Enemy Control Mantra / शत्रु पर विजय प्राप्ति हेतु बीज ‘क’ का ध्यान इस प्रकार है-


‘क’    जवायावकसिन्दूरसद्दशीं कामिनीं परां।

चतुर्भुजां त्रिनेत्रां च बाहुवल्लीविराजितां।।

कदम्बकोरकाकारः स्तनयुग्मविराजितां।

रत्नकडणकेयूरहारनूपुरभूषितां।।

एवं ककारं ध्यात्वा तु तन्मन्त्रं दशधा जपेत्।

शडकुन्दसमा कीर्तिर्मात्रा साक्षात्सरस्वती।।

कुण्डली चांकुशाकारा कोटिविश्रुल्लताकृतिः।

कोटिचन्द्रप्रतीकाशो मध्ये शून्यः सदाशिवः।।

शून्यगर्भस्थिता काली कैवल्यपददायिनी।

अर्थश्च जायते देवि तथा धर्मच्श्र नान्यथा।

ककारः सर्ववर्णानां  मूलप्रकृतिरेव च।

कामिनी या महेशानि स्वयं प्रकृतिसुन्दरी।।

माता सा सर्वदेवानां कैवल्यपददायिनी।

ऊध्र्वकोणे स्थिणा वामा ब्रह्मयशक्तिरितीरिता।।

वामकोणे स्थिरा ज्येष्ठा विष्णुशक्तिरितीरिता।

दक्षकोणे स्थिता शक्तिः श्रीरोद्री संहाररूपिणीं।।

ज्ञानात्मा सा तु चार्वडी चतुः षष्टयात्मकं कुलं।

इच्छाशक्तिर्भवेद्ब्रह्मा (दुर्गा) विष्णुच्श्र ज्ञानशक्तिमान्।।

क्रियाशक्तिभवेद्रुद्रः सर्वप्रकृतिमूर्तिमान्।

आत्मविद्याशिवैस्तत्वै पूर्णा मात्रा प्रतिष्ठिता।।

आसनं त्रिपुरा देव्याः ककारः पच्´दैवतः।

ईश्वरो यस्तु देवेशि त्रिकोणे तस्य संस्थितः।

त्रिकोणमेतत्कथितं योनिमण्डलमुत्तमं।

कैवल्यं प्रपदे यस्याः कामिनी सा प्रकीर्तिता।।

एषा सा कादिविद्या चतुर्वर्गफलप्रदा।

क्लीम

बीजाक्षर- ‘क्व’, जप संख्या- 1000, जप स्थान – मूलाधार, होम- रक्त पुष्प, बिल्व, तिल और यवों से 100 या 10 आहुतियाँ, मार्जन- 10 तर्पण- 10, श्लोक पाठ संख्या- 10, श्लोक पाठ आहुति- 1, पूजन यन्त्र- समचतुर्भुज के मध्य में ‘क्ली’।

मन्त्र

क्वणत्काच्´ी दामा करिकलभकुम्भस्तननता।

परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्रवदना।।

धनुर्वाणान्पाशं सृणिमपि द्धाना करतलैः।

पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहोपुरुषिका।।

भावार्थ- हे माँ! विश्व व्यापिनी कर्तुमर्तुमन्यथा कर्तु समर्था है श्री जगदम्बा! अनेक ब्रह्माण्ड रूप घुँघरूओं से बनी मधुर शब्द युक्ता यह करधनी आपकी ललित कटि में बँधी हुई है। बाल हाथी के गण्ड स्थलवत् मध्य मंे क्रमक्षीण आपके स्तन (विश्वपोषिणी शक्ति) भक्तों को पिलाने के लिए स्तोक झुके हुए हैं। आपका श्री मुख अनन्त कोटि शरच्चन्द्र श्री के समान परम शान्ति से भरा हुआ हैै। आपकी चतुर्भुजाओं में इक्षु धनु पाशांकुश तथा बाण दुष्टदमिनी भक्तरक्षिणी आपकी अनिर्वचनीय शोभा को बढ़ा रहे हैं। हे त्रिपुरारि, महाशिव परमेश्वर पर आवरण डालने वाली महामाया पुरुषिका! तेरी दया से हमे तेरा साक्षात्कार हो। तेरी ब्रह्माण्डमयी कटि-किंकिणि की मधुर ध्वनि तेरे साधकों तथा प्रेमी भक्तों को मायावरण के विचित्र कण्टक युत गर्तो से बचने के लिए चेतावनी देने वाली हो। श्री माँ के नीचे के वामहस्त में भ्रमर प्रत्यंच वाला इक्षु धनु (विवेक-बुद्धि) है। कमल, रक्त कैरव (करवीर), कल्कार, इन्दावर तथा सहकार पुष्प निर्मित पंचबाण हैं। ये पंचबाण (पंच तन्मात्रा) नीचे के दक्ष कर में हैं। ऊपर के वामकर में पाश (मन) है। ऊपर के दक्षिण कर में अंकुश (बुद्धि) है।

इन शस्त्रों का गुप्त भाव तीन प्रकार का है- 1. स्थूल (गुणमय), 2. सूक्ष्म (मन्त्रमय), और 3. पर (वासनामय)। शस्त्रों का गुणमय स्थूल रूप ऊपर बताया है। शेष दो रूप इस प्रकार हैं-

मन्त्रमय- 1. धनुष = स्वाहा ठः ठः, 2. बाण = द्रां द्रीं क्लीं ब्लूं सः, 3. अंकुश = क्रों, 4. पाश = हृीं।

वासनामय- 1. धनुष = मोक्ष, 2. बाण = काम, 3. पाश = अर्थ, 4. अंकुश = धर्म।

इस श्लोक के बीज ‘क्व’ का भाव अत्यन्त रहस्यमय तथा मोक्षद है। प्रत्येक की आपत्ति से दूर करने वाले इस मन्त्र का 224 अनुष्ठान पुरश्चरण सर्वसिद्धियों को देने वाला है। इस श्लोक में से वशीकरण बीज ‘ब्लू’ की उत्पति बताई है। यथा बाणान् में से ‘ब’ करतल में से ‘ल’, पुरमथितुः में से ‘उ’ और पौष्पं मेें से ‘बिन्दु’।

चन्द्र का अर्थ है – अर्द्धमात्रा बिन्दु। बिन्द्वावरण द्वितीया का चन्द्र शिव तथा माँ के मस्तक पर बताया है। बिन्द्वावरण का अर्थ है- जिसमें से बीज मन्त्रों का विस्फुरण हो। तृतीया नेत्र का अर्थ है- मूलाग्नि, लयात्मिका पृथ्क्कीरण शक्ति।

विधि- मन्त्र अगर ध्वनि शक्ति का चमत्कार है तो यन्त्र आकृति विज्ञान का परिणाम है इन दोनों का सम्मिलित रूप अनेक आश्चर्यजनक परिणाम प्रदान कर सकता है। हमारे धर्मगुरू जगद्गुरू पूज्यनीय शंकर भगवत्पाद ने यन्त्र मन्त्र की इस शक्ति को पहचाना और सौन्दर्य लहरी की रचना दो भागांे – आनन्द लहरी एवं सौन्दर्य लहरी में की। इनका सम्मिलित रूप ही ‘सौन्दर्य लहरी’ है।

उपरोक्त मन्त्र एवं यन्त्र अत्यन्त चमत्कारी है। इस यन्त्र को नियमित 1000 की संख्या में 12 दिन तक लिखें । इसके लिए स्वर्ण प्लेट, अनार की कलम और काली स्याही की आवश्यकता होती है। इसके माध्यम से हरेक वस्तु को प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए शुद्धता, श्रद्धा और विश्वास अनिवार्य हैं। यह प्रयोग मुख्यतः शुत्र पर विजय प्राप्त करने के लिए है।