Dus Mahavidya ki Aathvi Shakti / 10 महाविद्या की आठवी शक्ति


तन्त्रशास्त्र में दशमहाविद्याएं साधना के क्षेत्र म परमोच्य स्थान तो रखती ही हैं, साथ ही सृष्टि तत्व विज्ञान, पदार्थ विज्ञान भी इन विद्याओं में निहित है। दश महाविद्याओं का रहस्य गहन, गंभीर और निगूढ़ है। देवियों के रूप में दशमहाविद्या क्रम से (1) काली (2) तारा (3) षोडषी (4) भुवनेश्वरी (5) भैरवी (6) छित्रमस्ता (7) धूमावती (8) बगलामुखी (9) मातंगी और (10) कमलात्मिका प्रसिद्ध है और इनकी उत्पति कथा भी नारद पाश्चरात्र, स्वतंत्र तंत्र, कालिका पुराण, देवी भागवत आदि तांत्रिक, पौराणिक ग्रंथों में मिलती है, किन्तु जब हम वैज्ञानिक सार्वभौम दृष्टिकोण से दशमहाविद्याओं के रहस्य पर विचार करते हैं, तो वैदिक वाड्मय के आधार पर विस्तृत व्यापक रहस्य बोध होता है।

विद्या- आगन का आगमन निगम से होने के कारण आगम के संपूर्ण सिद्धान्त निगम पर निर्भर है। निगम में ‘त्रयी बह्मा’, ‘त्रयी विद्या’ और ‘वेदत्रयी’ रूप में ब्रह्मा, विद्या और वेद को परस्पर अभिन्न माना गया है। आध्यात्मिक दृष्टि से तीनों अभिन्न है, किन्तु भौतिक दृष्टि से तीनों भिन्न है,  विश्वसृष्टि से वेद, ब्रह्मा और विद्या इन तीनों तत्वों का आधिपत्य है। शब्द ब्रह्मा वेद तत्व है, विषय ब्रह्मा ब्रह्मा तत्व है और संस्कार ब्रह्मा विद्या तत्व है। शब्द सुनने से शब्दाकार का ज्ञान होता है, पदार्थ देखने से तदाकार ज्ञान होता है। इसलिए शब्द विषय भेद से ज्ञान दो प्रकार का होता है। जो ज्ञान शब्द पर निर्भर होता है, उसे वेद कहते हैं और जो ज्ञान विषयावच्छित होता है। उसे ब्रह्मा कहते है। वेद और ब्रह्मा के अतिरिक्त एक और ज्ञान होता है। शब्द सुनने से और विषय देखने से जो सामान्य ज्ञान होता है,यहि आगे चलकर जब विशेष रूप से परिणत हो जाता है, तो उसे संस्कार कहते है। शब्द और विषय दोनों ही सामान्य उत्पन्न कर विलीन हो जाते हैं, किन्तु वहीं सामान्य ज्ञान आगे चलकर जब अनुभव द्वारा विशेष भाव को प्राप्त करता हुआ आत्मा में अंकित हो जाता है तो दार्शनिक भाषा में उसे ‘अनुभवाहित संस्कार’ कहते है। वैज्ञानिक परिभाषा में इसी को ‘विद्या’ कहा जाता है। इसी से भविष्य का व्यवहार मार्ग चलता है।

जब तक संस्कार है तभी तक कोई स्व-स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं, उसी संस्कार का अभाव होने पर वह विश्वातीत है, मुक्त है। विश्व की संपूर्ण सत्ता संस्कार सत्ता पर टिकी हुई है। अवएव शब्द रूप वेद और विषय रूप ब्रह्मा की अपेक्षा संस्कार रूप विद्या की विधायिका है। उसी विद्या ज्ञान पर चितिक्रम से संस्कार पुट लगने से विश्व बनता है। जैसे हमारा विश्व हमारा संस्कार है, वैसे ही यह महाविश्व उसका संस्कार है। अतएव विश्व विद्यारूप है। संस्कारवच्छित होता हुआ वह ज्ञान मुर्ति विद्या है, शब्दावच्छित होता हुआ वही वेद है और विषयावच्छित बनकर वहीं ब्रह्मा है। उपर्युक्त विष्लेषण से सिद्ध है कि सृष्टि का संबंध विद्या से है। निगम और आगम दोनों विश्व का निरूपण करते है, इसलिए ये दोनों विद्या से प्रसिद्ध हुए। सूर्य-चन्द्र, ग्रह-नक्षत्र, औषधि, वनस्पति, धातु, रस, विष, कृमि, कीट, पशु, पक्षी, मनुष्य आदि प्रत्येक पदार्थ एक-एक विद्या है, विश्व के अंतर्गत ये सब क्षुद्र विद्या है और संपूर्ण विश्वविद्या महाविद्या है। इसी को महाविश्वविद्या भी कहा जाता है। इस महाविद्या को ऋषियों ने दस भागों में बांटा है। निगम में दश अवयव वाली विराट विद्या के नाम से प्रख्यात है। आगमशास्त्र ने दशमहाविद्याओं के द्वारा विश्व कैसे उत्पन्न हुआ ? उत्पन्न विश्व का क्या स्वरूप है, उस विश्व विद्या को समझने से क्या लाभ हैं ? उनकी उपासना से क्या उपलब्धि होती है ? इत्यादि प्रश्नों का समाधान किया है।

दशमहाविद्या की दश संख्या का रहस्य- विश्व की सृष्टि पुरुष और प्रकृति के समन्वय से हुई है। दर्शनशास्त्र उस पुरूष के ‘काल’ एवं ‘यज्ञ’ भेद से दो विवर्त मानता है। कालपुरुष व्यापक है आदि है और यज्ञ पुरुषसादि है, सीमित है। व्यापक काल पुरुष का ही थोड़ा सा प्रदेश सीमित होकर यज्ञ पुरुष कहलाता है। सृष्टि का प्रथम प्रवर्तक काल पुरूष है, और काल पुरुष का आश्रय लेकर यज्ञ पुरुष विश्व रचना में समर्थ होता है। यजुर्वेद और उपनिषदों के अनुसार उस महाकाल के उदर में अनन्त विश्व-चक्र घूम रहे है। यजुर्वेद में जिस तत्व को ‘काल’ कहा गया है, उपनिषद् उसे परात्पर कहती है। शतपथ ब्राह्माण परात्पर केा सर्वम त्युधन अमृत्व कहता है अमृत्व सत्य है और मृत्यृतत्त असत् है।

अन्तरं मृत्योरम तं मृत्यावमृतमाहितम्।

तदन्तरस्य सर्वस्य तदुसर्वस्याबाह्मतः।

यजुर्वेद के इस कथन के अनुसार दोनों एक दूसरे में ओत-प्रोत है।  एक निरंजन, निर्गुण, शांत, शाश्वत और अभय है, पूर्ण मृत्यु लक्षण है तो दूसरा साज्जन, सगुण, अशांत, अशाश्वत, समय और स्वलक्षण है। वस्तुतः दोनों में से एक सत् है, उसका कभी विनाश नहीं होता है। दूसरा असत् है और विनाश उसका स्वरूप है। ताप्तर्य यह कि सत् असत् रूप अमृत-मृत्यु की समष्टि ही ‘कालपुरुष’ ही है। इसी असीम परातपर में प्रतिक्षण विलक्षण धर्म वाली माया की शक्ति का उदय होता रहता है। वही माया बल उस असीम ‘कालपुरुष’ को ससीम बना देता है, जिसके प्रभाव से वह विश्वातीत, विश्वकार और विश्व बन जाता है। जो शक्ति काल को यज्ञ रूप में परिणत कर देती है, उसका नाम ‘प्रकृति’ है। इसी का समन्वय प्राप्त कर वह ‘कालपुरुष’ अपने कुछ एक प्रदेश से सीमित बनकर कामनाओं के चक्कर में फंस जाता है। एक-एक माया से एक-एक विश्व चक्र उत्पन्न होता है। माया बल अनन्त है अतएव उसमें अनन्त विश्वचक्र है। उसके रोम-रोम में ब्रह्माण्ड समाए हुए है। अनन्त विश्वाधिष्ठाता कालपुरुष उन सब पर शासन करता है। सात लोक चैदह भुवन सब ‘काल पुरुष’ से उत्पन्न हुए है। समस्त विश्व चक्रों की उत्पत्ति उसी से हुई।

अथर्व संहिता (19 16 153-54) का कथन है कि ‘तम’ के तीन भेद है-

अनुपारव्य, निरुक्त और अनिरुक्त

कालारंग, कोयला आदि पदार्थ निरुतम् है इनका निर्वचन विष्लेषण भली-भांति किया जा सकता है। आंख मंूदने पर छा जाने वाला अंधकार और घोर अंधियारी रात का अंधकार ‘अतिरुक्ततम’ है, क्योंकि इसका प्रत्यक्षीकरण तो होता है किन्तु निर्वचन नहीं। ‘निरुक्त’ विश्वसत्ता है और ‘अहः’ काल है, सृष्टि है। ‘अतिरुक्त’ रात्रिकाल-प्रलय है। अहोरात्रि की समष्टि विश्व है- यह ‘अनुपारव्य’ तम है, जो प्रलय काल में अनिरुक्त तम से ढका रहता है। इसी को वेद ‘पुरुष’ कहते है।

तम आसितमसाग्रजहमग्रेऽप्रकेतम्।

सलिलंसर्वमा इदम्।

तुच्छये नाम्ब पिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकम्।।

जो विश्वात्तीस अनुपाख्यतम है, वहीं ‘कालपुरुष’ है। इस विश्वाभाव रूप है अतएव सत् रूप होने पर भी ज्ञात चक्षुओं से अतीत है, इसलिए ऋषियों ने उसे ‘असत्’ कहा है। यहां पर असत् का अर्थ अभाव नहीं बल्कि विश्व काल में वह इसमें विलक्षण किन्तु सत् है।

असदेवेमग्र आसीत। तत् सदासीत्।

कथमसतः सज्जायेत्। तत् समभवत्।।

तद् अण्डं निरवर्तत्।।

वहीं असत् किन्तु सत् कालपुरुष महामाया से घिर जाता है। वह अपरितिम है, वहां पर कोई अभाव नहीं, कोई कामना नहीं, वह आप्त काम है, किन्तु उसी का माया प्रदेश जब सीमित हो जाता है तो वह आप्त काम न रह कर कामनामय बन जाता है। उसकी कामना का ‘एकोऽहं बहुस्याम’ यहीं रूप है। माया बल के अव्यवहित उत्तर काल में हृदय बल (केन्द्र शक्ति) उत्पन्न होता है। उसके उत्पन्न होने पर वही रसबलात्मक तत्व कामनामय होकर ‘मन’ यह नाम धारण कर लेता है। कामना या इच्छा मन का व्यापार है। ‘हत्प्रतिष्ठंयदजिरं’ (यजुर्वेद) के अनुसार मन हृदय में ही प्रतिष्ठित रहता है और कामस्तदगे्र समवत्तेताधि मनसोरेतः प्रथम यदासीत् (ऋग्वेद) के अनुसार सबसे पहले इस मन से विश्वरेत (शुक्ल) भूत कामना का उदय होता है। उसकी इस कामना से पच्चन् क्रम से पहले वेद नाम के ‘पुरज्जन’ का प्रादूर्भाव होता है। वेद  चार प्रकार के ऋक्, यजुः, साम और अथर्वण । त्रयीवेद अग्निवेद है और अथर्व सोमवेद है। त्रयीवेद स्वायम्भुव ब्रह्म है और अथर्व पारमेष्ठयसु ब्रह्म है। ब्रह्म आग्नेय होने से पुरुष है और सुब्रह्म सौभ्य होने से स्त्री है। त्रयी ब्रह्म के मध्य पतित यजुः भाग में ‘यतच्जूदो’ तत्व है। यत् गति तत्व है यह प्राण और वायु नाम से प्रसिद्ध है। प्राण, वाक् ब्रह्माकाश रूप में स्थिति गति तत्व की समष्टि यजुुर्वेद है। प्राण रूप ‘यत’ से काम से वाक्, जू भाग से सर्वप्रथम जल उत्पन्न होता है। इसी की व्याख्या शतपथ ब्रह्माण (6 11 13) में मिलती है-

सोऽपसृजत वाच एवं लोकात् वागेवमासृजत।

त्रयी ब्रह्म के वाक् भाग से उत्पन्न इसी ‘आप’ तत्व का नाम अथर्ववेद है। यजुः रूप स्वायम्भुख का पसीना की अथर्वरुप सुब्रह्म है (गोपथ ब्रह्माण 1 11 11) शतपथ (10 12 13 16 11) का वचक हैं कि

अयमेवाकाशों जूः यदिदमन्तरिक्षं तदेतद्यजुवद्य्रिुचान्तरिक्षच्च यच्च जूश्च तस्ताद्यजुः तदेतद्यजृः ऋक्सामयोंः प्रतिष्ठज्ञ। ऋकस्तवेहतः।।

इस प्रकार ऋक, यजुः, साम ‘यज’ ‘जू’ भेद से अग्निवेद चतुष्कल हो जाता है। दूसरा आपोमय सोम अथर्व है। यह मृगु और अंगिरा भेद से दो भागांें मंे विभक्त है। घन-तरल-विरल इन तीन अवस्थाओं के कारण भृगु आप, वायु और सोम इन तीन अवस्थाओं में परिणत हो जाता है। इस प्रकार आपोवेद ‘शट्कल’ हो जाता है। भृगु-अंडिरा रूप आपोवेदके साथ चतुष्कल त्रयीवेद का समन्वय होता है।

आपो भृग्वंडिरो रूपमापो भृग्वंडिरोऽयम्।

अन्तैरेते त्रयो वेदा भृग­ऽरंडिरसः श्रिताः।

उक्त श्कल सुब्रह्म सौम्य होने से स्त्री है और आग्नेय चतुष्कल त्रयी ब्रह्मा पुरुष हैं। दोनों के मिलन से ब्रह्म-सब्रह्मात्मक विराट् पुरुष का जन्म होता है। वह वेदमूर्ति पूर्ण पुरुष अपने आपकों इन्हीं दो भागांें में विभक्त कर विराट को उत्पन्न करता है।-

द्विधा कृतात्मनो देहमद्र्धेन पुरुषो­ऽभवत्।

अद्र्धेन नारी तस्यां स विराजमस जत प्रभुः।।

दशाक्षर विराट्- शतपथ ब्रह्माण (1 11 12) में ‘दशाक्षर वै विराट कह कर बताया गया है कि ऋक, साम, यत-जू, आप, वायु, सोम, यम, अग्नि और दशफल बन जाता हैं। अग्नि-सोम रूप ब्रह्म-सुब्रह्म के मिलन से उत्पन्न होने वाला वह विराट पुरुष ‘यज्ञ पुरुष’ है इसी से सारी सृष्टि की उत्पत्ति होती है। इसलिए इसे ‘प्रजापति’ विश्व विद्या का निगम-आगम के आधार पर दशावयव माना जाना उपयुक्त है। इन्हीं को दशहोता, दशाह आदि नामों से पुकारा जाता है।

यज्ञो वै दश होता (तै. बा. 2 12 11 16)

दशाक्षरा वै विराट् ( श. ब्रा. 1 11 11)

यज्ञ उ वै प्रजापतिः (कौ. ब्रा. 10 11)

प्रजापति वै दशहोता (तै. ब्रा. 3 12 16 11)

अन्तो वा एष यज्ञस्त यद्दशममाह (तै. ब्रा 2 12 16 11)

प्रतिष्ठा दशमहः (को. ब्रा. 2 19 12)

एतद्वै कृत्स्नमन्नाघं यद् विराट् (को. ब्रा. 1413)

विराट् विरमणाद् विराजनाद् वा (3 112)

‘न्युवाद् वा इमाः प्रजाः प्रजायनते’ शतपथ (11 11 12 14) ब्राह्मण के इस वाक्य अनुसार न्युन विराट् से ही सृष्टि की उत्पत्ति होती है। तात्पर्य यह कि पुरुष और स्त्री के संयोग से सृष्टि होती है, न कि पुरुष-पुरुष या नारी-नारी के मिलन से । पुरुष आग्नेय है और स्त्री सौम्य है, इसलिए सौम्य होने के कारण स्त्री आग्नेय पुरुष की भौग्या होती है। भौक्ता, भौग्या से प्रबल होता है, इसलिए स्त्री पुरुष की उपेक्षा न्युन होती है। इस न्युन संबंध से ही प्रजाओं की उत्पत्ति होती है। निष्कर्ष यह निकला कि दशाक्षर पूर्ण विराट से सृष्टि नहीं होती है, नवाक्षर के न्युन विराट से ही सृष्टि होती है। एक अक्षर कम हो जाने पर भी विराट का विराटत्व अक्षत बना रहता है-

न वै एकेनाक्षरेण छन्दांसि छन्दांसि वियन्ति न द्वाभ्याम्।

सर्वप्रथम कुछ भी नहीं था। केवल शुन्य बिन्दुु मात्र था। बिन्दु का अर्थ पूर्ण है। यह बिन्दु उन ब्रह्मक्षरों का पहला रूप है, जिनसे नव अक्षर का विराट उत्पन्न होता है पहले केवल शुन्य था, उस शुन्य से 1-2-3-4-5-6-7-8-9 ये नौ संख्याएं विकसित हुई है। नव पर संख्या समाप्त हो जाती है। 9 पर संख्या समाप्त होने पर शून्य के साथ 1 का संबंध जोड़ने से 10 संख्या बनती है। पुनः एक-एक संख्या का संबंध जोड़ने के क्रमशः 11, 12 आदि संख्याएं बनती है। 9 पर संख्या समाप्त होने के कारण 9 का संकलन-फल समान आता है।

1-2-3 आदि किसी संख्या का संकलन फल समान नहीं आता, अन्ततः 9 शेष रह जाते है। दसवां वही महत्वपूर्ण है। वही महाकाल नाम का विश्ववातीत परात्पर है। उस शून्य रूप पुरूष के उदर में नवां अक्षर विराट रूप यज्ञ पुरुष समाया हुआ है। उसी पूर्ण रूप को दसवां प्रतिष्ठा नाम अहः बतलाया गया है। इसी पूर्ण ब्रह्म का निरूपण श्रुति इस प्रकार करती है-

यस्मात् परं नापरमस्ति किच्चित्।

यस्मात्रणीयो न ज्यायोऽस्तिकिच्चित्।

वृक्ष इवस्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सवंय्।।

दस (10) संख्या मंे एक अंक स्वतंत्र विभाग है, वही बिन्दु है और 9 का जो विभाग है, वहीं विराट् है। यही दशा संख्या का वैज्ञानिक रहस्य है।

इस वैज्ञानिक विवेचन से सिद्ध है, कि वेदोक्त सृष्टि विद्या दस भागांे में विभक्त है। एक ही ‘पुरुष’ इस पुरुष बन रहा है। पुरुष प्रकृति से संबंद्ध है, इसलिए निगम मूलक आगन शास्त्र सृष्टि विद्यारूप इन दश शक्तियोें का निरूपण करता है। वहीं शक्तिप्रपच्च दशमहाविद्यानाम से ख्यात है।

महारुद्र की महाशक्ति बगलामुखी-

तंत्र शास्त्र की ‘बगलामुखी’ और वैदिक साहित्य की बगलामुखी दोनों ही एक है व्याकरण के लोपागम वर्णविकार पद्धति के अनुसार जिस प्रकार हिंस शब्द वर्णव्यत्यय से ‘सिह’ बन जाता है, उसी प्रकार निगम का ‘बाल्गा’ शब्द आगन शास्त्र में पहुंचकर ‘बगला’ रूप में परिणत हो जाता है। शतपथ ब्राह्मण (3 15 14 13) में बगलामुखी का उल्लेख इस प्रकार है।

यदा वै कृत्यामुत्खनन्ति अथ सालसा मोघा भवति।

तथो एवैश एतद्यद्यस्मा अत्र कश्चिद द्विशान भ्रातृव्यः

कृत्यां बल्गां निखनति तानेवैतदुत्किरति।।

बगलामुखी शक्ति कृत्याशक्ति (मारण, मोहन, उच्चाटन, कीलन, विद्वेषण में प्रयुक्त होने वाली है) इसकी आराधना से आराधक अपने शत्रु को मनमाना कष्ट पहुंचा सकता है।

बगलामुखी का संबंध अथर्वासुत्र से है अर्थवेदीय चिंतन के आधार पर बगलामुखी का तत्व चिन्तन इस प्रकार है-

हर प्राणी के शरीर से अथर्वा नाम का एक प्राण सुत्र निकला करता है। यह प्राण रूप है, इसलिए इसे स्थूल-दृष्टि सं नहीं देखा जा सकता। व्यावहारिक दृष्टि से इस अथर्वा प्राण सूत्र को इस तरह समझा जा सकता है-

दूरातिदुर बसे हुए किसी आत्मीयजन के दुःख से अकस्मात हमारा मन व्याकुल हो उठता है, परोक्ष रूप से उस दुख का संकेत और उसकी अनुभूति करने वाले परोक्ष सूत्र का नाम अथर्वासूत्र है। अथर्वासूत्र एक ऐसा शक्ति सूत्र है, जिसकी साधना करने से हजारों मील दूर स्थित व्यक्ति का आकर्षण किया जा सकता है। लोक व्यवहार में घर में प्रातःकाल कौवा बोलने से किसी अतिथि के आगमन की कल्पना की जाती है। कौवा को अतिथि के आगमन का संकेत अथर्वासुत्र से मिलता है। जिस अथर्वासूत्र हो हम नहीं जान पाते, उसे कुत्ते प्राणशक्ति द्वारा जान जाते है। कुत्तों द्वारा चोरांे, डाकुओं, हत्यारों का पता लगाने के प्रयोग का रहस्य यह है कि चोर, डकैत, हत्यारे जिस रास्ते से जाते हैं उस रास्ते में उनका अथवा प्राण वासना रूप से मिट्टी में समा जाता है। कुत्ते कपड़ा, नाखून, केश आदि अंग और अवयव सूंघकर अपराधी को पहचानते हैं। चिकित्सक विशेष रोगी का कपड़ा सूंघ कर रोग का निदान करते हैं, तांत्रिक किसी के द्वारा उपयोग में लाई गई किसी भी वस्तु पर मन माना प्रयोग करते है- इसका तात्पर्य यही है कि अंगों, अंगावयवों और उपयोग में लाई गई वस्तुओं आदि पर व्यक्ति के अथर्वाप्राण वासना रूप में विद्यमान रहते है।

अथर्वाप्राणों को प्रयोग ऋग्वेद काल से अब तक जन समाज मंे प्रचलित है, भले ही अब उसके वैज्ञानिक रहस्य का बोध हमें न हो अथवा किसी और विज्ञान विद्या से उसकी व्याख्या हम करें। ऋग्वेद में सरमा नाम की कुतिया द्वारा देवताओं की औरतों के अपहरणकर्ता पणियों का पता लगाना, देवताओं द्वारा असुरों पर कृत्या का प्रयोग करना इत्यादि घटनाओं के मूल में अथर्वासूत्र ही है। अथर्ववेद के घोर अंडिरस और अथर्व अंडिरस’ दो भेद हैं। घोर अंगिरा मंे औषधि, वनस्पति विज्ञान है और अथर्व अंगिरा में कृत्या (अभिचार कर्म) के प्रयोग हैं। बगला मुखी की रहस्य साधना के प्रतिपादक बगलामुखी मंत्र में बगलामुखी का जो प्रार्थना लोक है, उसमें बगला मुखी शक्ति के उपर्युक्त गुण कर्मो की निर्देशन मिलता है-

जिहृाग्रमादाय करेण देवी,

वामेन शत्रून् परिपीडयन्तीम्।

गदाभिघातेन च दखिणेन,

पीताम्बराख्यां द्विभूजां नमामि।।