-पात्रादि दान के साथ दक्षिणा दें।

    कर्मान्त एक नाग आचार्य को,  दूसरा शिवालय में एवं तीसरा नाग बहते हुए गहरे पानी में छोड़ दें।